नेपाल के इतिहास का एक और काला दिन, खून हिसाब अवश्य मांगेगा : श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति, काठमान्डू ८ सितम्बर ।

श्वेता दीप्ति
नेपाल के इतिहास में एक और काला दिन शामिल हो गया है । आज जो खून बहा है वह किसी पार्टी, किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं बहा है बल्कि देश के लिए बहा है । ये वो युवा हैं जो अपने ही देश से नाराज और निराश हैं । एक ऐसी सरकार जिसने निरंकुशता की हदें पार कर दी ।
आज सड़कों पर लोकतंत्र के लिए एक शांतिपूर्ण विद्रोह हो रहा था, जो रक्तरंजित हो गया । सड़कों पर खून है और असपताल में घायल युवाओं की चीखें । कई घर आशंकित है और अपने बच्चों का इंतजार कर रहा है । अस्पताल में खून की कमी, परेशान डाक्टर और नर्स यह परिदृश्य है ।
प्रदर्शन का अर्थ ही होता है आक्रोशपूर्ण नारे और थोड़ी अराजकता । किन्तु क्या ऐसे में देखते ही गोली मारने का आदेश देना उचित है ?
जेनरेशन जेड, जिसे फेसबुक, इंस्टा, रेडिट, डिस्कॉर्ड, पबजी और फ्री फायर का शौकीन कहा जाता है, यानी १९९७ से २०१० के बीच पैदा हुई पीढ़ी, जिसे हम जेनजी भी कहते हैं, इस प्रदर्शन के केंद्र में हैं । इनके नारों में गुस्सा था और यह गुस्सा अनावश्यक भी नहीं था । लेकिन इस आवाज को दबाने के लिए आज सरकार ने जो कदम उठाए हैं वह निंदनीय है । क्या सरकारी संपत्ति किसी की जान से अधिक कीमती है ? वह संपत्ति भी आम नागरिक के टैक्स से निर्मित होती है और आज उसी आम नागरिक के घर का चिराग बुझ गया है । आज जो हुआ वह कदापि नहीं होना चाहिए था । आज की घटना ने प्रधानमंत्री ओली की छवि को बुरी तरह धूमिल कर दिया है । क्यों हर बार जान लेकर ही हर बार सुरक्षित होती है ? अब तक दो दर्जन जानें जा चुकी हैं । अस्पताल घायलों से भरे हुए हैं ।
नुकसान का ब्यौरा जुटाना मुश्किल हो रहा है । सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के बहाने जो हमारे युवा सड़कों पर उतरे हैं उन्हें शिकायत सरकार से थी उसकी अदूरदर्शितापूर्ण निर्णय से थी । दो दिन पहले ही यह तय था कि युवा पैदर्शन करने वाले हैं फिर क्यों नहीं उनसे किसी बातचीत की पहल की गई । क्यों नहीं किसी ने कोई मध्यस्थता की ? हर बार सरकार क्यों विफल हो रही है ?
ये युवा स्वतः स्फूर्त रुप में सड़कों पर हैं सिर्फ स्नैपचैट, डिस्कॉर्ड, रेडिट आदि नेटवर्कों की आभासी अपीलों के माध्यम से । नेपाल, एक ऐसा देश जहाँ लगातार आंदोलन होते रहे हैं । इस नई पीढ़ी ने अपने जीवनकाल में कोई बड़ा परिवर्तनकारी आंदोलन नहीं देखा, बल्कि फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, रेडिट आदि पर अपनी भावनाओं और गुस्से को व्यक्त किया है, जो इस समय सड़कों पर हैं । यह पीढ़ी समझती है कि सोशल मीडिया बंद होने से उनकी जीवनशैली पर कब्ज़ा कर लिया गया है । यह आक्रोश इनमें मौजूद है । ये नई पीढी देश को समझने और परिवर्तन की मांग कर रहे हैं जो देश को एक नई दिशा दे । आज यह धारणा तो अवश्य समाप्त हो गई कि हमारे युवा सिर्फ विदेश जाने के इच्छुक हैं । वो अपने देश में रहना चाहते हैं किन्तु क्या यह हमारे नेता दे पाए ? यह धारणा कि नई पीढ़ी देश को नहीं जानती और राजनीति को नहीं समझती, आज चकनाचूर हो गई है । एक नया वर्ग उन लोगों के खिलाफ सड़कों पर उतर आया है जो पिछले सभी परिवर्तन आंदोलनों में सक्रिय थे और अब सत्ता, सत्ता और विपक्ष में हैं । हिंसा और उग्रवाद उनके विकल्पों में शामिल नहीं थे । हालाँकि दुर्गा प्रसाद सहित कुछ उग्रवादी, दक्षिणपंथी और अराजकतावादी समूहों ने इस एजेंडे को हाईजैक करने की कोशिश की, लेकिन युवाओं ने उन्हें कामयाब नहीं होने दिया था बावजूद इसके इनकी जान चली गई ।
कर्फयु के बावजूद वातावरण तनाव में है । पूरा नेपाल तनावग्रस्त है । इस प्रदर्शन को हिंसक कैसे बनाया गया यह अभी समझ में नहीं आ रहा । पुलिस को फूल देने और सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट करने से शुरू हुआ यह प्रदर्शन, एक भड़काऊ आंदोलन में कैसे बदल गया । नेपाल की सत्ता के केंद्र माने जाने वाले सिंह दरबार के सामने शुरू हुआ यह प्रदर्शन संसद भवन परिसर में घुस गया। प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रण से बाहर मानते हुए कर्फ्यू जारी कर दिया है । अभिभावक परेशान हैं । कितने ही स्कूल में बच्चे फसे हुए हैं । अब बहुत हुआ, अब और नहीं, जैसे समूह और बिबेकशील नेपाली दल, जो पहले उज्ज्वल थापा के नेतृत्व में आगे बढ़ा था, के करीबी सामाजिक अभियान चलाने वाले युवा इसे अनौपचारिक रूप से संगठित कर रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और बालेन के करीबी युवा इसमें सक्रिय रूप से शामिल दिख रहे हैं । त्रिभुवन विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले कई छात्र कीर्तिपुर से बानेश्वर आए हैं ।
जेन जी के इस विद्रोह के प्रति सरकार ने जो अमानवीयता दिखाई है, जो रक्तपात किया है वह विस्मृत होने वाला नहीं है और ना ही किसी मुआवजे और माफी की यहाँ कोई गुजांइस नहीं है ।

