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भगवान विश्वकर्मा : दुनिया के पहले इंजीनियर और वास्तुकार 

 

विश्वकर्मा जयंती विशेष   

               

विनोदकुमार विमल, काठमांडू, १७सितम्बर । भगवान विश्वकर्मा सारे विश्व के द्रष्टा है । स्वर्गलोक तक व्याप्त है । भगवान विश्वकर्मा किसी विशिष्ट देवता के अवतार नहीं , बल्कि उन्हें सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का वंशज और सातवें पुत्र माना जाता है l कुछ धार्मिक ग्रंथों में विश्वकर्मा  को भगवान शिव का अवतार भी बताया गया है l भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का देव शिल्पी और आदि अभियंता  भी कहा जाता है l कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा सृष्टि के निर्माण के कार्य के लिए प्रकट हुए थे l महाभारत और हरिवंश में वसु प्रभास और योग – सिद्ध के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है l

एक कथा के अनुसार यह मान्यता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में सर्वप्रथम ` नारायण` अर्थात्  साक्षात् विष्णु भगवान क्षीर सागर में शेषशैय्या पर आविर्भूत हुए l उनके नाभी – कमल से चतुर्मुख ब्रह्मा दृष्टि गोचर हो रहे थे l ब्रह्मा के पुत्र ` धर्म ` तथा धर्म के पुत्र ` वास्तुदेव ` हुए l कहा जाता है कि ` वस्तु` नामक स्त्री ( जो दक्ष की कन्याओं में से एक थी ) से उत्पन्न ` वास्तु` सातवें पुत्र थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्त्तक थे l उन्हीं वास्तुदेव की ` अंगिरसी`  नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे l अपने पिता की भाँति ही विश्वकर्मा भी आगे चलकर ` वास्तुकला` के अद्वितीय आचार्य बने l

भगवान विश्वकर्मा का जन्म कथा संक्रान्ति के दिन हुआ माना जाता है , जिसे हर साल 17 सितम्बर को विश्वकर्मा जयंती के रूप में मनाया जाता है l भगवान विश्वकर्मा सामान्यतः चार भुजाओं वाले सुनहरे रंग के, स्वर्ण आभूषण धारण किए, शिल्प और औजारों के साथ चित्रित किए जाते हैं l स्कन्दपुराण के नागर खंड में विश्वकर्मा देव के वंशजों की चर्चा की गई है l उनके पांच मुख  ( सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान ) हैं l इन पांच मुखों से उन्होंने पांच प्रजापति बनाए, जिनके नाम थे – मनु ( ऋषि मनु विश्वकर्मा ), मय ( सनातन ऋषि मय ), त्वष्टा ( अहभून  ऋषि त्वष्टा ), शिल्पी ( प्रयत्न ऋषि शिल्पी  ) और दैवज्ञ ( दैवज्ञ ऋषि ) l ऋषि मनु विश्वकर्मा ` सानग गोत्र ` के कहे जाते हैं l ये लोग लोहे कर्म के उद्गाता हैं l इनके वंशज लोहकार के रूप में माने जाते हैं l सनातन ऋषि मय  ` सनातन गोत्र ` के कहे जाते हैं l ये बढई के कर्म के उद्गाता हैं l इनके वंशज काष्टकार के रूप में माने जाते हैं l अहभून ऋषि त्वष्टा का दूसरा नाम त्वष्टा है जिनका गोत्र अहँभन है l इनके वंशज ताम्रक के रूप में जाने जाते हैं l  प्रयत्न ऋषि शिल्पी का  दूसरा नाम शिल्पी है जिनका गोत्र प्रयत्न है l इनके वंशज शिल्पकला के अधिष्ठाता है और इनके वंशज संगतराश भी कहलाते हैं, इन्हें मूर्तिकार भी कहते हैं l  दैवज्ञ ऋषि  का गोत्र सुर्पण है l इनके वंशज स्वर्णकार के रूप में माने जाते हैं l ये रजत, स्वर्ण आदि धातु के शिल्पकर्म करते हैं l

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हिन्दू धर्मशास्त्रों और ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा के पाँच स्वरूपों और अवतारों का वर्णन मिलता है – 1. विराट विश्वकर्मा ( सृष्टि के रचयिता ), 2. धर्मवंशी विश्वकर्मा ( महान् शिल्प विधाता और प्रभात पुत्र ), 3 . अंगिरावंशी विश्वकर्मा ( आदि विज्ञान विधाता वसुपुत्र ), 4. सुन्धवा विश्वकर्मा ( महान् शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता अथवी ऋषि के पौत्र ), 5. भृगुवंशी विश्वकर्मा ( उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य ) l

शास्त्रों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने सृष्टि की रचना में ब्रह्मा की सहायता की और संसार की रूपरेखा का नक्शा तैयार किया l रामायण में वर्णन  मिलता है कि रावण की लंका सोने की बनी थी l ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने पार्वती से  विवाह  के बाद विश्वकर्मा से सोने की लंका का निर्माण करवाया था l शिवजी ने रावण को पण्डित के तौर पर गृह पूजन के लिए बुलवाया l पूजा के पश्चात रावण ने भगवान शिव से दक्षिणा में सोने की लंका ही मांग ली l सोने की लंका को जब हनुमानजी ने सीता की खोज के दौरान जला दिया तब रावण ने पुनः विश्वकर्मा को बुलवाकर उनसे सोने की लंका का पुनर्निर्माण करवाया l

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मान्यता है कि पौराणिक संरचनाएं भगवान विश्वकर्मा ने ही की थी और वे दुनिया के सबसे पहले इंजीनियर और वास्तुकार थे l वह वास्तुदेव तथा माता अंगिरसी के पुत्र हैं l भगवान विश्वकर्मा वास्तुकला के आचार्य माने  जाते हैं l सोने की लंका, इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, पाण्डवपुरी, कुबेरपुरी, शिवमण्डलपुरी तथा सुदामापुरी आदि का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया l पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोगी होनेवाले वस्तुएँ भी इनके द्वारा बनाए गया है l कर्ण का कुँडल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशुल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है l

वर्तमान समय में हर व्यक्ति सुबह से शाम तक किसी न किसी मशीनरी का इस्तेमाल जरूर करता है ,जैसे – कम्प्युटर, मोटर साईकल, कार, बस, पानी का मोटर, बिजली के उपकरण, साईकल आदि l भगवान विश्वकर्मा इन सबके देवता माने जाते हैं l इसलिए वर्तमान युग में भगवान विश्वकर्मा का महत्त्व दिन व दिन बढ़ता  जा रहा है l यही वजह है कि पहले सिर्फ शिल्पकार ही इनकी पूजा किया करते थे  लेकिन अब हर घर – घर में इनकी पूजा होने लगी है l  ऐसी मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से मशीनरी लंबे समय तक साथ निभाती है एवं जरुरत के समय धोखा नहीं देती है  l धार्मिक मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से व्यक्ति अपने जीवन में तरक्की की राह पर अग्रसर होता है l इसके साथ ही भूमि और भवन संबंधी सपने भी पूरे होते हैं l

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भगवान विश्वकर्मा धार्मिक प्रतीक के साथ – साथ ज्ञान, तकनीक और सृजनात्मकता के प्रतीक हैं l वर्तमान युग में जब विज्ञान और तकनीक का बोलबाला है, तब भगवान विश्वकर्मा की प्रासंगिकता और भी बढ़  जाती है l वे हमें यह सिखाते हैं कि सृजन ही जीवन का मूल है और प्रत्येक कार्य अगर श्रद्धा और निष्ठा से किया जाय तो वह ईश्वर की उपासना बन जाता है l भगवान विश्वकर्मा की कार्यशैली हमें यह सिखाती है कि यदि हम समन्वय, योजना और संसाधनों के  प्रबंधन में दक्ष हों, तो कोई कार्य असंभव नहीं l यह केवल आस्था की बात नहीं है, बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए भी अत्यंत उपयोगी है l

आज विश्वकर्मा जयंती, दिव्य शिल्पगुरु, वास्तुकार और सृष्टि के महान् सर्जक भगवान विश्वकर्मा की आराधना का  दिन l हर धातु में जिनका आराधना है, हर शिल्प में जिनका वास है, ऐसे देव विश्वकर्मा का आशीर्वाद आप सभी पर  सदैव  बना रहे … विश्वकर्मा  जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं !

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