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भारत और नेपाल के संदर्भ में नेपाली और हिंदी ­: गोपाल ठाकुर

 
gopal thakur
गोपाल ठाकुर

सन् १९३३ से २००६ तक नेपाल की एक मात्र राष्ट्रभाषा नेपाली रहती आई दिखती है । संवैधानिक तौर से नेपाल अधिराज्य का संविधान­१९५९, नेपाल का संविधान­१९६२ और नेपाल अधिराज्य का संविधान­१९९० ने नेपाली को यही सर्वश्रेष्ठ दर्जा दिया है । किंतु गोरखा साम्राज्य को नेपाल नाम देने के बाद से आज तक भाषा प्रयोग के क्षेत्र में नेपाल बहुभाषी ही रहता आया है । इस गोरखा राज्य विस्तार अभियान से पहले केवल अभी की राजधानी घाटी ही नेपाल कहलाती थी और वहाँ की भाषा तब से अब तक नेपाल भाषा के नाम से समृद्ध रूप में स्थापित है । फिर भी शासकों की एक मात्र भाषा यहाँ नेपाली हो गई । तर्क भी दिया जाता है, देश की एक आधिकारिक भाषा तो होनी ही चाहिए । हमारे निकटस्थ पड़ोसी देशों में भी ऐसे अभ्यास हैं कहकर प्रमाण दिए जाते हैं । जैसा कि चीन में चीनी, बंगलादेश में बंगला, पाकिस्तान में उर्दू और भारत में हिंदी । इस तरह देश के नाम से ही बना विशेषण भाषा के नाम के लिए चीन और बंगलादेश में प्रयुक्त हुआ दिखता है । कुछ दूर चलें तो अन्यान्य देशों में भी मिलता है । किंतु यथार्थ कुछ ऐसा है कि इस तरह देश के नाम से बने विशेषण के रूप में उदीप्यमान भाषाएँ उन देशों में बहुसंख्यक जनता की भाषा रही हैं । उदाहरण के लिए चीन में मंडारिन चीनी बोलने वाले ९२ प्रतिशत, बंगलादेश में बंगला बोलने वाले ९८ प्रतिशत और कुछ दूर चलें तो बेलायत में अंग्रेजी बोलने वाले ९५ प्रतिशत से अधिक मिलते हैं । इसके अलावा देश की आधिकारिक एकल भाषा प्रयोग करने वाले देशों के नाम उन भाषाओं के नाम से जुड़ा नहीं दिखता । उदाहरण के लिए भारत में ४१ प्रतिशत लोगों की भाषा हिंदी, भूटान में २४ प्रतिशत की जोंखा और पाकिस्तान में ७.५ प्रतिशत जनता की मातृभाषा उर्दू उनकी कामकाजी भाषाएँ हैं किंतु देश के नाम से उन्हें कथित राष्ट्रीयता से जोड़ा नहीं गया है । इसके अतिरिक्त भारत ने प्रांतीय स्तर पर २२ भाषांओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज कर केवल कामकाजी भाषा ही नहीं बनाया है, अपनी कागजी मुद्रा में भी उन भाषाओं को स्थान दिया है । इनमें नेपाली भी पड़ती है ।
एक भाषा एक भेष की नीति को लंबे समय तक आगे बढ़ाने के बावदूद सन् २०११ की जनगणना के अनुसार नेपाली नाम दी गई खस­गोर्खाली भाषा बोलने वाले नेपाल में ४४.६ प्रतिशत ही हैं । राज्य इस भाषिक अभ्यास से एक सवाल अवश्य खड़ा किया है, नेपाल की ५५.४ प्रतिशत जनता को नेपाली माना जाए या नहीं ? यदि माना जाए तो अल्पसंख्यकों की भाषा अगर देश के नाम की सरताज पहनती है तो हमारी राष्ट्रीय एकता कितनी सबल होगी ? यदि नहीं माना जाए तो बहुसंख्यक जनता को राष्ट्रीय स्वाभिमान से वंचित करने का अधिकार हमारे शासकों को किसने दिया और अब भी ये तानाशाही कब तक चलेगी ?
अब भारत और नेपाल के संदर्भ में नेपाली और हिंदी पर कुछ विचार करें । ऊपर कहा जा चुका है, नेपाली भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सुचीकृत भाषा है । उसी प्रकार हिंदी भी नेपाल के अंतरिम संविधान­२००७ के तहत नेपाल की एक राष्ट्रभाषा है । क्योंकि इस संविधान की धारा ५ की उपधारा १ ने नेपाल में बोली जाने वाली सभी भाषाओं को नेपाल की राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया है और नेपाल की जनगणना, २०११ ने हिंदी को नेपाल में ७७,५६९ लोगों की मातृभाषा दिखाया है । इस प्रकार हिंदी को केवल भारत और नेपाली को केवल नेपाल के पर्याय के रूप में संवैधानिक रूप से समझना भी त्रुटीपूर्ण ही दिखता है ।
राष्ट्रीयता के आधार पर देखा जाए तो हिंदी बोलने वाला नेपाल का कोई भी नागरिक अपने को भारतीय कहकर परिचित कराना नहीं चाहता है । बल्कि गैर पहाड़ी चेहरा द्वारा किसी के हिंदी बोलते ही उसे भारतीय समझे जाने का मनोविज्ञान नेपाल की शासकीय मानसिकता की उपज है । ठीक उसके विपरीत नेपाली बोलने वाले भारतीय लोग स्वयं को अन्य भारतियों से कहलवाने की वजाय खुद नेपाली कहना पसंद करते हैं । उतना ही नहीं, किसी भी रूप में नेपाल प्रवेश करना चाहे तो उनके लिए नेपाल की नागरिकता भी सहज है । अब तक के हमारे प्राज्ञिक इतिहास में वैसे भारतीय नागरिक प्रज्ञा­प्रतिष्ठान के कुलपति­उपकुलपति भी रह चुके हैं । भारतीय नागरिक प्रशांत तामाङ के इंडियन आइडल के लिए हिंदी में गीत गाने पर भी कथित नेपालियों ने मरमीट कर उन्हें वोट डाल कर जो जिताने का उपक्रम किया, वह तीता सत्य हमारे आगे अब भी उपस्थित है । इस प्रकार भारतीय नागरिकों को नेपाली कहने पर गर्व होने किंतु जनता की जीवन शैली और प्रचलन में रही सांझी भाषा हिंदी के प्रयोग से भारतीय विस्तार का भय महसुस करने के पाखंड को मैंने अब तक समझा नहीं ।
परंतु नेपाल में हिंदी के बारे में गजब की दोधारी मानसिकता दिखती है । एक ओर हिंदी विरोध को नेपाली राष्ट्रीयता का पर्याय मानना, दूसरी ओर भारतीय संचार माध्यम या मंचों पर हिंदी विरोधियों को नेपाली बिसर कर हिंदी बोलते देखना और सुनना भी यहाँ अजूबा नहीं है । नेपाल के एक प्रधानमंत्री को भारतीय संचारकर्मियों से बड़ी अथक कोशिश के साथ हिंदी बोलते अपनी ही आँखों देखा है, अपने ही कानों सुना भी है । सामान्यतया ऐसी स्थिति में अन्य देश के उच्चपदस्थ अधिकारियों को द्विभाषी से अनुवाद करवाने का प्रचलन देखा जाता है । परंतु हिंदी के संदर्भ में हमारे यहाँ ऐसा नहीं है ।
इसका अर्थ नेपाल में हिंदी प्रवद्र्धन आंदोलन चला ही नहीं, ऐसा नहीं है । भारतीय विदेश मंत्रालय ने हिंदी के वैश्विक प्रचार­प्रसार के लिए निश्चित बजट सहित एक विभाग ही खड़ा किया है । अन्य देशों में भारतीय राजदूतावास या उच्चायोग के जरिए इसका कार्यान्वयन होता है । इसी के तहत १० जनवरी को विश्व हिंदी दिवस भी मनाया जाता है । किंतु गजब का पाखंड प्रदर्शन की अनुभूति मैंने समय­समय पर ऐसे अवसरों पर भी की है । हिंदी अभ्यास के क्षेत्र में गुमनाम से लेकर सालभर हिंदी के विरोध करने वालों का वहाँ केवल दर्शन मात्र नहीं होता, उन्हें हिंदी के पक्ष में वकालत करते भी देखा जाता है ।
नेपाली और हिंदी के संबंध में भारत और नेपाल में राज्य­प्रायोजित ऐसे विरोधाभाषी अभ्यासों के दौर के बावजूद जनस्तर पर ये दोनों भाषाएँ दोनों देशों की सांझी भाषाएँ हैं । किंतु इस यथार्थ को जनस्तर तक पहुँचाने के लिए जनस्तर पर ही नेपाल में हिंदी और भारत में नेपाली भाषा­साहित्य की गतिविधियाँ आयोजित की जानी चाहिए । अब तक भारत में किसी नेपाली भाषा­साहित्य की गतिविधि को सीधा देखने का मौका मुझे नहीं मिला है परंतु हाल ही में नेपाल के पोखरा में आयोजित ऐसी एक जमघट में सहभागी होने का अवसर मिला तो कुछ हर्ष और कुछ विष्मात् की अनुभूति जरूर हुई ।
साहित्यकार, पत्रकार तथा कलाकारों की अपनी ही पहलकदमी में संचालित सृजनगाथा डॉट कॉम तथा विंध्य न्यूज नेटवर्क सहित कुछ सामाजिक संजालों ने ‘लमही से लुंबिनी’ शीर्षक के तहत हमारे ही पोखरा में में महीने की २१ और २२ तारीख को दसवें अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया था । उन में से विजय शंकर चतुर्वेदी और जयप्रकाश मानस से मेरा सामान्य परिचय था । उन्होंने मुझे इस अवसर पर आमंत्रित किया । पर्वत­कास्की के संगीत श्रोता और अनिल श्रेष्ठ सहित हिंदी की सह­प्राध्यापिका डॉ. संजीता वर्मा के साथ काठमाड़ो से मैं भी पहुँचा । उद्घाटन सहित कुछ सत्रों में मुख्य अतिथि की जिम्मेदारी भी निर्वाह करने का अवसर मिला । वहाँ भारतीय नेपाली साथियों से भी मुलाकात हुई । समझते जाने पर नेपाल में मधेशियों की पीड़ा के सादृश्य भारत में उनकी भी पीड़ा कम नहीं लगी जिसकी झलक उनकी अभिव्यक्तियों और कार्यपत्रों में मिलती थी । किंतु ऊपर वर्णित पाखंडों के बारे में जब मैंने उन्हें बताया तो वे दंग रह गए । खास कर अपनी विलग राष्ट्रीय पहचान के कारण मधेश जिस पीड़ा को भुगत रहा है वह उन्हें अजूबा लगा । सहजता तो मुझे भी महसूस नहीं हुई । नेपाल में मधेशवाद स्थापित करने की चेष्टा में रहे कुछ मित्रगण पर भारतपरस्थ की बदनामी भले ही मढ़ दी जाए, भारतीय जनता को तो मैंने इससे अनभिज्ञ ही पाया । सार­संक्षेप में मेरी अनुभूति कुछ इस तरह की रही कि किनारीकृत राष्ट्रीयताओं की समस्या का समाधान ढूँढने की वजाय उसे हमेशा एक उलझन के रूप में जीवित रख खोखली पद­प्रतिष्ठा के लेनदेन के उपकरण के रूप में नेपाल­भारत के शासक तथा सतही राजनीति उसका प्रयोग कर रहे हैं ।
फिर भी जब मैंने उन्हें एक प्रश्न किया, ‘ऐसे भूकंप की जोखिम में हम तो खुद झुलस रहे हैं, फिर ऐसी अवस्था में आपलोगों ने यहाँ हिंदी सम्मेलन का आयोजन क्यों किया ?’ तो उनका उत्तर था, ‘उपभोग्य अवधि समाप्त खाद्य सामग्रियाँ, औषधियाँ और फटे­पुराने कपड़े तो हमारे पास नहीं हैं । हम भौतिक रूप में आपका संकट मोचन करने का सामथ्र्य भी नहीं रखते । किंतु आप लोग जिस प्राकृतिक घाव और चोट से हपm्तों से पीडि़त हैं उस पर, थोड़ा ही सही, मलहम लगाने के उद्देश्य से आप के कष्ट में भागीदार होने हम जानबूझ कर अपने जीवन को जोखिम डालते यहाँ आ पहुँचे हैं । लेकिन ऐसी विपदा में भी आप लोगों ने मधुर मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया । आपकी इस सहनशीलता के आगे हम नतमस्तक हैं ।’ उस समूह में मैंने साठ से उपर की उम्र वालों की उपस्थिति करीब आधे से अधिक देखी थी । निश्चय ही मेरी सहनशीलता में इसने और अदम्य साहस का संचार किया है । ऐसी साहसिक यात्रा करने वाले मेरे उन मित्रों को मेरा सलाम !
वाणस्थली, महादेवस्थान–­७, काठमांड़ू
प्रतीक दैनिक, में २७, २०१५ को नेपाली में पहली बार प्रकाशित

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