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“संघ का शताब्दी वर्ष : आपातकाल की ज्वाला से सेवा की ज्योति तक”

 
– डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत का आधुनिक इतिहास अनेक उतार-चढ़ावों और संघर्षों से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज़ादी के बाद लोकतंत्र की रक्षा तक, कई संगठन और व्यक्तित्व देश की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक ऐसा संगठन है जिसने न केवल राष्ट्र निर्माण के सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में योगदान दिया, बल्कि कठिनतम परिस्थितियों में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी अग्रणी भूमिका निभाई। विशेष रूप से 1975-77 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा थी। इस कालखंड ने संघ की संगठनात्मक क्षमता, साहस और राष्ट्रनिष्ठा को परखने का अवसर दिया। आज जबकि संघ अपने शताब्दी वर्ष (2025-26) की ओर बढ़ रहा है, यह स्मरण करना स्वाभाविक है कि आपातकाल के समय किए गए संघर्ष ने भारतीय राजनीति और समाज को किस प्रकार नई दिशा दी।
आपातकाल की पृष्ठभूमि
25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू करने की घोषणा की। आधिकारिक रूप से इसका कारण आंतरिक अशांति बताया गया, परंतु वास्तविक कारण राजनीतिक था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किया था, जिससे उनके प्रधानमंत्री पद पर संकट आ गया था। सत्ता बचाने के लिए उन्होंने संविधान की मूल भावना को ही दरकिनार करते हुए आपातकाल लागू कर दिया।
इस दौरान नागरिक स्वतंत्रताएँ समाप्त कर दी गईं। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, विरोध करने वाले लाखों लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। विपक्षी दलों के नेताओं के साथ-साथ सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया गया। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक अंधकारमय काल था।
संघ की परीक्षा और संघर्ष
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उस समय एक विशाल संगठन था। लाखों स्वयंसेवक गाँव-गाँव, शहर-शहर सामाजिक सेवा और राष्ट्रभक्ति की भावना जगाने में लगे हुए थे। आपातकाल लागू होते ही सरकार ने संघ को भी प्रतिबंधित कर दिया। हजारों स्वयंसेवक जेलों में डाल दिए गए। अनुमान है कि 1,00,000 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और लगभग 30,000 से अधिक स्वयंसेवक भूमिगत होकर गुप्त रूप से आंदोलन चलाते रहे।
संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने भयभीत हुए बिना लोकतंत्र की रक्षा का बीड़ा उठाया। जहां विपक्षी दलों के कई नेता जेलों में बंद थे, वहीं संघ के स्वयंसेवक भूमिगत होकर जनता को जागरूक कर रहे थे। वे गुप्त पत्रक निकालते, संदेश पहुँचाते और सत्याग्रह के माध्यम से जनता में प्रतिरोध की भावना जगाते। यह संगठनात्मक अनुशासन और साहस ही था कि पूरे देश में लोकतंत्र बचाने का अभियान जीवित रहा।
भूमिगत आंदोलन और संगठनात्मक क्षमता
आपातकाल के दौरान संघ ने अपनी मजबूत शाखा व्यवस्था और अनुशासित संगठन का उपयोग किया। हजारों कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहते हुए आंदोलन की मशाल जलाए रखी। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, नागपुर, कोलकाता, चेन्नई और लखनऊ जैसे बड़े शहरों से लेकर गाँव-गाँव तक संदेश पहुँचाए जाते रहे।
केंद्र सरकार ने बार-बार यह दावा किया कि विरोध समाप्त हो चुका है, लेकिन संघ की गुप्त गतिविधियों ने सरकार की नींद हराम कर दी। यही कारण था कि इंदिरा गांधी सरकार ने संघ को विशेष रूप से निशाना बनाया और इसे कुचलने के लिए पूरी ताकत लगा दी। परंतु सत्य यह है कि जितना दमन बढ़ता गया, उतनी ही ताक़त से संघ का प्रतिरोध भी बढ़ता गया।
लोकतंत्र की बहाली और जनता पार्टी की सरकार
आपातकाल की 21 महीनों की अवधि ने जनता को यह सिखा दिया कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र का महत्व क्या होता है। जब 1977 में चुनाव की घोषणा हुई, तो पूरे देश में इंदिरा गांधी और कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश फूट पड़ा। संघ के स्वयंसेवकों ने विपक्षी दलों के नेताओं के साथ मिलकर चुनाव प्रचार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
जनता पार्टी का गठन हुआ और उसे अप्रत्याशित विजय मिली। इंदिरा गांधी की करारी हार हुई। यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ था, जहां संघ ने न केवल लोकतंत्र की रक्षा की बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक धारा को भी मजबूत आधार प्रदान किया।
समाज पर आपातकाल का प्रभाव
आपातकाल का एक बड़ा सकारात्मक पहलू यह रहा कि इसने जनता को जागरूक कर दिया। नागरिक स्वतंत्रताओं के महत्व का बोध हुआ और लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प और मजबूत हुआ। संघ ने इस जागरूकता को स्थायी बनाने के लिए समाज में व्यापक अभियान चलाए।
आज भी जब लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चर्चा होती है, तो आपातकाल का उदाहरण दिया जाता है। यह कालखंड इस बात का प्रतीक है कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में सत्ता के दमन के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध आवश्यक है।
संघ की वर्तमान भूमिका और शताब्दी वर्ष का महत्व
संघ आज अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. हेडगेवार द्वारा स्थापित इस संगठन ने बीते सौ वर्षों में सेवा, संगठन और राष्ट्र निर्माण का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।
आपातकाल के संघर्ष ने संघ की छवि को और भी प्रखर बनाया। आज संघ केवल शाखाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समरसता जैसे अनेक क्षेत्रों में कार्यरत है।
शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ ने व्यापक जनजागरण अभियान की योजना बनाई है। देशभर में लाखों स्वयंसेवक घर-घर जाकर संपर्क करेंगे। समाज के हर वर्ग तक पहुँचने का प्रयास होगा ताकि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक जागरण को और मजबूत किया जा सके।
संघ का संघर्ष और समर्पण
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा थी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर यह सिद्ध कर दिया कि संगठन की शक्ति ही परिवर्तन की सच्ची साथी होती है। हजारों स्वयंसेवकों ने जेल की यातनाएँ सहीं, भूमिगत रहकर संघर्ष किया और लोकतंत्र की लौ बुझने नहीं दी।
आज जब संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है, तो यह केवल एक संगठन का उत्सव नहीं है बल्कि राष्ट्र की उस जीवटता का प्रतीक है जिसने हर संकट में लोकतंत्र और स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा। आपातकाल का संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है और यह संदेश देता है कि परिवर्तन की धारा को कोई भी सत्ता, कोई भी दमन लंबे समय तक रोक नहीं सकता।
इस शताब्दी वर्ष में संघ केवल अतीत की गौरवगाथा का स्मरण ही नहीं कर रहा, बल्कि भविष्य के भारत के निर्माण की दिशा भी तय कर रहा है। एक ऐसा भारत जो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, सामाजिक रूप से समरस, और राजनीतिक रूप से सशक्त हो।
– डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी,
 हरियाणा – 127045, मोबाइल :9466526148,01255281381

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