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मधेश में ‘ध्रुवीकरण’ की दौड़: क्या मधेशी दल अंतिम क्षण में एकजुट हो पाएंगे?

 

जनकपुरधाम, ७दिसंबर । मधेश की राजनीति एक बार फिर ध्रुवीकरण और चुनावी तैयारी के दौर में दाखिल हो रही है। जेन-जी आंदोलन के बाद बढ़ते राजनीतिक प्रभाव और आगामी 21 फागुन के चुनाव को ध्यान में रखते हुए मधेश-केन्द्रित दलों में एकता, तालमेल और चुनावी मोर्चा की चर्चा तेज हो गई है।

 पहले भी बना था ‘मोर्चा’, पर साथ नहीं रहा

चैत्र 21 को

  • जसपा नेपाल
  • नागरिक उन्मुक्ति
  • राष्ट्रिय मुक्ति
  • लोसपा
  • जनमत
  • जनता प्रगतिशील
  • तमलोपा

ने मिलकर संघीय लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा घोषित किया था।

लेकिन व्यावहारिक राजनीति में दल अलग-अलग दिशा में सक्रिय हैं।

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 अब लक्ष्य—एकता या कम से कम चुनावी गठबंधन

मोर्चा के अंदर जसपा, लोसपा, जनता प्रगतिशील और तमलोपा के बीच एकीकरण, चुनावी तालमेल और साझा चुनाव चिह्न पर चर्चा चल रही है।

लोसपा नेता सुरेंद्र झा के अनुसार—

“अगर पूरी एकता न हो पाए तो भी चुनावी मोर्चा जरूरी होगा.”

‘जाँतो’ जाँता चुनाव चिह्न पर सहमति!

जसपा, राष्ट्रीय मुक्ति और नागरिक उन्मुक्ति ने पहले ही “जाँतो” चुनाव चिह्न पर लड़ने की सहमति बनाई है और अन्य दलों को भी यही प्रतीक लेने का आग्रह किया है।

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 उज्यालो नेपाल से भी संवाद!

एलजेपी के नेता केशव झा ने बताया है कि कुलमान घिसिंग की उज्यालो नेपाल पार्टी से भी चुनावी तालमेल की बात चल रही है।

जनमत पार्टी का अपना अलग रूख

सिके राउत की जनमत पार्टी गठबंधन वार्ता में शामिल है, लेकिन अगर उसका प्रतीक “हॉर्न” पर सहमति न बन पाई तो वह अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दे रही है।

 क्यों जरूरी है ‘संयुक्त शक्ति’?

मधेशी दलों का मानना है कि

  • पुरानी राष्ट्रीय पार्टियों से सीधी भिड़ंत
  • घटता राजनीतिक प्रभाव
  • और मधेश आंदोलन की भावनात्मक विरासत
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इन सबको देखते हुए “संयुक्त शक्ति” ही विकल्प बचता है।

एक नेता के अनुसार—

“संगठनात्मक रूप से, अकेले कोई भी दल कांग्रेस-एमाले के सामने बड़ी ताकत नहीं बन सकता।”

 अंतिम सवाल

क्या मधेशी दल चुनाव से पहले एकीकरण कर पाएंगे?
क्या चुनाव चिह्न एक होगा या सिर्फ गठबंधन?
या फिर अंतिम समय में फिर सब अलग-अलग हो जाएंगे?

मधेश की राजनीति आने वाले कुछ हफ्तों में इसका जवाब दे देग

लेकिन संकेत साफ़ हैं:

ध्रुवीकरण तेज हुआ है और दबाव भी।

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