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जनकपुरधाम में ओडिसी नृत्य की अविस्मरणीय शाम : कैलास दास

 

जनकपुरधाम, २४ मंसिर। भारत के महावाणिज्य दूतावास द्वारा आयोजित कार्यक्रम के तहत बुधवार को जनकपुरधाम में प्रस्तुत किए गए ओडिसी नृत्य ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सन्ध्या कुंजन मेनन दास के नेतृत्व में प्रस्तुत इस शास्त्रीय नृत्य में अद्भुत कलात्मकता, भावपूर्ण अभिव्यक्ति और मनोहारी ताल का अनोखा संगम देखने मिला। कार्यक्रम ने नेपाल–भारत के बीच विद्यमान कला, संस्कृति और धार्मिक संबंधों को ही नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और एकता के गहन संदेश को भी उजागर किया।
कार्यक्रम में वीरगंज स्थित भारतीय महावाणिज्यदूत देवी सहाय मिना ने दर्शकों का स्वागत करते हुए कहा कि दोनों देशों के धार्मिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं ने आपसी संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भाषाई भिन्नता के बावजूद कथानक–आधारित अभिनय, धार्मिक प्रसंग और सांस्कृतिक प्रस्तुति ने दर्शकों को लगातार तालियाँ बजाने पर मजबूर कर दिया। लगभग डेढ़ घंटे चले इस कार्यक्रम में रामायणकालीन प्रसंग, गोपी–कृष्ण लीला और वृद्ध चरित्रों सहित विविध विषयों को पाँच कलाकारों की टीम ने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
ओडिशा में विकसित ओडिसी नृत्य प्राचीन देवदासी परंपरा से सम्बद्ध एक शास्त्रीय नृत्य शैली माना जाता है। महावाणिज्यदूत मिना के अनुसार इस नृत्य का इतिहास लगभग दो हज़ार वर्ष पुराना है, और उदयगिरि–खंडगिरि की गुफाओं में मिली मूर्तियाँ इसके प्रारंभिक प्रमाण मानी जाती हैं। जगन्नाथ मंदिर की महारी अथवा देवदासी परंपरा में प्रचलित नृत्य शैली ही आधुनिक ओडिसी का मूल आधार है।
ओडिसी की प्रमुख पहचान त्रिभंगी मुद्रा, चौक भंगिमा, मनोहर हस्तमुद्राएँ और नेत्राभिनय में निहित होती है। कृष्ण–राधा लीला, देवी–देवताओं की कथाएँ और भक्ति–भावना पर केंद्रित यह नृत्य शैली अपनी कोमलता, राग–लय और सौंदर्य के कारण विशिष्ट मानी जाती है।
पारंपरिक साड़ी, सुनहरे आभूषण, घुँघरू और ‘तहीया’ नामक विशेष मुकुट ने कलाकारों की वेशभूषा को और अधिक आकर्षक बनाया। नृत्य-शिक्षा को मंगलाचरण, बटु, पल्लवी, अभिनय और मोक्ष जैसे चरणों में विभाजित किया जाता है।
कार्यक्रम में मैथिली विकास कोष के अध्यक्ष जीवनाथ चौधरी, धनुषा के प्रमुख जिला अधिकारी, डीआईजी, विभिन्न अधिकारी तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही।

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