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मधेश आन्दोलन की उपलब्धियाँ और अधूरी यात्रा का गहन सत्य : कैलास दास

 

कैलास दास, जनकपुरधाम, १३ दिसम्बर। ऐतिहासिक मधेश आन्दोलन केवल विरोध का क्षणिक उफान नहीं था; यह सदियों से राज्य–संरचना से वंचित बनाए गए मधेशी, दलित, महिला, जनजाति, आदिवासी और अन्य सिमांतकृत वर्गों के अधिकार, सहभागिता और समानता की खोज में किया गया गहरा ऐतिहासिक प्रतिरोध था। नेपाल में मधेशी समुदाय को दबाने, शोषित करने, अवसरों से वंचित करने और पहचान के आधार पर भेदभाव करने की प्रवृत्ति बहुत पुरानी रही है। इसी अन्याय और उपेक्षा के विरुद्ध मधेश ने अपने अस्तित्व, सम्मान और राजनीतिक मान्यता के लिए संघर्ष का बिगुल फूँका।

मधेश आन्दोलन ने मधेश में जनचेतना को जागृत किया, मधेशवादी दलों की उपस्थिति मजबूत की, राज्य सत्ता से टकराने की क्षमता पैदा की और समुदाय को आत्मसम्मान के साथ बोलने का साहस दिया। जो मधेशी समुदाय कभी अपने अस्तित्व के बुनियादी अधिकारों से भी वंचित था, आज वही राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान के सवालों को मजबूती से उठा रहा है यह आन्दोलन का ही ऐतिहासिक परिणाम है।

मधेश केवल भूगोल नहीं; यह भाषा, जातीयता, संस्कृति और जीवनशैली की विविधता का एक उद्यान है, जिसे दशकों तक राज्य की दृष्टि में हाशिये पर धकेला गया था। नागरिकता जैसे बुनियादी अधिकार से लेकर प्रतिनिधित्व और सम्मान तक—मधेशी समुदाय हमेशा उपेक्षित किया जाता रहा। इसी दीर्घकालीन भेदभाव के विरुद्ध उठे प्रतिरोध ने नेपाल को एकात्मक प्रणाली से संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की ओर मोड़ दिया। संघीयता आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है, जिसके बिना आज वंचित समुदायों की राजनीति में सहभागिता सम्भव न होती।

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प्रदेश २ का “मधेश प्रदेश” नामकरण भी मधेश आन्दोलन के दबाव और पहचान–संघर्ष का सफल परिणाम है। पहचान आधारित संघीयता का विचार मधेश से ही जन्मा था और इसी ने राज्य–संरचना में विविधता को सम्मान देने की नई संस्कृति उत्पन्न की। प्रदेश का यह नाम केवल प्रशासनिक शब्द नहीं—यह मधेश की पहचान और सम्मान की औपचारिक मान्यता है।

दशकों तक हजारों मधेशी नागरिकता न मिलने के कारण अपने अस्तित्व को प्रमाणित तक नहीं कर पाते थे। बैंक खाता न खोल पाने से लेकर संपत्ति न खरीद पाने और सेवाओं में प्रतिस्पर्धा न कर पाने तक यह पूरी पीढ़ी की पीड़ा थी। मधेश आन्दोलन के बाद नागरिकता वितरण सहज हुआ और हजारों परिवारों ने राज्य–मान्यता का प्रमाण प्राप्त किया। कागज का एक पन्ना होते हुए भी यह आत्मसम्मान और पहचान का दस्तावेज है।

आन्दोलन ने प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में भी बड़े परिवर्तन की नींव रखी। पहले राज्य के संवैधानिक, प्रशासनिक और सुरक्षा निकायों में मधेशी उपस्थिति अत्यंत सीमित थी। सुधार के नाम पर भी मधेश को उपेक्षित रखना सामान्य था। लेकिन आन्दोलन के बाद समावेशी प्रतिनिधित्व एक बाध्यकारी सिद्धांत बना। स्थानीय तह से लेकर संघीय संसद तक मधेशी, जनजाति, दलित और महिलाओं की सहभागिता उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। राज्य अब केवल काठमांडू–केन्द्रित नहीं रहा; समुदाय की आवाज नीति में परिवर्तित होने लगी।

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आरक्षण व्यवस्था भी मधेश आन्दोलन के दबाव से संस्थागत हुई। संघ, प्रदेश और स्थानीय सेवाओं में आरक्षण खुलने से हजारों मधेशी युवाओं ने पहली बार राज्य–संरचना में प्रवेश का अवसर पाया। यह केवल आर्थिक अवसर नहीं, यह सामाजिक सम्मान की पुनःस्थापना है। सरकारी संरचना कुछ लोगों के वर्चस्व का प्रतीक नहीं रही; यह विविध आवाजों वाले लोकतांत्रिक ढाँचे में बदलने लगी।

राजनीतिक अधिकारों की दृष्टि से भी आन्दोलन निर्णायक सिद्ध हुआ। मधेशी समुदाय की आवाज अब सड़क तक सीमित न रहकर सरकार, संसद, प्रदेश सभा और स्थानीय निकायों में प्रत्यक्ष सहभागिता में परिवर्तित हुई है। यह परंपरागत नेतृत्व संरचना में बड़ा बदलाव है जो दिखाता है कि आन्दोलन केवल प्रतिरोध नहीं, नेतृत्व तैयार करने का विद्यालय भी है। हालांकि पूर्ण समानता की यात्रा अभी भी अधूरी है । सहभागिता का विस्तार, नीतिगत प्रभावशीलता और पहचान का सम्मान अभी और मजबूती चाहता है।

संघीयता लागू होने के बाद मधेश में आर्थिक रूपान्तरण की गति भी तेज हुई है। स्थानीय निकायों की बजट–स्वायत्तता, प्रदेश सरकारी प्राथमिकताएँ, सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार सुविधाओं का विस्तार—इन सभी परिवर्तनों ने मधेश का सामाजिक–आर्थिक जीवन गतिशील बनाया है। काठमाण्डू–निर्देशित विकास के बजाय अब स्थानीय जरूरतों और सहभागिता पर आधारित विकास मॉडल उभर रहा है। व्यापार, सेवा, कृषि आधुनिकीकरण और रोजगार के अवसरों का विस्तार मधेश के रूपान्तरण का संकेत देता है। मानव विकास सूचकांक में मधेश प्रदेश का सुधार संघीय संरचना की प्रभावशीलता को सिद्ध करता है।

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लेकिन उपलब्धियों के बीच चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। संघीयता पूरी तरह संस्थागत नहीं हो पाई है; नागरिकता का मुद्दा बीच–बीच में फिर विवाद में फँस जाता है; सीमावर्ती क्षेत्रों में उद्योग, रोजगार और निवेश के अवसर अभी भी कम हैं; और पहचान व राष्ट्रीयता के आधार पर मधेशी समुदाय को शक की दृष्टि से देखने वाली प्रवृत्ति पूर्णतः समाप्त नहीं हुई है।

फिर भी ये चुनौतियाँ आन्दोलन की उपलब्धियों को कमज़ोर नहीं करतीं। मधेश आन्दोलन ने नेपाल को एक नई राजनीतिक संस्कृति की ओर मोड़ दिया—जहाँ विविधता स्वीकार्य है, पहचान सम्मानयोग्य है, और शक्ति–संरचना साझा होनी चाहिए-यह चेतना स्थापित हो चुकी है। संघीयता, समावेशिता, प्रतिनिधित्व, नागरिकता अधिकार, पहचान की मान्यता और आर्थिक विकास-ये सभी मधेश जन–विद्रोह द्वारा देश को दिए गए अमूल्य योगदान हैं।

मधेश आन्दोलन का इतिहास भले लिखा जा चुका हो, लेकिन इसकी मंज़िल अभी अधूरी है। अब चुनौती यह है कि प्राप्त अधिकारों को कमजोर न होने दिया जाए, उपलब्धियों की रक्षा की जाए, और नई पीढ़ी में पहचान व सम्मान की चेतना जीवित रखी जाए। परिवर्तन का यह सफर जारी है- और मधेश आन्दोलन से उपजी आत्मसम्मान की भावना इस यात्रा की स्थायी ऊर्जा बनी रहेगी।

कैलास दास
जनकपुरधाम

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