नया वर्ष : उत्सव नहीं, आत्ममूल्यांकन और पुनर्निर्माण का समय : कैलास दास

कैलास दास, जनकपुरधाम । अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार नए वर्ष के आगमन के साथ ही समाज में उत्सव, मनोरंजन और उल्लास का वातावरण बन चुका है। वर्ष परिवर्तन को जीवन के नए मोड़ के रूप में देखने की मानवीय प्रवृत्ति के अनुसार, युवा से लेकर बुज़ुर्ग तक, विभिन्न वर्गों, समुदायों और संघ–संस्थाओं से जुड़े लोग एक सप्ताह पहले से ही पिकनिक स्थलों के चयन में जुट जाते हैं। स्वादिष्ट भोजन, मिष्ठान्न, संगीत और मनोरंजन कार्यक्रमों के माध्यम से “आने वाला वर्ष भी इसी तरह सुखमय बीते” जैसी आकांक्षा व्यक्त की जाती है। पिकनिक अर्थात वनभोज, नए वर्ष का मनोरंजनात्मक स्वागत करने की एक सामाजिक परंपरा-सी बन चुकी है।
लेकिन क्या नया वर्ष केवल खान–पान, मनोरंजन और क्षणिक खुशी तक ही सीमित है? या फिर यह आत्ममूल्यांकन, सामाजिक आकलन और भविष्य की दिशा तय करने का अवसर भी है? आज के संदर्भ में यही प्रश्न अत्यंत गंभीर रूप में हमारे सामने खड़ा है।
नेपाल में परंपरागत रूप से नया वर्ष विक्रम संवत् के अनुसार बैशाख 1 गते को मनाया जाता है। वह दिन कृषि-प्रधान समाज में नए चक्र की शुरुआत, ऋतु परिवर्तन और जीवन के पुनर्जागरण का प्रतीक माना जाता था। किंतु हाल के वर्षों में देखने पर स्पष्ट होता है कि बैशाख 1 की तुलना में अंग्रेज़ी जनवरी 1 ने नेपाली समाज में अधिक उत्साह और आकर्षण प्राप्त कर लिया है। यह केवल कैलेंडर परिवर्तन का विषय नहीं है; बल्कि यह वैश्विक राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभावों का प्रतिफल है। विश्व में होने वाली राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक उतार–चढ़ाव, युद्ध, शांति, समृद्धि या संकट का प्रत्यक्ष प्रभाव नेपाल जैसे आश्रित अर्थतंत्र और संवेदनशील समाज पर पड़ता है। इसी कारण जनवरी का नया वर्ष नेपाली जनजीवन से और अधिक गहराई से जुड़ता गया है।

नए वर्ष के उत्सव में प्रकृति के करीब जाना, खुले आकाश के नीचे आनंद लेना और जीवन के तनाव को कुछ क्षणों के लिए भूल जाना मानवीय स्वभाव है। किंतु समस्या तब शुरू होती है, जब नया वर्ष केवल बाहरी उत्सव तक सीमित रह जाता है और आंतरिक आत्मचिंतन ओझल हो जाता है। मानव जीवन में भविष्य की चिंता स्वाभाविक रूप से अधिक होती है, लेकिन यदि भविष्य के सपने देखते समय भूतकाल और वर्तमान की समीक्षा नहीं की जाती, तो वह सपना केवल कल्पना बनकर रह जाता है।

हमारा जीवन केवल भविष्य की आशा पर आधारित नहीं है; वह अतीत के अनुभवों, वर्तमान के निर्णयों और उनके परिणामों का समुच्चय है। चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो या शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग, प्राकृतिक संरक्षण या सामाजिक न्याय—हर क्षेत्र में हमारी वर्तमान स्थिति अतीत के निर्णयों और कार्यों का ही परिणाम है। अतीत में की गई गलतियों, उपेक्षाओं, असफलताओं और अन्याय को स्वीकार किए बिना, उनकी समीक्षा किए बिना केवल “आने वाला वर्ष अच्छा हो” की कामना से भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सकता।
समृद्धि कोई आकस्मिक उपहार नहीं है; वह दीर्घकालीन सोच, ईमानदार नेतृत्व, संस्थागत सुधार और नागरिक चेतना से जन्म लेती है। जब तक अतीत की त्रुटियों को सुधारने का साहस नहीं दिखाया जाता, अपनी कमजोरियों को स्वीकार नहीं किया जाता, और व्यक्तिगत तथा सामूहिक स्तर पर आत्मसुधार नहीं किया जाता, तब तक न तो अस्थिरता समाप्त होती है और न ही शांति व सुव्यवस्था की अनुभूति होती है।
अंग्रेज़ी नए वर्ष में केवल नाच–गान और भोज–भतेर में मग्न होना पर्याप्त नहीं है। बीते वर्ष विश्व और देश में क्या–क्या हुआ, क्यों हुआ, और उससे हमने क्या सीखा—इन प्रश्नों के उत्तर तलाशना अधिक महत्वपूर्ण है। आने वाले वर्ष को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, इस पर योजनाबद्ध सोच के बिना नया वर्ष केवल तारीख बदलने तक सीमित रह जाता है।
नेपाल के संदर्भ में वर्ष 2025 अनेक अकल्पनीय और पीड़ादायक घटनाओं की श्रृंखला लेकर आया। राजनीतिक अस्थिरता अब भी समाप्त नहीं हुई है। सरकार के प्रति जनाक्रोश कम होने के बजाय और गहराता जा रहा है। उद्योग–कारखानों के बंद होने की प्रक्रिया थमी नहीं है, रोजगार के अवसर सिमटते जा रहे हैं और महंगाई ने जनजीवन को कष्टकर बना दिया है। विदेश पलायन मजबूरी बन चुका है, और देश के भीतर बेरोजगार युवा आक्रोश और निराशा के बीच फंसे हुए हैं।
सरकार, राजनीतिक दलों और जनता के बीच आवश्यक विश्वास और सद्भाव कमजोर पड़ता जा रहा है। नागरिक राज्य से सुरक्षा, सम्मान और भविष्य के प्रति स्पष्ट दिशा का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में नए वर्ष को केवल उत्सव के बहाने बिताना यथार्थ से पलायन करने जैसा है।
आज आवश्यकता है अतीत की गहन समीक्षा की। राजनीतिक अस्थिरता बार–बार क्यों दोहराई जाती है? जनता का भरोसा नेतृत्व से क्यों कमजोर होता जा रहा है? नीति और व्यवहार के बीच इतनी बड़ी दूरी क्यों है? इन प्रश्नों के ईमानदार उत्तर खोजना ही नए वर्ष का सच्चा स्वागत है।
नया वर्ष हमें एक बार फिर सोचने का अवसर देता है-हम किस प्रकार का समाज चाहते हैं? किस प्रकार का राज्य बनाना चाहते हैं? और उसके लिए व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से हम क्या त्याग करने और क्या बदलने के लिए तैयार हैं? जब तक नए वर्ष को आत्ममूल्यांकन, सुधार और पुनर्निर्माण के अवसर के रूप में नहीं लिया जाता, तब तक उल्लास क्षणिक रहेगा और निराशा दीर्घकालीन।
अंततः नया वर्ष केवल कैलेंडर में जुड़ी एक और तारीख नहीं है; यह चेतना में जुड़ने वाला एक नया दृष्टिकोण है। उत्सव आवश्यक है, लेकिन उत्सव के साथ उत्तरदायित्व भी आवश्यक है। मनोरंजन के साथ गंभीरता भी चाहिए। यदि हम नए वर्ष को आत्ममूल्यांकन और योजनाबद्ध परिवर्तन का आधार बना सकें, तभी शांति, सुव्यवस्था और अमन–चयन का सपना यथार्थ में बदल सकता है। यही नए वर्ष का वास्तविक और सार्थक अर्थ है।

जनकपुरधाम



