रुह की पुकार : डॉ अंजू अग्रवाल ” केशवी”
” रुह की पुकार “
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माॅ !
क्या आप
मेरी-
रुह की आवाज,
सुन रही है न ।
अगर हाॅ –
तो फिर जब आप,
मुझे पुकारती हो ।
तो लगता है कि –
आप यहीं-कहीं,
मेरे आस-पास ही है।
वह पुकार मेरे अन्तस में,
गहरे तक पैठ जाती है ।
क्या हुआ !
अगर मैंने आपके –
गर्भ से जन्म नहीं लिया ।
पर आपको अपनी –
आत्मिक माॅ तो माना है न !
यही तो –
बड़प्पन है आपका –
कि मुझे बिना देखे ?
बिना जाने –
यूॅ मुझे अपनाया ।
मेरे अनदेखे प्यार को –
अपने गले लगाया ।
जब-जब भी आप,
प्यार से !
मुझे बेटा कहकर,
पुकारती है ।
सच मानना माॅ –
मैं आपकी पवित्र,
और –
सुखद अनुभूति में डूब जाती हूॅ।
अपना –
यह स्नेहाशीष,
और निश्छल प्यार,
यूॅ ही सदैव –
मुझ पर बनाये रखना ।
यही दुआ है मेरी।
डॉ अंजू अग्रवाल ” केशवी”


