अपने ही फैसले में उलझा सर्बोच्च न्यायालय:-
पंकज दास
संविधान सभा की समय सीमा बढाए जाने को लेक सर्बोच्च अदालत ने इस बा जो फैसला दिया है वह आम जनता की नज में देखे तो वाकई में काबिले ताीफ फैसला है। अदालत के इस फैसले ने हमो देश के नेताओं की निरूंकश प्रवृति प ोक लगाने के लिए दिया गया ऐतिहासिक फैसला के रूप में देखा जा हा है। लेकिन इस देश को अपना जागी समझने औ खुद को इस देश का ठेकेदा समझने वाले प्रमुख दल के नेताओं का इस फैसले का क्या अस पडता है या फि कोई अस पडता भी है कि नहीं यह तो समय ही बताएगा।
पिछले २५ नवम्ब को र्सवाेच्च अदालत ने संविधान सभा की समय सीमा को बढाए जाने के संबंध में कहा कि जितने समय में संविधान का पूा काम हो जाए उतने समय के लिए एक ही बा संविधान सभा की समय सीमा को बर्ढाई जाए। साथ ही अदालत ने यह भी स् पष्ट क दिया है कि इस बा बर्ढाई गई समय सीमा अन्तिम होगी। इस बा कडा फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि यदि इस बा अन्तिम समय के लिए बर्ढाई गई समय सीमा में यदि संविधान निर्माण का काम पूा नहीं हो पाता है तो संविधान सभा स् वतः भंग हो जाएगी।
बा बा संसद में दलों की सहमति के आधा प संविधान संशोधन के जयिे संविधान सभा की समय सीमा को बढाए जाने के खिलाफ दाय याचिका की सुनवाई के लिए र्सवाेच्च अदालत ने एक विशेष खण्डपीठ से इसकी सुनवाई काने का फैसला किया। इस विशेष खण्डपीठ में स् वयं प्रधान न्यायाधीश खिलााज ेग्मी, न्यायाधीश दामोद प्रसाद शर्मा, ाम कुमा साह, कल्याण श्रेष्ठ औ प्रेम शर्मा को खा गया। इस मामले प अदालत ने ना सिर्फयाचिकाकर्ता की बात सुनी बलि्क सका का पक्ष जानने के लिए महान्यायाधिवक्ता को भी अदालत में बुलाया था औ देश के अधिवक्ताओं की र्सवाेच्च संस् था नेपाल बा एशिसिएसन के तफ से एक कमिटी बनाक उनका भी पक्ष जाना था। लगाता तीन महीने की सुनवाई के बाद अदालत ने फैसला दिया कि सांविधान सभा की समयावधि बढाने के लिए बा बा संविधान संशोधन कना ठीक नहीं है। इसलिए इस बा अन्तिम बा के लिए ही संविधान सशोधन किया जा सकता है। अदालत के आदेश में कहा गया है कि अन्तमि संविधान की धाा ६४ में उल्लेखित संकटकालीन अवस् था में प्रतिबन्धात्मक वाक्यांश के द्वाा अभिनिश्चित होने के काण इस बा संविधान सभा की समय सीमा को सिर्फ६ महीनों के लिए अन्तिम बा ही बढाया जा सकता है। इस अवधि में यदि संविधान निर्माण का काम पूा नहीं होता है तो ६ महीनों बाद संविधान सभा को स् वतः ही विघटन माना जाएगा। औ उसके बाद अन्तमि संविधान की धाा १५७ के आधा प जनमत संग्रह या फि धाा ६३ के मुताबिक फि से संविधान सभा का निर्वाचन या फि संविधान में दी गई व्यवस् था के अनुरूप जनमत संग्रह आदि कुछ भी। लेकिन संविधान सभा की समय सीमा ६ महीनों के बाद समाप्त मानी जाएगी औ संविधान सभा ६ महीने बाद यानि कि २८ मई २०१२ को भंग हो जाएगा।
संविधान सभा की समय सीमा को बढाए जाने को लेक यह अदालत के द्वाा दिया गया पहला फैसला नहीं है। इससे पहले भी र्सवाेच्च अदालत ने इस संबंध में ३ बा फैसला सुना चुकी है। औ ह बा के फैसले को देखा जाए तो ह फैसला अपने आप में एक दूसे का विोधाभास दिखता है। र्सवाेच्च अदालत ने अपने पहले फैसले में कहा था कि जब तक संविधान का निर्माण नहीं हो जाता है तब तक संविधान सभा की समय सीमा बर्ढाई जा सकती है। इसी तह दूसी बा अपने ही पहले फैसले के उलट दुबाा यह फैसला दिया कि अनन्त काल तक संविधान सभा की समय सीमा को नहीं बढाया जा सकता है। अदालत ने अन्तमि संविधान की धाा ६४ का व्याख्या कते हुए कहा कि बाध्यात्मक स् िथति में संविधान सभा की समय सीमा को सिर्फ६ महीनों के लि बढाया जा सकता है। अदालत के फैसले के ऊलट इस बीच ाजनीतिक दलों ने आपस में सहमति क संविधान सभा की समय सीमा को पहले १ साल के लिए फि तीन महीनों के लिए फि से तीन महीनों के लिए बढा दिया। जब दलों ने तीसी बा भी समय सीमा बर्ढाई तो र्सवाेच्च अदालत ने कहा कि आवश्यकता के सिद्धांत के आधा प संविधान सभा की समय सीमा को बढाया जाना गलत नहीं हो सकता है।
अदालत चाहे जो भी फैसला सुनाए लगता है ाजनीतिक दलों प उसका कोई भी अस नहीं पडता है। संविधान सभा के कार्यकाल को अपनी निजी जागी समझने वाले नेताओं को इस बात का कोई भी गम नहीं है कि अदालत क्या कहती है। उन्हें हमेशा यह लगता है कि देश के तीन बडे ठेकेदा आपस में बैठ क जब तक चाहें तब तक के लिए अपनी नौकी बचा सकते हैं। औ उनका कोई भी कुछ भी नहीं बिगाड सकता है। अब इस बा हीजब र्सवाेच्च अदालत ने संविधान सभा की समय सीमा को बढाए जाने को लेक अपना फैसला सुनाया औ यह कहा कि संविधान सभा की समय सीमा अन्तिम बा के लिए बर्ढाई जा सकती है औ यदि इस बढाए गए समय में भी संविधान सभा का निर्माण नहीं होता है तो संविधान सभा को भंग समझा जाएगा। तो इसके पक्ष में या इसके र्समर्थन में किसी भी बडे ाजनीतिक दल का कोई भी बयान नहीं आया। हां ाप्रपा नेपाल जैसी छोटी पार्टियों ने इसका स् वागत जरू किया। लेकिन बडे दलों ने इसके बो में कुछ नहीं कहा कि एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल का बयान सभी बडे नेता औ देश के तथाकथित ठेकेदाों के मन की बात को प्रतिबिम्बित कता है।
र्सवाेच्च अदालत के फैसले प एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल ने कहा कि संविधान सभा की समय सीमा को लेक अदालत द्वाा दिया गया फैसला देश की विधायिका प न्यायपालिका का हस् तक्षेप है औ इस फैसले को मानने को ाजनीतिक दल बाध्य नहीं है। इतना ही नहीं खनाल यहीं नहीं रूके। अदालत के सम्मान में कुछ बोलना तो दू समय प संविधान बनाने की बात कना तो दू उन्होंने यहां तक कहा कि इस बा बर्ढाई गई समय सीमा में भी यदि संविधान नहीं बनता है तो छ महीने बाद फि से यह तय किया जाएगा कि संविधान सभा की आयु कितने वर्षके लिए बर्ढाई जाए। खनाल का यह बयान कोई अकेले में दिया गया बयान नहीं था। संविधान सभा की समय सीमा को बढाए जाने के लिए जब सिंहदबा में तीन दल औ मधेशी मोर्चा के बीच बैठक हर्ुइ उस बैठक के बाद पत्रकाों से रूबरू होते हुए खनाल का यह बयान आया था। ऐसे में यह समझना ही होगा कि खनाल के द्वाा दिया गया यह बयान इस देश के सभी बडे दल के नेताओं की मन की बात है जिसे खनाल ने सिर्फजाहि किया है।
यह पििस् थत क्यों आई है – आखि क्या काण है कि अदालत के आदेश की धज्जियां उर्डाई जाती है। क्योंकि अदालत अपने ही फैसले प अपने ही द्वाा दिए गए आदेश प अहिक समय तक नहीं टिका ह सकता है। संविधान सभा की समायवधि को लेक जिस तह से अपने चा फैसलों में अदालत ने चा आदेश दिए हैं उससे नेताओं को लगता है कि अदालत के आदेशों में कोई दम नहीं है। संविधान सभा की समय सीमा जब तक चाहे बढाते हो अदालत अपना फैसला बदलती हेगी। आखिका अदालत ने ही तो अपने फैसले में कहा है कि संविधान निर्माण का काम पूा नहीं होने तक संविधान सभा की समय सीमा बढाते हने में कोई दिक्कत नहीं है। इतना ही नहीं नेताओं के द्वाा संविधान सभा का कार्यकाल बा बा बढाए जाने को अदालत ने ही तो आवश्यकता की सिद्धांत का दिया है। तो फि अदालत नेताओं से कैसे उम्मीद ख सकती है वो अन्तिम बा के लिए संविधान सभा की समय सीमा बर्ढाई गई है। ±±±
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