चुनौती की राह में नेपाली अर्थव्यवस्था
प्रल्हाद गिरी:बीते अप्रील २५ को आए महाविनाशकारी भूकंप ने नेपाल को न सिर्फ जबरदस्त हिला दिया है बल्कि भारत, बांगलादेश, चीन एवं भूटान समेत पड़ोसी देशों को एक गहरा झटका भी दिया है । बड़ा भूकंप आए लगभग दो महीने पार हो गए लेकिन इसकी पराकंपन अभी तक बरकरार है । यह पराकंपन सिर्फ लोगों के घर, साजोसामान में ही नहीं बल्कि वित्त प्रणाली और समग्र अर्थतंत्र में भी देखने को मिल रही है । देश के राजनीतिक गलियारों को लेकर मौजूद अर्थव्यवस्था में भी भूकंप के झटकों का पुरजोर असर दिख रहा है । नेपाल को फिर से तबाही से उबारने के लिए पिछले दिनों किए गए पुननिर्माण सम्मेलन की सफलता से देश के अर्थ मन्त्री रामशरन महत फूले नहीं समा रहे हैं । ४४ हजार करोड़ की सहयोग राशि राजनेताओं की उम्मीद से ज्यादा निकली । हालांकि योजना आयोग की ताजा रिपोर्ट पिडिएनएक के हवाले से कहा गया था कि नेपाल को फिर से पटरी में लाने के लिए ६६ हजार करोड़ से ज्यादा रूपए की जरूरत है । पर बड़ा सवाल यह है कि उम्मीद से ज्यादा रकम पाने के बाद भी क्या नेपाल सरकार यह पैसा पुनर्निर्माण और राहत में खर्च कर पाएगी ? क्या आम आदमी की जिंदगी पटरी पर फिर से आएगी ?
अमूमन देखा जाए तो हर साल नेपाल सरकार को दाताओं की तरफ से सार्वजनिक खर्च अपने लक्ष्य से कम होने पर आलोचना झेलनी पड़ती है । इस आर्थिक वर्ष में सरकार कुल पूँजीगत खर्च ५० फीसद भी नहीं कर सकी है । अप्रील २५ में भूकंप अगर दस्तक नहीं देता तो शायद सरकार जुलाई महीने के मध्यतक वार्षिक हिसाब मिलान से पहले विकास निर्माण में ताबड़तोड़ खर्च कर रही होती । सरकार ने वैसे नजीर बिठा दिया है कि अप्रील से जुलाई मध्य तक किसी तरह हो खर्च ज्यादा करने हैं । ठेके की रकम इस समय जरूरत से जल्द रिलीज की जाती है । ठेकेदारों या कमीशनखोरों के जोर पर तो है ही, पर सरकार खर्च ना कर पाने की बड़ी आलोचना से बचने के लिए भी आर्थिक वर्ष के अन्तिम तीन महीने में अन्धाधुन्ध खर्च को अंजाम देती है । पूरे साल के निर्माण के बजट का तकरीबन आधा रकम इन तीन महीनों में खर्च करने की विवशता नेपाल में लगभग स्थापित हो चुकी है । इस के कई साइड् इफेक्ट्स हैं । पहले यह कि जो सड़कें बनेंगी वो कमजोरी प्रकृति की होंगी । जुलाई के महीने से मौनसून से होने वाली बारिश इसे कमजोर बना देगी । पुल और सरकारी इमारतें भी वैसे ही बनेंगे जो कमजोर नींव के दिखेंगे । देश के पूर्वाधारों में सरकारी निवेश इसी तरह जल्दबाजी के चक्कर में रेत में पानी डालने के जैसी साबित हो रही है । लोगों को आशंका है यही हाल भूकंप पीडि़तों के लिए आए सहयोग का भी ना हो । अब तो भूकंप की तलवार हर समय लटकी हुई है । कब क्या होगा कोई नहीं जानता । खौफ भरी जिंदगी वैसे बेजार बना दे पर हिम्मत से जुटने की ताकत अभी भी नेपालियों को जिंदादिल रखे हुए है यह बड़ी बात है ।
९००० हजार लोगों की जान लील लेने वाले विनाशकारी भूंकप ने जहाँ ६ लाख से अधिक घरों को नुकसान पहुँचाया और वहीं २३ हजार लोग घायल पडेÞ हैं । तबाही के निशान अभी भी चारों तरफ बिखरे पडे हैं । अर्थव्यवस्था का बड़ा केन्द्र रहा पर्यटन क्षेत्र भले ही ठीक दुरुस्त रह गया हो पर सैलानियों को अभी भी विश्वास में लेना मुश्किल है । देश के बडेÞ पर्यटन स्थल पोखरा के रिजार्ट व्यवसायी टुरिष्ट आने के उम्मीद में अपनी नजरें टिकाए हुए हैं । इस का सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दिखेगा । हालांकि देश के केन्द्रीय बैंक का कहना है कि विदेशी मुद्रा भण्डार इस तिमाही में रेमिटेंस की प्रवाह २० फीसदी से बढ़ गया है । वस्तुतः देखा जाए तो सरकारी आँकड़े में अगर व्यापार घाटा जब जब उपर चढ़ता है और यह कहा जाता है कि अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, बडेÞ पैमाने में वस्तुओं की आयात पर निर्भर रहनेवाला देश अब विदेश से सामान कैसे मंगाएगा ? तब सटीक जवाब कुछ लालबुझक्कड़ों का रहता है कि हमारे पास विदेशी रेमिटेंस है ही हमें क्या चिंता । सामान्य तौर पर रेमिटेंस के भरोसे ही नेपाल की अर्थव्यवस्था चल रही है । यानि कि जो विदेशी मुद्रा के भंडार की रफ्तार बढ़ा रही है वह विदेश में काम करने वाले नेपालियों के नेपाल भेजे जानेवाली रकम ही है । अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार अल्पकालीन क्षण में रेमिटेन्स से अर्थव्यवस्था चले यह ठीक है । लेकिन दीर्घकालीन समय तक इसी तरह चलता रहा तो काफी मुश्किलें आ सकती है मसलन घरेलू उत्पादन का कमजोर पड़ जाना, मुद्रा का मूल्य कम होना, मुद्रास्फीति उच्च रहना आदि । दरअसल, अर्थव्यवस्था में वास्तविक वृद्धि की गुंजाइस केवल घरेलु सकल उत्पादन बढ़ाने से ही है । यानि कि जितना हम उत्पाद करेंगे उतनी ही अर्थतंत्र की संतुलन बनी रहेगी । चाहे इस उत्पाद की खपत यहीं हो या निर्यात हो ।
भूकंप के बाद सहायता राशि भले ही नेपाल में भरपूर आ गई हो पर अब चुनौती यह है कि इसका सदुपयोग कैसे किया जाए । चर्चा का विषय अब भी अर्थवृत्त में यही है कि सरकार अपने खर्च करने की क्षमता को कैसे बढ़ाए । मौजूदा खर्च करने की रवैये से तो सहायता उपयोग होने से रही । दाताओं का दिया हुआ दान को नेपाल के अधिकतम हित के लिए कैसे उपयोग किया जाए इसतरफ ध्यान पूरे विश्व का है । विकास निर्माण के कार्य में सरकार के कम खर्च करने के रवैये ने हमेशा किरकिरी पैदा किया है । इस के कई कारण हैं । चालू आर्थिक वर्ष के ग्यारहवें महीने तक सरकार अपने विनियोजित बजट के महज ४० फीसदी पूँजीगत खर्च ही कर सकी है जो कि रकम के तौर पर तकरीबन ६५० करोड़ के आसपास ही आती है । एक बड़ा सवाल अब यह है कि विकास के लिए साल भर में १०० करोड़ रूपये भी खर्च की हैसियत ना रखने वाले सरकार ने पुननिर्माण और विकास के लिए एक ही साल में दो सौ से तीन सौ करोड़ खर्च की क्षमता पेश करने का आधार क्या है ? खर्च करने की क्षमता यूं अचानक बढ़ाने से कई सवाल खड़े हो गए हैं । क्या सरकार अभी दातृ देशों को खुश करने के लिए ऐसा कह रही है ? या कमीशनखोरों, दलाल या भ्रष्ट ठेकेदारों के जरिए सरकार की तूती बोल रही है । वाकई यह माजरा समझ पाना मुश्किल है । असलियत तो यह है कि सरकार का नेतृत्व करने वाले लोगों की यथास्थितिवादी सोच, इसी तरह का ब्यूरोक्रेसी और सिस्टम से दाताओं का दिया हुआ पैसा खर्च करना नामुमकिन है । ४४ हजार करोड़ की प्रतिबद्धता आ चुकी है जिसमें से अकेले भारत ने आने वाले पाँच वर्षों में १० हजार करोड़ की सहुलियत दर पर कर्ज की घोषणा और अन्य देशों की गई प्रस्ताव समावेश नहीं है । इस हिसाब से सहयोग ६० हजार करोड़ भी पार सकता है ।
सहायता राशि खर्च करने में नेपाल सरकार की मौजूदा स्थिति, कर्मचारीतंत्र और कठिनाई तो बाधक है ही, कुछ दातृ देशों का स्वार्थ और अनचाहे शर्तें भी नेपाल पुननिर्माण में बाधक बन सकती है । ढहे बुनियादी संरचनाओं और कुछ धरोहरों को फिर से निर्माण के लिए जो रकम बाहरी देशों से दी जा रही है इसके लिए उनकी अपनी स्वार्थ और बाध्यताओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता । विश्लेषकों का मानें तो कुछ दाता अपना सहयोग किसी ना किसी रूप में अपने ही देश में लौटाने के मौके के फिराक में हैं । जैसे कि यूरोपियन यूनियन । इसका कहना है कि जितनी सहयोग का वादा उसने पुनर्निर्माण सम्मेलन में किया है उसका आधा रकम महात्रासदी से पहले ही उस ने नेपाल में खर्च किया । जो बचे हुए रकम हंै उसका अधिकांश हिस्सा भी अपने ही एनजिओ के तहत खर्च करने के संकेत दिया है । पश्चिमी देश बाँकी के हिस्से के पैसे से नेपाल में धर्मांतरण की अपनी आकांक्षाओं को अंजाम दे सकती है । पिछले दिनों बाइबल बांटे जाने का गंभीर मामला सामने आया था । अब इसे क्या कहें सहयोग या शर्त ? इसी तरह यूके का भी कहना है कि उसने अपने घोषित सहायता की आधी रकम पहले ही खर्च कर दिया है । वल्र्ड बैंक, एशियाली विकास बैंक और दूसरे सहयोगी संस्थाओं की शर्तें भी राष्ट्र हितों से ज्यादा उनके अपने हितों में केन्द्रित हो सकता है । एक बिडंबना यह भी है कि अनुदान की राशि भले ही सरकार की झोली में तुरंत आए और सरकार इसे मनचाहे जब खर्च करे पर सहुलियत के हिसाब से ली जानेवाली कर्ज के लिए दाताओं का अपना ‘दखलअंदाजी’ काम कर सकता है ।
लेकिन दखलअंदाजी का और अनचाहा ध्यान केंद्रित खींचने वाला काम खुद नेपाल सरकार के रवैये ने किया है । पिछले साल भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया हुआ १० हजार रूपये का सहुलियत दर का कर्ज अभी तक सरकार खर्च नहीं कर पायी है । कहा गया था कि बूढ़ी गंडकी परियोजना और दूसरे पूर्वाधार में लगाए जाएंगे पर इस की घोषणा अभी तक नहीं हुई । टेंडर ठेकों की अब तक कोई अता पता नहीं है । सरकार के खर्च करने की असक्षमता और आलटाल प्रवृत्ति देश की अर्थव्यवस्था को गर्त में डालने में जिम्मेदार होती दिख रही है । ऐसे में विश्वव्यापी मंदी का दौर अगर चला तो नेपाल में कभी ना सम्भलने वाली स्थितियां पैदा हो सकती है । नेपाल की अर्थव्यवस्था की नींव बहुत हद तक भारत पर निर्भर है । व्यापार से लेकर सेवाओं की आपूर्ति और नीतियां भारतीय अनुकूल बनते हैं । नेपाल की मुद्रा भारतीय रूपया के साथ स्थिर रूप से विनिमय होती है । इस हिसाब से जैसे–जैसे भारत में मंदी छाएगी उसका सीधा असर नेपाल पर भी पडेगा । मिसाल के तौर पर जैसे ही भारतीय रूपया डालर के मुकाबले कमजोर होगा वैसे ही नेपाली मुद्रा का मूल्य भी गिरता रहेगा । हालांकि दोनों देश में निवेश की ढेरों संभावनाएं हैं । लिहाजा उसे प्रोत्साहित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने जो ब्याज दरों में कटौती किया है उसी तरह की व्यवस्था यहां भी होनी चाहिए । निवेश के लिए कम दरों पर कर्ज मुहैया बैंक जब आसान ढंग से कराएगी तभी निवेश बढ़ेगा और उत्पाद बढ़ने लगेगी । वैसे अर्थतंत्र की मौजूदा कार्यप्रणाली की कुछ सीमाएं अभी बाधक बनी हुई है जैसे कि खरीद नियमावली जो टेंडर प्रक्रिया को निर्देशित करती है । उसे समयानुसार परिमार्जित करने की आवश्यकता है ।
वाकई में नेपाल में परिस्थिति प्रतिकूल बनी हुई है । तबाही के बाद सामान्य सी हालात तो है पर इससे उबरने के लिए सरकार को ढेर सारा काम करना है । ऐसे में रोजगार के माध्यम से गरीबी निवारण के लक्ष्य को सुनिश्चित करने के लिए कई सारे काम करने हैं । पुनर्वास और पुनर्निर्माण के अलावा सड़कें, पुल, बिजली, पानी, संचार क्षेत्र जैसे अहम पूर्वाधारों को बनाना, कृषि के आधुनिकीकरण के लिए सभी तरह के खेती को प्रोत्साहन देना, घरेलू उत्पाद बढाने के लिए उद्योग और कुटीर धंधा निर्बाध संचालन कराना जैसे महत्वपूर्ण काम शामिल हैं । इससे लोगों को रोजगारी मिलने के अलावा देश के घरेलू सकल उत्पाद (जीडीपी) में भी बढ़ावा मिलेगा । तब लोगों को रोजगार मिलेगा उससे प्रतिव्यक्ति आय बढ़ेगी । स्वदेशी उत्पाद की खपत होगी और विदेश तक निर्यात हो सकेगी । फिर क्या है – बढेÞगा देश और बनेगा नेपाल ।
(ये लेखक के अपने विचार है ।)

