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मरूभूमि की परिधि पर अबोध,अज्ञात,अज्ञेय नीरवता को स्पर्श करती हुई रचनाएं-डाॅ.राजेंद्र खटाटे

 


क्या आपने कभी मरूस्थल की तपती रेत में प्रकृति का गीत-संगीत सुना है?क्या आपने कभी मौन की गहराई में अस्तित्त्व की खोज की है? क्या कभी आप शून्य के अंतहिन क्षितिज पर खड़े होकर अज्ञात की अंतर्यात्रा की है? क्या आपने शून्य से महाशून्य की ओर यात्रा की है कभी? क्या आपने वैराग्य से प्रेम में स्वयं को रूपांतरित किया है कभी ?…… अगर इन प्रश्नों का उत्तर नकारार्थी है तो आप जरूर अनिता सैनी जी का कविता संग्रह “खरोंच” पढ़िएगा जिसे “बोधि”प्रकाशन ने प्रकाशित किया है और आज इसका पिंकफेस्ट में लोकार्पण हुआ है।मैं इसके लिए अपनी शुभकामनाएं देता हूँ।
इस कविता संग्रह पढ़ते हुए मुझे अनिता जी की रचनाशैली की कुछ विशेषताएं दृष्टिगोचर हुइ जिसको मैं आपके सम्मुख रखता हूँ,जिससे कवयित्रि भी अनभिज्ञ हो सकती है लेकिन इन विशेषताओं से आप सभी पाठक इन रचनाओं का आस्वादपान कर पाएंगे।
१) इस कविता संग्रह का नाम “खरोंच” अपने आप में चेतना पर व्यक्त होती हुइ वेदना,पीड़ा,दुःख और प्रताड़ना का प्रतीक है जिसे सदियों से मनुष्य ने ढ़ोया है,वे जर्जर हो चूकी है फ़िर भी पुरातन होने के कारण उनके वेदना का अहसास भी होता है और उससे सुख भी मिलता है।यह कविता संग्रह विशेषतः नये नारीवाद की परिभाषा नहीं गढ़ता है परंतु स्री का समस्त अस्तित्त्व किस तरह सांस्कृतिक,धार्मिक,सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक नियतिवाद की ईजाद है इसका सुक्ष्म चित्रण किया है।चेतना के हर एक अभाव के अस्तित्त्व में अपने अस्तित्त्व की खोज ये रचनाएं करती है और अपने “स्व” को अर्थ देने का प्रयत्न करती है।

२) इस कविता संग्रह की रचनाओं में जीवन चेतना के अवचेतन में जो प्रकृति का परिदृश्य है जिसे अभाव कहते है उसके कई बिंब-प्रतिबिंब प्रतीक के रूप में अभावात्मक स्वरूप को व्यक्त करने के लिए कवयित्रि ने कलात्मक तरिके से उपयोग किया है,जैसा की मरूस्थल।कवयित्रि ने अपनी रचनाओं में संघर्ष, पीड़ा,वेदना,दुःख-दर्द को प्रकृति के संहारक स्वरूप के साथ संतुलन बिठाकर स्री चेतना के अवचेतन स्वरूप को व्यक्त करने का सार्थक प्रयास किया है।
“दोपहर का देहातीपन” इस कविता में
हम दोनों ने
उदय होते सूरज की प्रणाम किया।
दोपहर होते-होते वहाँ से निकल गए।
“हमारा वहाँ से चले आना उनके लिए वरदान था।”
साँझ सफर में कई बार मिली, हमने रात नहीं देखी,
रात को लुभावनी छवियाँ देखीं।
उसने कहा-
“कभी मिलना हो रात से, तब तुम ठहर जाना।
सीतलता की गोद उजाले का प्रमाण है।”
इस कविता में देख़िए तो अव्यक्त से व्यक्त का आकलन करने का प्रयास किया है और इस अव्यक्त से फ़िर स्री चेतना को उद्घाटित करने का प्रयास किया है।

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मैंने कहा-
“देहाती स्त्रियाँ धतूरे-सी होती है,
वे सिर्फ
कविता कहानियों में ढूंड़ी जाती हैं।”
धतूरे के जिक्र से उसे

महाशिवरात्रि का स्मरण हो आया।
स्मृतियों की उड़ती धूल और किरकिरी
उसकी आँखों में चुभने लगीं।

सहसा मुझे खयाल आया कि…
वह मरुस्थल में रहने का आदी नहीं था।

मरूस्थल को बार,बार नहीं अनेको बार अपनी उपस्थिती रचनाओं में दर्ज करता है।मरूस्थल है तो जीवन है,हरियाली है।मरूस्थल भी कभी समुंदर था।वहाँ पर भी कभी जीवन पनपता था।परंतु आज वह रेगिस्तान में रूपांतरित होकर इस धरती का एक संतुलन केंद्र बनकर रहा है।कवयित्रि कहती है कि
“सुनो तो” इस कविता में
देखी तो।
कविताएँ सलामत हैं?
मरुस्थल मौन है सदियों से।
अनमनी आँधी ताकती है दिशाएँ।
मरूस्थल की कई अनकहीं दास्तां आज भी मौन है मरीचिका में क्योंकि मरीचिका बनना अब एकमात्र स्वप्न है मरूस्थल का।मरूस्थल का प्रतीक स्री-चेतना,अस्तित्त्व का अभाव या शून्य तथा रचनात्मक आत्मबोध की ओर हमें ले जाता है।
“मरुस्थल सरीखी आँखें” इस कविता में मरूस्थल के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा है कि
उसने कहा मरुस्थल सरीखी आँखों में मृगमरीचिका-सा भ्रमजाल होता है। क्योंकि बहुत पहले मरुस्थल… मरुस्थल नहीं था। चहाँ भी दरिया और जंगल हुआ करते थे। गिलहरियाँ ही नहीं, गौरैयों के भी नीड़ हुआ करते थे।
……
हवा के रुख ने उसे मरुस्थल बना दिया।
इसके बाद तुरंत यह स्वरूप बोध आत्मभाव में बदल जाता है,आगे वे कहती है कि
अब-कुछ पल रहलने आए बादल कुलांचे भरते हैं अबोध छौने की तरह। वे पड़ते हैं मरुस्थल को, चादलों को पढ़ना आता है-जैसे विरहिणी पढ़ती है

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उम्र भर एक ही प्रेम-पत्र बार-बार….
वे
“प्रतीक्षा के पार” इस कविता में मरूस्थल के भावजगत में भी प्रवेश करके उसे मानवीय भावनाओं का परिवेश चढ़ाती है,वे कहती है कि

मरुस्थल से कही यह किसके फिराक में हैं? आजकल बुझा-बुझा-सा क्यों रहता है?

जलाती हैं साँसें, भटकते भावों सी उड़ती सूल धूसर रंगों ने इक लिया है अंबर को। आंधियाँ उठने लगी हैं, सूखी नहीं हैं नदियाँ-ये सागर से मिलने गई हैं।

उदासियों के भी खिलते हैं वसंत तुम गहरे में उत्तरे नहीं, से तैरना भूल गई।

मरूस्थल के प्रतीक का उपयोग करते हुए पाठकों को यह एक बडा संदेश कवयित्रि यहाँ पर देना चाहती है कि
“प्रेम” इस कविता के माध्यम से की मरुस्थल वैराग्य नहीं, प्रेम है।
इसका अर्थ यह हुआ की प्रेम या करूणा ही मानवीय चेतना की उच्चतम अवस्था है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है या जीवन में कठिणता से प्रेम की ओर जाने का मार्ग बताती है।

३) इस कविता संग्रह की रचनाओं में स्री और माँ और नदी,गाँव का उल्लेख भी अभाव,रिक्तता तथा रिश्ते-नातों में बनती हुइ दूरियां,उदासी जीवन की अनिश्चितताएं और ख़ाईयों को प्रकट करने के लिए ही होता है।यहीं इस कविता संग्रह का सौंदर्यबोध है और यह सौंदर्यबोध मनुष्य को एकांत में ही होता है।हमें सौंदर्यबोध से आत्मबोध तक की यह यात्रा इसी जन्म में पूर्ण करनी है।

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४) संत मीराबाई इस कविता संग्रह का आत्मा है,प्राण है ऐसा हमेशा प्रतीत होता है।मरूस्थल नींव है तो मीरा मंदिर है चेतना का ।
मीरा : एक अंतरध्वनि इस कविता में कहती है कि

जहाँ ध्वनि को तुम ‘भजन’ कहते हो, और दृश्य को ‘मीरा’।

अंतः स्वर ध्वनि और दृश्य का एक गहरा द्वंद्व है।

धरती के गर्भ से फूटा था जो उष्ण लावा -अब शीतल राख बन चुका है।

बिखरे भावों में उलझा एक चोटिल जीवन -जो जीना तक भूल चुका है।

हाथों में एकतारा-या तानपुरा, वाणी में झरता है निस्संग प्रेम…. यह तुम्हारे दृश्यों का द्वंद्व है –
जहाँ ध्वनि को तुम ‘भजन’ कहते हो, और दृश्य को ‘मीरा’।
अर्थात मीरा बनना ही हमारी पूर्णता है।यह कड़ा संदेश कवयित्रि अपनी हर एक रचनाओं में अव्यक्त रूप में अभिव्यक्त करना चाहती है।

इस कविता संग्रह की रचनाओं में मनुष्य जीवन और प्रकृति में जो विरोधाभास और असंगतता (Absurdity) दिखाई पड़ती है वह असल द्वैत या द्वंद्व नहीं है अपितु वह एक ही अस्तित्त्व के अभिन्न अंग है।हमें उन्हें एकसाथ जीकर अपने आत्मतत्त्व को उपलब्ध होने की यात्रा में समर्पित भाव से स्वीकार करना चाहिएं।
मैं पुनश्चः इस कविता संग्रह के लोकार्पण के लिए शुभकामना देता हूँ और इस कविता संग्रह की यशस्विता के लिए प्रार्थना करता हूँ।

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