संस्थागत स्थायित्व और अभिभावकीय दायित्व – अजय कुमार झा
अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक फरवरी ०२६। नेपाल ने संविधान, संघीयता और लोकतांत्रिक संरचना को अपनाकर एक ऐतिहासिक परिवर्तन किया है । किंतु व्यवहारिक स्तर पर संस्थाएँ अभी भी ‘व्यक्तिवादी राजनीति, सत्ता–केन्द्रित निर्णय प्रक्रिया और अस्थिर नेतृत्व’ से प्रभावित हैं । मधेस, जो ऐतिहासिक रूप से उपेक्षा, असमान प्रतिनिधित्व और पहचान के संघर्ष से गुजरता रहा है, वहाँ यह संकट और अधिक गहराई से महसूस किया जा रहा है । संस्थाएँ जब व्यक्तियों, दलगत स्वार्थों, तुष्टिकरणों और जातिवाद तथा वंशवाद के अधीन हो जाती हैं, तब लोकतंत्र केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है । ऐसे समय में अभिभावकीय दायित्व निभाने वाला नेतृत्व–जो राष्ट्र को परिवार की तरह और समाज को अपने शरीर की तरह देखे–अत्यंत आवश्यक हो जाता है । किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की मजबूती केवल उसके संविधान या चुनावी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं की स्थिरता और नेतृत्व के अभिभावकीय दायित्व से निर्धारित होती है । संस्थाएँ राज्य की रीढ़ होती हैं, जबकि अभिभावकीय नेतृत्व उसकी आत्मा । नेपाल जैसे संक्रमणशील लोकतंत्र और मधेस जैसे ऐतिहासिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में इन दोनों तत्वों की भूमिका और भी अधिक निर्णायक है । वर्तमान समय में नेपाल और विशेषकर मधेस में संस्थागत अस्थिरता, राजनीतिक असंगतियाँ, नेतृत्व की अपरिपक्वता और दायित्वहीनता गम्भीर चुनौती के रूपमें सामने आई हैं । यह लेख इन्हीं आयामों के वर्तमान अवस्था, समस्याओं और समाधान के संदर्भ में प्रस्तुत है ।
‘संस्थागत स्थायित्व’ का अर्थ है–राज्य की संवैधानिक, प्रशासनिक, न्यायिक, शैक्षिक, राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं का निरंतर, निष्पक्ष, उत्तरदायी और प्रभावी रूप से कार्य करना । जब संस्थाएँ व्यक्तियों से ऊपर उठकर नियम, प्रक्रिया और मूल्यों के आधार पर संचालित होती हैं, तभी लोकतंत्र स्थायी बनता है । नेपाल में संविधान, संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, सुरक्षा निकाय, शैक्षिक संस्थान और स्थानीय सरकारें लोकतांत्रिक ढाँचे की प्रमुख संस्थाएँ हैं । मधेस में ये संस्थाएँ केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं, बल्कि ‘पहचान, अधिकार और विश्वास’ से भी जुड़ी हुई हैं । इसलिए संस्थागत स्थायित्व यहाँ राजनीतिक स्थिरता से अधिक सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाता है ।
राजनीति में ‘अभिभावकीय दायित्व’ का अर्थ तानाशाही संरक्षकता नहीं, बल्कि नैतिक, संवेदनशील और दीर्घकालिक दृष्टि से युक्त नेतृत्व है । अभिभावक वह होता है जो सत्ता को अधिकार नहीं, ‘जिम्मेदारी’ मानता है; जो समाज के सभी वर्गों को अपने परिवार की तरह और मानवता को अपनी प्राण की तरह देखता है । नेपाल और मधेस के संदर्भ में अभिभावकीय नेतृत्व का अर्थ है–संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, अल्पसंख्यकों और हाशिए के समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा, भावनात्मक नहीं, विवेकपूर्ण निर्णय, सत्ता हस्तांतरण में परिपक्वता, संस्थाओं को कमजोर नहीं, मजबूत बनाना, लेकिन, दुर्भाग्यवश, वर्तमान राजनीति में यह अभिभावकीय भाव तेजी से क्षीण होता जा रहा है । नेपाल में लोकतंत्र स्थापित तो हुआ है, परंतु वह अभी भी व्यक्तिवादी राजनीति के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाया है । सरकारें बदलती रहती हैं, नीतियाँ अस्थिर रहती हैं और संस्थाएँ राजनीतिक दबाव में काम करती दिखती हैं । संसद में विमर्श की जगह आरोप–प्रत्यारोप ने लेली है । न्यायपालिका पर राजनीतिक प्रभाव के आरोप, प्रशासन में दलगत हस्तक्षेप और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं । इधर मधेस का संदर्भ और भी जटिल है । ऐतिहासिक उपेक्षा, पहचान की राजनीति, सामाजिक विभाजन और नेतृत्व का विखंडन मधेस को संस्थागत रूप से कमजोर बनाता रहा है । यहाँ संस्थाएँ जनता के विश्वास का केंद्र बनने के बजाय, अक्सर सत्ता संघर्ष का औजार बन जाती हैं । मधेसी राजनीति में भी व्यक्ति और गुट हावी हैं, विचार और दीर्घकालिक नीति बहुत पीछे छूट गई है ।
नेपाल और मधेस दोनों में राजनीति, व्यक्ति–केंद्रित होती जा रही है । दल विचारधाराओं से नहीं, नेताओं के नाम से पहचाने जाते हैं । इससे संस्थाएँ कमजोर होती हैं और नेतृत्व के बदलते ही दिशा भी बदल जाती है । परिणाम में देश एक ही बिंदु पर पिछले ३५ वर्षों से गोल चक्कर काट रही है । नागरिक कभी कोइराला में उद्धार कर्ता के छवि को निहारता है, कभी ओली में, कभी दहाल में तो आज वालेन में । लेकिन गौर किया जाय, वालेन का पार्टी प्रवेश और उस पार्टी के केंद्र बिंदु तथा पहचान बनना क्या दर्शाता है ? कि हम नेपालियों की मानसिकता व्यक्तिवादी है । हमें विचार से कोई मतलब नहीं है । मीडिया ने जिसे उछाला हम उसके दीवाने हो जाते हैं । उसपर सबकुछ न्योछावर करदेते हैं । फिर, जब वही मीडिया उसके विरुद्ध लिखने लगता है तब हम भी धोखेबाज कहकर गालियां बकने लगते हैं । अर्थात् हम सिर्फ शरीर हैं । विवेक और विचार से कोई मतलब नहीं रखना चाहते हैं । और ध्यान रहे, विवेकहीन व्यक्ति एवम् उद्देश्य शून्य समाज मृतप्रायः माना जाता है । बौद्धिक दूरदृष्टि तथा प्राविधिक सशक्तता के कारण नेपाल से भी छोटा देश (इजरायल) पूरी दुनियाँ को घुटने पर लाने में सक्षम है । और हम पूरी दुनियां से भीख मांगते फिरते हैं । यह भीखमंगापन हमारी विरासत बन गई है । हिमालय के गोद में विश्व के तीन अति विशिष्ट क्षमताओं और सूक्ष्मतम् ज्ञानों से संयुक्त “हिंदू, बौद्ध तथा किरात” धर्म– संस्कृतियों का जन्म होना; एक तरफ हमारी वैश्विक अस्तित्व और महिमा को प्रकाशित करता है, तो वहीं दूसरी ओर वर्तमान के हमारे संस्कार पशुत्व का परिचायक बनता जा रहा है । पशु की तरह शारीरिक भूख से ऊपर हम उठ नहीं पा रहे हैं । जीवन और जगत के प्रति चिंतन, मनन और विचार करने की क्षमता से ही हम पशुयोनि से मानवयोनि में प्रवेश करते हैं । अर्थात् उत्कृष्टता की ओर हम बढ़ते हैं । आज का नेतृत्व अक्सर तात्कालिक लाभ, सत्ता संरक्षण और भावनात्मक राजनीति में उलझा हुआ दिखता है । समाज को जोड़ने वाला, धैर्यशील और दूरदर्शी नेतृत्व दुर्लभ होता जा रहा है ।
प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और यहाँ तक कि न्यायिक संस्थाएँ भी राजनीतिक हस्तक्षेप से अछूती नहीं रही । इससे संस्थागत विश्वसनीयता पर गहरा आघात और आम जन में घोर निराशा छा जाती है । धीरे धीरे लोगों को नेता और राजनीतिक प्रणाली से ही घृणा होने लगती है । लोग चुनावी प्रक्रिया से दूर भागने लगते हैं । जिससे अराजक प्रवृति के लोग देश के सत्ताको अपने हाथों में जकड़ लेते हैं । फिर शुरू होता है दानवीकारण का दौर । मानव संहार का तांडव । क्रूर राजाओं से भी क्रूरतम लोकतांत्रिक महाभारत । कभी दलित के नाम पर संग्राम तो कही चक्काजाम । फिर जातीय दंगा, मृत्युका नंगा नृत्य । आदि षडयंत्रों से कुसज्जित खूनी शासन व्यवस्था । अतः सावधानी का माहौल जीवन के हर क्षण, हर पल और हर क्षेत्रमें निरंतर सक्रिय अवस्था में रहना चाहिए । अन्यथा हमारी विनाश को कोई रोक नहीं सकता ।
मधेस में राज्य और संस्थाओं के प्रति अविश्वास की भावना आज भी मौजूद है । यह अविश्वास केवल नीतिगत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अनुभवों से उपजा है, जिसे दूर करने के लिए संवेदनशील अभिभावकीय दृष्टि की आवश्यकता है । वर्तमान के रा.स्व.पा. ने मधेस के पुत्र वालेन साह; जो आज नेपाल के सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रिय नेता के रूप में चट्टान की तरह खड़ा है;को अपनी पार्टी से अगले प्रधानमंत्री के पद के लिए नाम घोषणा किया है । इसके पीछे अपनी पार्टी के लिए मधेस में सम्मानजनक स्थान बनाना है तो वहीं दूसरी ओर मधेस और पहाड़ के बीच की वर्षों के खाई को भी भरना है । राष्ट्रीय एकता को सशक्त बनाए रखने के लिए रवि लामीछाने का यह उदारतापूर्ण और दूरदृष्टीपूर्ण घोषणा वास्तव में नेपाल के राजनीति और विकास में एक नया अध्याय जोड़ेगा । राष्ट्रीय अखंडता और स्वाभिमान को और अधिक सशक्त बनाए रखेगा । इसके बावजूद भी मधेस में इस घोषणा के प्रति शंका उपशंका समय समय पर उठ ही जाता है । बुद्धिमान लोग इनपर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं ।
संस्थागत अस्थिरता और नेतृत्व की विफलता का सबसे बड़ा प्रभाव देश के युवाओं पर पड़ा है । बेरोजगारी, अवसरों की कमी और राजनीतिक अनिश्चितता उन्हें देश से विमुख कर रही है । आज विश्व के विभिन्न देशों में ४० लाख के करीब नेपाली नागरिक रोजगारी, शिक्षा और व्यापार के कारण बसे हुए हैं । उन्हें नेपाल से उतनी ही प्रेम है जितना नेपाल के भ्रष्ट शासकों को सत्ता से है । अर्थात् उनके हृदय में नेपाल है,लेकिन दुर्भाग्य! कि वो रेमिटेंस तो दे रहे हैं । देश उनके रेमिटेंस से दौड़ रही है । नेता मोटे हो रहे हैं । लेकिन उन्हें वोट देने से वंचित किया जा रहा है । क्या एक देश के अभिभावक का यही कर्तव्य होना चाहिए ? क्या अभिभावक इसको ही कहते हैं ? वास्तव में ये अभिभावक नहीं, देश के गद्दार है । युवाओं के भविष्य को अंधकार करनेवाले है । ये लोग किसी भी क्षण देश को बेचकर विदेश में सेटल हो जाएंगे । इनमें न राष्ट्रीयता है नहीं मानवता ही ।संविधान और कानून का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में होना चाहिए । निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी हो, पद नहीं बल्कि प्रक्रिया सर्वोच्च हो । अतः हमें अपनी सभी संस्थाओं को पवित्र और जनसेवा में समर्पित करने के लिए उन सभी संस्थाओं को सभ्य, सुसंस्कृत, सृजनशील और समझदार अभिभावकों के नेतृत्व में सौंपना होगा ।
नेतृत्व को सत्ता का स्वामी नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम मानने की संस्कृति आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है । जब नेतृत्व स्वयं को शासक समझने लगता है, तब सत्ता अहंकार में बदल जाती है और जनहित का भाव अहित में बदल जाता है । इसके विपरीत, सेवक–भाव से प्रेरित नेतृत्व जनता की पीड़ा, आवश्यकता और आकांक्षाओं को अपने दायित्व का केंद्र बनाता है । ऐसा नेतृत्व आदेश देने के लिए नहीं, बल्कि साथ चलने, सुनने और समाधान खोजने के लिए खड़ा होता है । सेवक नेतृत्व की संस्कृति विकसित करने के लिए सबसे पहले मानसिकता में परिवर्तन आवश्यक है । नेता को यह स्वीकार करना होगा कि सत्ता उसे विशेषाधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए एक अवसर है । पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता इस संस्कृति के आधार स्तंभ हैं । जब नेता अपने निर्णयों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं, तब विश्वास स्वतः सुदृढ़ होता है । इतिहास और परंपरा हमें सिखाती है कि महान नेतृत्व वही रहा है जिसने स्वयं को जनता के बीच रखा, न कि उनसे ऊपर । लोकतंत्र की आत्मा भी इसी में निहित है कि प्रतिनिधि शासक नहीं, लोकसेवक हों । यदि हम नेतृत्व को सेवा से जोड़ सकें, तो राजनीति शक्ति–संघर्ष नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन बनेगी । यही संस्कृति समाज को न्यायपूर्ण, समावेशी और सशक्त भविष्य की ओर ले जा सकती है ।
व्यक्ति व्यक्ति में वैचारिक अंतरविरोध हो सकता है । होना भी चाहिए । इसका भी अपना एक अलग महत्व है । असहमति को शत्रुता नहीं, बल्कि लोकतंत्र का स्वाभाविक और सुंदर पक्ष मानना चाहिए । विचारों की विविधता से ही समाज में विमर्श, सुधार और प्रगति संभव होती है । जब असहमति को दबाया जाता है, तब लोकतंत्र खोखला हो जाता है और संवाद की जगह टकराव ले लेता है । स्वस्थ असहमति सत्ता को निरंकुश होने से रोकती है और नीतियों को अधिक जनोन्मुखी बनाती है । लोकतांत्रिक सौंदर्य इसी में है कि भिन्न मतों को सम्मानपूर्वक सुना जाए, तर्क से उत्तर दिया जाए और विरोध को भी राष्ट्रहित का हिस्सा समझा जाए । यही है संवाद का सुंदर माहौल । जो भीषण वैचारिक अंतरविरोध को भी बड़ी सहजता से राष्ट्रहित में समझदारी बनाने में सहायक सिद्ध होता है ।
मधेस के लिए अब केवल भावनात्मक राजनीतिक नारों से आगे बढ़ने का समय आ चुका है । वर्षों से उठती रही आवाजÞों और आंदोलनों ने पहचान और अधिकार के प्रश्न को सामने तो रखा, लेकिन स्थायी समाधान के लिए ठोस और समावेशी नीतियों की आवश्यकता है । मधेस की वास्तविक उन्नति तभी संभव है जब सामाजिक न्याय को नीति निर्माण के केंद्र में रखा जाए और हर वर्ग को समान अवसर उपलब्ध कराए जाएँ । समान प्रतिनिधित्व केवल संवैधानिक प्रावधानों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रशासन, सुरक्षा निकायों, शिक्षा संस्थानों और नीति–निर्धारण के स्तर तक प्रभावी रूप से लागू हो । शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, सुलभ उच्च शिक्षा और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकी तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण अनिवार्य हैं । स्वास्थ्य सेवाओं की सुदृढ़ व्यवस्था, ग्रामीण क्षेत्रों तक अस्पतालों और विशेषज्ञ सेवाओं की पहुँच, मधेस की जीवन–स्थितियों को बेहतर बना सकती है । आर्थिक विकास के लिए कृषि आधुनिकीकरण, लघु तथा घरेलू उद्योगों का विस्तार, सीमावर्ती व्यापार का व्यवस्थित विकास और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित करना आवश्यक है । जब नीतियाँ जमीन की वास्तविकताओं से जुड़ेंगी, तभी मधेस सशक्त होगा और राष्ट्र के समग्र विकास में अपनी पूर्ण भूमिका निभा सकेगा ।
राजनीति को स्वस्थ, प्रभावकारी और लोकतांत्रिक बनाने के लिए सिद्धांत–आधारित नेतृत्व विकास, गम्भीर नीति–विमर्श और वैचारिक शिक्षा को प्राथमिकता देना अनिवार्य है । जब राजनीतिक दलों और सिद्धांतो के भीतर नेतृत्व केवल वंश, नातेदारी या व्यक्तिगत निकटता के आधार पर उभरता है, तब योग्यता, अनुभव और जनसेवा की भावना हाशिए पर चली जाती है । इसके परिणामस्वरूप राजनीति उत्तराधिकार का माध्यम बन जाती है, न कि जनकल्याण का । यदि दल अपने भीतर नियमित प्रशिक्षण, वैचारिक कक्षाएँ और नीति–संवाद की परंपरा विकसित करें, तो जमीनी कार्यकर्ता भी नेतृत्व के लिए तैयार हो सकते हैं । उदाहरण के लिए, किसी दल द्वारा स्थानीय स्तर पर युवाओं के लिए नीति–शिविर आयोजित किए जाएँ, जहाँ संविधान, सामाजिक न्याय, अर्थनीति और सुशासन पर चर्चा हो, तो वहीं से सक्षम नेतृत्व उभर सकता है । इसी प्रकार, पंचायत या नगर स्तर पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को संगठनात्मक जिम्मेदारी देकर आगे बढ़ाया जाए, न कि केवल “परिवार के नाम” को आधार बनाया जाए । योग्यता–आधारित राजनीति से न केवल दल मजबूत होते हैं, बल्कि लोकतंत्र भी विश्वसनीय बनता है । जब नेतृत्व विचार, क्षमता और प्रतिबद्धता से चयनित होता है, तब राजनीति सत्ता का खेल नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनती है । और यहां से अभिभावकीय संस्कार में समृद्धि होने लगती है । युवाओं में समाज और देश के प्रति कर्तव्य का बोध गहराने लगता है । जो उन्हें एक सक्षम और योग्य नेतृत्व क्षमता प्रदान करता है ।
नेपाल और मधेस आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ निर्णय केवल सत्ता का नहीं, दिशा का है । यदि संस्थाएँ व्यक्तियों के अधीन रहीं और नेतृत्व अभिभावकीय दायित्व निभाने में असफल रहा, तो लोकतंत्र केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा । लेकिन यदि संस्थागत स्थायित्व को प्राथमिकता दी गई और राजनीति को जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और दूरदृष्टि के साथ संचालित किया गया, तो नेपाल और मधेस दोनों एक समावेशी, न्यायपूर्ण और सशक्त लोकतंत्र की ओर अग्रसर हो सकते हैं ।
अंततः, मजबूत राष्ट्र वही होता है जहाँ संस्थाएँ स्थिर हों और नेतृत्व अभिभावक की तरह समाज की रक्षा, मार्गदर्शन और भविष्य निर्माण में संलग्न हो ।

