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महंगा डॉलर और महंगा तेल, पूर्व तैयारी शून्य, बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर

काठमांडू।

अमेरिका और इज़राइल द्वारा 28 फरवरी को ईरान पर किए गए संयुक्त सैन्य अभियान के बाद विश्व भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारी हलचल मच गई है।

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनी के मारे जाने और ईरान की परमाणु भट्टियों को गंभीर क्षति पहुंचने के साथ ही मध्यपूर्व का तनाव चरम पर पहुंच गया है।

घटना के 48 घंटे भी नहीं बीते थे कि इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार में दिखने लगा, जिससे नेपाल और भारत जैसे तेल आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव पड़ने के संकेत मिले हैं।

युद्ध शुरू होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई। कुछ दिन पहले तक प्रति बैरल 72 अमेरिकी डॉलर के आसपास रहने वाला  ब्रेन्ट क्रुड  का दाम बढ़कर 84 डॉलर के करीब पहुंच गया है, जबकि  डब्ल्यूटीआई भी 77 डॉलर पार कर चुका है।

बीबीसी के अनुसार एक ईरानी अधिकारी ने ‘स्ट्रेट अफ हर्मुज’ से गुजरने वाले किसी भी जहाज को “आग लगा देने” की धमकी दी है। यह जलडमरूमध्य विश्व के पेट्रोलियम परिवहन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है।

दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। यदि यहां अवरोध उत्पन्न हुआ तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला ध्वस्त हो सकती है।

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युद्ध क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों का बीमा शुल्क आसमान छूने लगा है, जिससे केवल तेल ही नहीं बल्कि समुद्री मार्ग से होने वाला समूचा आयात-निर्यात महंगा होना लगभग तय है।

मध्यपूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अपने ऊर्जा केंद्र पर ड्रोन हमले के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) निर्यातक देश कतर ने उत्पादन रोक दिया है। इससे यूरोप और एशिया में गैस की कीमतों में एक ही दिन में 50 प्रतिशत तक की ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई।

सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी  कतार इनर्जी ने विज्ञप्ति जारी कर बताया कि रास लफान और मेसाइद औद्योगिक शहरों में सैन्य हमलों के कारण एलएनजी और अन्य संबंधित उत्पादन अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया है।

विश्व की लगभग 20 प्रतिशत एलएनजी आपूर्ति करने वाले कतर के इस कदम से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में गंभीर संकट की स्थिति बन गई है।

विश्व के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश भारत पर इसका गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है, हालांकि आम उपभोक्ताओं के लिए अभी तत्काल कीमतें नहीं बढ़ाई गई हैं। यदि युद्ध तेज होता है और आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है तो भारत की आधी ईंधन आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

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नेपाल का 100 प्रतिशत पेट्रोलियम आयात भारत से ही होता है। चालू आर्थिक वर्ष के सात महीनों में नेपाल ने 1 खरब 80 अरब 74 करोड़ रुपये के पेट्रोलियम पदार्थ आयात किए हैं।

भारत से पूरी तरह खुली सीमा और आर्थिक निर्भरता के कारण नेपाल के लिए यह संकट “दोहरी मार” बन सकता है। नेपाल आयल निगम भारतीय ऑयल कॉर्पोरेशन से परिष्कृत तेल खरीदता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी कीमतों का असर अगली मूल्य सूची में दिख सकता है। निगम हर 15 दिन में कीमत समायोजित करता है।

यदि कच्चा तेल महंगा होता है तो भारत में डॉलर की मांग बढ़ेगी, जिससे भारतीय रुपये पर दबाव पड़ेगा और नेपाली मुद्रा भी कमजोर हो सकती है।

महंगा डॉलर और महंगा तेल—दोनों का बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। पूर्व वाणिज्य एवं आपूर्ति सचिव पुरुषोत्तम ओझा के अनुसार नेपाल पूरी तरह भारत पर निर्भर है और भारत स्वयं अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर है, इसलिए जोखिम उच्च है।

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ईंधन महंगा होते ही परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे खाद्यान्न और दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दाम भी बढ़ जाएंगे।

उन्होंने कहा कि 90 दिन के भंडारण की योजना वर्षों से लंबित है। यदि पर्याप्त भंडारण सुविधा होती तो संकट में राहत मिल सकती थी।

नेपाल आयल निगम के अनुसार तत्काल किसी बड़े संकट की आशंका नहीं है। निगम के पास 20 अरब रुपये का मूल्य स्थिरीकरण कोष है।

भारत के साथ दीर्घकालिक समझौते के कारण आपूर्ति बाधित नहीं होगी। वर्तमान भंडारण क्षमता पूरी आपूर्ति रुकने की स्थिति में भी लगभग 10 दिन की मांग पूरी कर सकती है।

नेपाल में प्रतिदिन लगभग 2,000–2,500 किलोलीटर पेट्रोल और 4,000 किलोलीटर डीजल की खपत होती है। यदि आपूर्ति बाधित होती है तो केवल सड़क परिवहन ही नहीं, बल्कि निर्माण, उद्योग और कृषि क्षेत्र भी प्रभावित होंगे। खाद्यान्न वितरण प्रणाली तक चरमरा सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि की स्थिति में इसका आर्थिक बोझ नेपाल जैसे कमजोर अर्थतंत्र पर बहुत भारी पड़ सकता है।

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