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सुप्रीम कोर्ट ने रवि लामिछाने के मामले में अभियोग संशोधन पर फाइल मंगाई, अगली सुनवाई 9 चैत को

 

काठमांडू, 19 मार्च 026। नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के अध्यक्ष रवि लामिछाने से जुड़े विवादास्पद मामले में महान्यायाधिवक्ता (महानिदेशक अभियोजन) के कार्यालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सम्मन जारी किया है। अदालत ने मामले से संबंधित सभी फाइलें पेश करने का आदेश दिया है।

न्यायाधीशों शारंगा सुवेदी और सुनील कुमार पोखरेल की पीठ ने यह आदेश महान्यायाधिवक्ता सविता भण्डारी द्वारा लामिछाने सहित आरोपियों के खिलाफ़ ‘संगठित अपराध’ और ‘सम्पत्ति शुद्धीकरण’ (मनी लॉन्ड्रिंग) के आरोपों को हटाने के लिए अभियोगपत्र (चार्जशीट) में संशोधन करने के निर्णय के खिलाफ दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

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अदालत ने कहा कि महान्यायाधिवक्ता कार्यालय द्वारा 2 फागुन को सभी प्रतिवादियों के खिलाफ मामला वापस लेने (फिर्ता) संबंधी जो निर्णय लिया गया था, वह अभी तक पेश नहीं किया गया है। पीठ ने इसे पेश करने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई के लिए 9 चैत की तारीख तय की है और इसे ‘हेर्न नमिल्ने’ (सुनवाई के योग्य नहीं) न्यायाधीश की पीठ के समक्ष रखने को कहा है। इस मामले की सुनवाई रविवार से शुरू हुई थी और तीन दिनों तक ‘हेर्दाहेर्दै’ (निरंतर सुनवाई) में बहस चली थी।

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यह रिट याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी और कानून के छात्रों आयुष बडाल एवं युवराज पौडेल सफल ने दायर की है। याचिका में महान्यायाधिवक्ता कार्यालय के फैसले को ‘प्रथम दृष्टया अवैध, दुर्भावनापूर्ण और मनमाना’ बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई है।

पृष्ठभूमि के अनुसार, महान्यायाधिवक्ता सविता भण्डारी ने 30 पुस 2082 (नेपाली कैलेंडर) को कास्की, काठमांडू, रुपन्देही और पर्सा जिला अदालतों में लामिछाने के खिलाफ दायर मामलों में ‘संगठित अपराध’ और ‘सम्पत्ति शुद्धीकरण’ के आरोपों को हटाने के लिए अभियोगपत्र संशोधन का निर्णय लिया था।

उस निर्णय में तर्क दिया गया था कि लामिछाने पर राजनीतिक प्रतिशोध के आधार पर आरोप लगाए गए हैं और बचतकर्ताओं (निवेशकों) के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हालांकि इस संशोधन के लिए देश की कानूनी संहिता (मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता) की धारा 36 को आधार बनाया गया था, रिट याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह व्यवहार में मामला वापस लेने जैसा कृत्य है। उनका यह भी तर्क है कि सम्पत्ति शुद्धीकरण (मनी लॉन्ड्रिंग) से जुड़े मामलों को वापस लेने पर संहिता की धारा 116 द्वारा रोक लगाई गई है, ऐसे में यह निर्णय गलत और अवैध है।

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