पुलिस दमन के जबाब में एक बार फिर मधेश आन्दोलन
आज फिर से मधेश का शहर सुनसान लग रहा है । गाँवो में कोलहाल मची है । कौन कब पुलिस की गोलीयाँ और लाठी से मरेगा, घायल होगा, चोटपटक लगेगा जो करीबन ८ वर्ष पहले हुआ था । आठ वर्ष पहले अर्थात बि.सं. ०६३÷०६४ की घटना को भुल जना ही आज का आन्दोलन का देन है । उस समय भी मधेशी जनता ने अधिकार के लिए कुर्वानी दिया था । आज भी वही बात की पुनरावृति हो रही है । अगर खस शासक इसे गम्भीरता से लिया रहता तो आज फिर से आन्दोलन नही करना पडता ।
सप्तरी के भारदह में एक आन्दोलनकारी को पुलिस की गोली से मौत हो गई है । दर्जनौं घायल है । पुलिस ने दमन करना अभी तक नही छोडी है । राज्य द्वारा किया गया दमन से अभी तक किसी प्रकार का आन्दोलन नही दवा है । अगर विगत का इतिहास ही देखा जाए तो प्रथम मधेश आन्दोलन में ५२ मधेशी जनता ने शहादत दिया था । उस समय मे भी राज्य ने दमन प्रवृति अपनाया था । लेकिन सरकार के दमन नीति से आन्दोलन दवा नही और मबजुत बन गया । जिसका परिणाम सरकार को वार्ता करना पडा और उस वार्ता टोली मे मधेशवादी दल की ओर से उपेन्द्र यादव, महन्थ ठाकुर, राजेन्द्र महतो, तथा सरकार की ओर से तत्कालिन प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला थे । ८ बुँदे सम्झौता हुआ जिसे आज संविधान में कार्यान्वयन करने से राज्य पिछे हट रही है ।
राजधानी का कुछ मिडियाकर्मी साथी ने मधेशवादी दलों पर आरोप भी लगा रहे है कि संविधान निर्माण का बाधक मधेशवादी मोर्चा है । मैं उन्हे यह कहना चाहुँगा कि ०६४ साल फागुन १६ मधेश आन्दोलन के क्रम में सरकार के साथ मधेशवादी दल के साथ जो सम्झौता हुई उस सम्झौता के अनुसार संविधान बनाने से पिछे क्यो हट रहे है ? मधेशी दल के साथ ८ बुँदे सम्झौता जो हुई आज वह भी एक बहस की विषय होनी चाहिए । मधेश आन्दोलन के क्रम में इससे पहले भी १९ दिन तक आन्दोलन हुआ था । जिसमे ५२ मधेशी अधिकार के वास्ते शहीद हुआ था । पहला मस्यौदा जो सरकार ने लाया है उसमें भी कही भी मधेश आन्दोलन की चर्चा और शहीद प्रति श्रद्धाञ्जली तक व्यक्त नही की गई है । यह सत्ता पक्ष की सबसे बडी कमजोरी वा मधेश आन्दोलन को हिनता से देखने का बोध है ।
हा, मधेशी दलो का मुख्य माँग था ‘एक मधेश स्वायत प्रदेश’ चार प्रमुख दल ने प्रदेश को विभाजन ६ प्रदेश में किया है जिनमें मधेश में तीन प्रदेश किया गया है । मधेशवादी दल ने यह स्वीकार भी कर लिया । अब सवाल रही ६ प्रदेश का जिस प्रकार से सीमाकंन किया गया है वह वास्तव में मधेश का एक भी प्रदेश सबल और आत्म निर्भर सम्भव नही है । प्रदेश नं. २ जनसंख्या के दृष्टि से अच्छा है भी तो सिंचाई की दृष्टि से बिलकुल नही । तराई किसान की भूमी है । यहाँ का अधिकांश लोग खेती पर निर्भर है । लेकिन यह तभी सम्भव है जब पहाड और तराई की भूमी जोडकर प्रदेश निर्माण किया जाए ।
हा, ऐसा भी नही है कि पहाड के भूमी लेने से मधेशी दल नही कतराते थे । अभी भी मधेश के राजनीति में बहुत हद तक परिपक्वता की कमी है इसे भी स्वीकार करनी होगी । हम जिस प्रकार से नारा बुलन्द कर रहे है वह कही न कही आज महसुस करा रहे है । प्रदेश निर्माण में मधेश भुमी मात्र नही, सबल मधेश प्रदेश के लिए सीमा की माँग होनी चाहिए था । किसी भी देश और प्रदेश में एकल जात का वचस्र्व देश और प्रदेश के लिए सबसे बडी घातक होता है । अब की आन्दोलन जातपात और समुदाय का नही सबल प्रदेश कैसे बनाया जाए होनी चाहिए ।
देश को एक कडी में बाँधने और सम्पन्न राष्ट्र निर्माण के लिए संविधान आवश्यक है । अब एकलोटी शाही शासन नही है जिस प्रकार चाहे जनता को अपनी ओर मोड ले । जनता अधिकार को समझ रहे है । अगर संविधान निर्माण में किसी का भी नियत खराब हुआ तो उस संविधान को जनता स्वीकार नही करेगें । तसर्थ संविधान में अधिकांश जनता को भावना को कदर होनी चाहिए ।


