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लावारिश संविधान

 
देवेश झा
नेपाल में संविधान निर्माण की मशक्कत पूरे जोरों पर है । यह देश जो पिछले ६५ वर्षों से संविधान सभा द्वारा संविधान पाने के इन्तजार में है वह अब नये संविधान के जन्म की प्रसव वेदना को महसूस कर रहा है । दरअसल भारतीय संस्कृति और सभ्यता के साथ ही सामाजिक तौर पर जुड़ा होने के कारण नेपाल में इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है । यही प्रमुख कारण रहा कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के पश्चात जब वहाँ संविधान सभा द्वारा संविधान बनाने की परिकल्पना की गई तो उसी तर्ज पर नेपाल ने भी राणाओं के पारिवारिक शासन का अन्त करते हुए संविधान सभा द्वारा ही संविधान निर्माण का लक्ष्य तय कर  लिया था  । परन्तु विभिन्न आरोह अवरोह के कारण यह सपना हकीकत नहीं बन पाया है । माओवादियों का सशस्त्र संघर्ष और पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र के शासन का अन्त इसी शर्त पर हुआ था कि नेपाल में अब बनने वाले नये संविधान को एक चुनी हुई संविधान सभा द्वारा बनाया जाएगा । इसी मार्ग चित्र को ध्यान में रखकर अन्तरिम संविधान बनाया गया । परन्तु नेपाल के दक्षिणी भूभाग में परापूर्व काल से बसे हुए मधेसी समुदाय को यह अन्तरिम संविधान स्वयं को उपेक्षित करता दिखा और मधेस के लोगों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया । भयावह संघर्ष का वातावरण बना जिसमें तकरीबन ५४ लोगों ने शहादत दी । सरकार को बाध्य होकर झुकना पड़ा ।
आन्दोलनकारियों और तत्कालीन सरकार के बीच दो लिखित सम्झौते हुए । जिस अनुसार नेपाल के दक्षिणी भाग में २२ जिलों को मधेस स्वीकारा गया और सरकारी नियुक्तियों में इस समुदाय को निश्चित मात्रा में आरक्षण की व्यवस्था की गई । साथ ही यह भी तय हुआ कि भविष्य में बनने वाले संविधान में इन २२ जिलों का एक प्रदेश होगा और देश के केन्द्रीय संसद में इन २२ जिलों से जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व कराया जायगा, यह हुआ भी । इस सम्झौते के बाद ही पहले संविधान सभा का चुनाव सम्भव हो पाया था । परिस्थिति इतनी मजबूत थी कि देश के बड़े दलों को मजबूरन राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति मधेसी समुदाय से ही चुनने को विवश होना पड़ा । परन्तु अदूरदर्शी राजनीतिक सोच और अपरिपक्वता के कारण पहली संविधान सभा अपना दायित्व पूरा किये बगैर भंग कर दी गई । दूसरे संविधान सभा के निर्वाचन से पहले ही मधेसी दल कई टुकड़ों में बँट चुके थे । स्वाभाविक था इस मूर्खता की कीमत तो उन्हें चुकानी ही पड़ती । परिणामतः पिछले चुनाव से अधिक प्रतिशत मत पाने के बावजूद संविधान सभा में मधेस की उपस्थिति कमजोर पड़ गई । जिसका खामियाजा आज मधेस को भोगना पड़ रहा है ।
१६ बूँदे सम्झौते से शुरु हुई चार दलीय यात्रा अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर अग्रसर है । इसके सहयात्रियों ने मुख्य रूप से कुछ विषयों पर सहमत होकर निश्चित समय सीमा के भीतर संविधान बनाना तय किया । यह एक अच्छा कदम था । परन्तु ऐसा करते हुए इन दलों ने विगत के सम्झौतों की अनदेखी कर दी । संघीयता को तो स्वीकारा गया परन्तु बिना नाम और सीमा के । एक मधेस प्रदेश के सम्झौते को अस्वीकार करते हुए मधेस को अनेक टुकड़ों में बाँटने की तैयारी हो चुकी है । नागरिकता जैसे संवेदनशील विषय पर अत्यन्त संकुचित दृष्टिकोण अपनाते हुए इन चार दलों ने आधे से अधिक मधेसी समुदाय के लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का षडयन्त्र किया है । सभी जानते हैं कि मधेस और भारत के लोगों के बीच अकसर वैवाहिक सम्बन्ध बनते ही रहते हैं । इसी को अस्त्र बनाते हुए इस नये संविधान में ऐसी व्यवस्था की जा रही है कि अगर कोई नेपाली किसी विदेशी से विवाह करे तो उससे होने वाली सन्तानको अंगीकृत नागरिक माना जाएगा । साथ ही यह भी तय किया जा रहा है कि देश के महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे नागरिकों का प्रवेश वर्जित होगा । यह एक नियोजित ढंग से मधेसी समुदाय को हाशिये पर रखने की साजिश है ।
नेपाली जनता निस्संदेह नये संविधान की प्रतीक्षा अत्यन्त व्यग्रता से कर रही है । परन्तु देखना यह होगा कि नया संविधान चाहिये ही क्यों ? क्यों अभी तक के किसी भी संविधान में नेपाली जनता को स्वशासन प्राप्त नहीं हुआ है । वही पुराने चेहरे और शासकीय  रवैया बारम्बार थोपा जाता रहा है जिससे लोग निजात पाना चाहते हैं । चार दलीय सहमति पर आधारित नये संविधान के प्रारम्भिक मसौदे पर आयी तीखी प्रतिक्रिया इसका सबूत है । पुलिस के डंडे, अश्रु गैस और कहीं कहीं गोलियों के प्रयोग के बीच जनता से अपना सुझाव देने को कहा गया । यह कैसा सुझाव संकलन था जिसमें एक पूर्व प्रधानमन्त्रीजी पर अपने ही गृह जिले में कुर्सी फेंकी गई । कई जगहों पर सुरक्षा बल और मधेसी जनता के बीच भारी झड़प होने की खबरें आई । झापा, मोरङ्ग, सुनसरी, सप्तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बारा, पर्सा, मकवानपुर, चितवन, रुपन्देही, कपिलवस्तु, दाङ्ग, कैलाली, कञ्चनपुर सहित पूरा मधेस इस दौर में काफी तनावपूर्ण रहा । जो कि अभी तक सामान्य अवस्था में नहीं लौटा है । तो क्या इसी प्रकार बनेगा वह लोकप्रिय संविधान जिसके लिये जनता ने पिछले ६५ वर्षों से संघर्ष किया है ।
शासकों  का मनोविज्ञान भी अजीब सा होता है । बाहर से वे जितना भी सख्त दिखें अन्दर से बेहद डरे हुए होते हैं । खुद के द्वारा अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिये किये गये हर कपट से वे वाकिफ होते हैं । इसीलिये एक अज्ञात भय उन्हें दबोचे रहता है । शायद कुछ ऐसी ही अवस्था नेपाली शासकों की है । उन्हें सी.के.राउत के वीडियो से भय होता है, जे.पी.गुप्ता के हिलने से भी भय लगता है । और तो और, अब तो उन्हें आम मधेसी के साँस लेने से भी भय लगने लगा है । लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ने प्रदेशों को लोक सेवा परीक्षा लेने का अधिकार न दिये जाने का आग्रह किया है । नेपाल प्रहरी ने प्रदेश की पुलिस फोर्स को उनके मातहत रखने का सुझाव दिया है । हर विभाग प्रान्त बनने से भयभीत है । उन्हें अपना एकाधिकार छिनने का डर लग रहा है । फिर वो चार दल जो १६ बूँदे के द्वारा संविधान निर्माण के लिये उतारु हैं, वास्तव में सिंहदरबार की कुर्सी के लिये छटपटा रहे हैं । ए.मा.ले.को जल्दी से प्रधानमन्त्री की कुर्सी चाहिये । इसलिये उसके नेता कुछ भी सुनने को तैयार नहीं ।
विश्व भर की संसदीय राजनीति की परम्परा यही है कि कहीं भी संसद के सबसे बड़े दो दल मिलकर सरकार नहीं बनाते । जनादेश यह माना जाता है कि सबसे बड़ा दल सरकार बनाए और दूसरे स्थान का दल विपक्ष में बैठे । अब मान भी लें कि संविधान निर्माण के मुद्दे को ध्यान में रखकर दोनों बड़े दलों ने मिलकर सरकार बनाया था । तो क्याअब संविधान बन जाने के बाद उस स्थिति का अन्त हो जाएगा या फिर सीमांकन और नामांकन नहीं हो पाने के बहाने दोनों दल कुर्सी के बँटवारे की राजनीति को ही जारी रखेंगे । यह तो वैसा ही अद्भुत होगा कि जैसे भारतीय संसद में बीजेपी और काँग्रेस मिलकर सरकार बना लें

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