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ईरान से समझौते के बिना क्यों लौटे वेंस? तीन मुद्दों पर अटकी बातचीत, अब ट्रंप के पास क्या विकल्प?

 

हिमालिनी डेस्क, 12 अप्रैल 2026 ।बईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम को स्थायी शांति में बदलने की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 21 घंटे तक चली सीधी वार्ता बिना किसी समझौते के विफल हो गई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व वाला प्रतिनिधिमंडल और ईरानी संसद के अध्यक्ष बाघेर गालिबाफ का दल खाली हाथ लौट गया है।

दोनों पक्षों के बीच जारी दो सप्ताह का संघर्ष विराम अब भी लागू है, लेकिन बातचीत के असफल रहने के बाद यह सवाल गहरा गया है कि आखिर किन मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई और अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगला कदम क्या उठाएंगे।

किन तीन मुख्य मुद्दों पर नहीं बन पाई सहमति?

1. ईरान का परमाणु कार्यक्रम (सबसे बड़ा अड़ंगा):
अमेरिका ने मांग की कि ईरान अपना परमाणु संवर्धन कार्यक्रम स्थायी रूप से बंद कर दे और हथियार बनाने के सभी साधन नष्ट कर दे। वहीं, ईरान ने एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि) के तहत अपने अधिकारों का हवाला देते हुए संवर्धन जारी रखने पर अड़े रहे। ईरान ने केवल कुछ वर्षों के लिए संचालन निलंबित करने की पेशकश की, लेकिन इसे पूरी तरह समाप्त करने से इनकार कर दिया।
2. होर्मुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण:
अमेरिका ने बिना किसी शर्त के इस वैश्विक ऊर्जा मार्ग को सभी देशों के लिए खोलने की मांग की। जबकि ईरान ने इस जलडमरूमध्य पर अपने नियंत्रण की गारंटी मांगी और स्पष्ट किया कि समग्र समझौते के बिना वह इस मुद्दे पर कोई रियायत नहीं देगा।
3. प्रतिबंध हटाने और मुआवजे की शर्तें:
ईरान ने अमेरिकी-इज़राइली हमलों में हुए नुकसान का मुआवजा, दशकों से लगे प्रतिबंधों को तुरंत हटाने और विदेशी बैंकों में जब्त अपने फंड को वापस पाने की मांग रखी। अमेरिका ने इसे पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि प्रतिबंध केवल शर्तें पूरी होने पर धीरे-धीरे हटाए जा सकते हैं।

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वार्ता विफल क्यों हुई?

· “जीत” का अहसास: अमेरिका को लगता है कि 13,000 ईरानी ठिकानों पर बमबारी के बाद ईरान को हार माननी चाहिए। वहीं, ईरान का मानना है कि इतने बड़े हमले झेलकर अमेरिका को बातचीत की मेज पर लाना उसकी जीत है।
· अमेरिकी प्रस्ताव बहुत सख्त: अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस ने परमाणु कार्यक्रम पर दीर्घकालिक रोक और होर्मुज खोलने को अपनी “रेड लाइन” (जिसमें कोई मोल-तोल नहीं) बताया। ईरान ने इसे “अनुचित और अत्यधिक” करार देते हुए अस्वीकार कर दिया।

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अब आगे क्या करेंगे ट्रंप? चार संभावित रास्ते

1. युद्ध फिर से शुरू होना (सबसे बड़ा खतरा):
21 अप्रैल को संघर्ष विराम समाप्त हो रहा है। यदि कोई प्रगति नहीं हुई, तो ट्रंप बड़े पैमाने पर सैन्य हमले फिर से शुरू कर सकते हैं। इस बार नागरिक ढांचों को निशाना बनाए जाने की आशंका है।
2. ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी:
ट्रंप ने संकेत दिया है कि वेनेजुएला की तर्ज पर ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी पर विचार किया जा सकता है। अमेरिकी नौसेना फारस की खाड़ी में होर्मुज से आने-जाने वाले जहाजों को रोक सकती है। हालांकि, इससे खाड़ी देशों का व्यापार ठप हो जाएगा और वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट आएगा।
3. कूटनीति का दरवाजा अभी पूरा बंद नहीं:
अमेरिका ने ईरान के जवाब का इंतजार करने की बात कही है। ईरान ने अगले दौर की बातचीत की कोई योजना नहीं बनाई है, लेकिन उसके विदेश मंत्रालय ने कहा है कि कूटनीति का रास्ता अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजना ही अमेरिका की गंभीरता दिखाता है, इसलिए भविष्य में और वार्ताएं हो सकती हैं।
4. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी असर:
अगर युद्ध फिर से भड़का, तो दुनिया की 20% तेल आपूर्ति खतरे में आ जाएगी, जिससे पेट्रोल की कीमतें आसमान छूएंगी। इसके अलावा सेमीकंडक्टर और उर्वरक के लिए जरूरी हीलियम जैसी गैसों की कमी से महंगाई बेतहाशा बढ़ सकती है। भारत पर भी खाड़ी से तेल और एलपीजी आयात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना तय है।

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निष्कर्ष:

फिलहाल, दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं। अमेरिका के पास या तो सैन्य विकल्प चुनने का दबाव है या फिर मध्यस्थता के नए प्रयासों का इंतजार करने का। अगले दस दिन यह तय करेंगे कि पश्चिम एशिया में युद्ध थमता है या और भीषण रूप लेता है।

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