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सिंधु जल संधि : असीमित दायित्व, असमान रियायतें और पाकिस्तान का हथियारीकरण

 

डॉ. प्रदीप कुमार सिन्हा । दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति भी है। विशेषकर भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सिंधु नदी प्रणाली केवल नदियों का समूह नहीं, बल्कि युद्ध, कूटनीति, कृषि, ऊर्जा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की ऐतिहासिक सफलता माना जाता रहा है। लेकिन गहराई से देखने पर यह संधि समान साझेदारी से अधिक भारत की एकतरफा उदारता और पाकिस्तान के रणनीतिक लाभ का दस्तावेज प्रतीत होती है।

इस संधि ने भारत को कानूनी रूप से बांधा, पाकिस्तान को स्थायी जल सुरक्षा प्रदान की, लेकिन बदले में भारत को बार-बार अवरोध, अंतरराष्ट्रीय प्रचार युद्ध और अपने ही विकास में रुकावटों का सामना करना पड़ा। प्रश्न उठता है—क्या सिंधु जल संधि वास्तव में “न्यायसंगत” थी, या भारत की सद्भावना को संरचनात्मक रूप से पाकिस्तान के पक्ष में इस्तेमाल किया गया?

सिंधु नदी प्रणाली में छह प्रमुख नदियाँ शामिल हैं—सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। ये नदियाँ भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की कृषि, पेयजल और ऊर्जा उत्पादन की जीवनरेखा हैं। 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय यह नदी प्रणाली भी दोनों नए राष्ट्रों के बीच बंट गई। भौगोलिक रूप से भारत ऊपरी तटीय राष्ट्र था, जहाँ अधिकांश नदियों के स्रोत स्थित थे। दूसरी ओर पाकिस्तान निचले प्रवाह में स्थित कृषि-निर्भर राष्ट्र था, जिसका पंजाब क्षेत्र भारतीय भूभाग से बहने वाले पानी पर निर्भर था।

इसी निर्भरता ने पाकिस्तान को जल सुरक्षा को लेकर चिंतित रखा। भारत चाहता तो तत्काल पानी नियंत्रित कर पाकिस्तान पर दबाव बना सकता था, लेकिन एक नवस्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उसने सह-अस्तित्व और स्थिरता को प्राथमिकता दी। विश्व बैंक की मध्यस्थता में शुरू हुई वार्ताओं ने अंततः 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि का रूप लिया।

संधि की शुरुआती प्रक्रिया से ही भारत और पाकिस्तान के दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर दिखाई दिया। भारत समाधान चाहता था, जबकि पाकिस्तान अधिकतम लाभ। 5 फरवरी 1954 को विश्व बैंक द्वारा प्रस्तुत पहले ठोस प्रस्ताव में ही भारत पर कठोर सीमाएँ लगा दी गई थीं।

उस प्रस्ताव के अनुसार भारत को सिंधु और चिनाब नदियों पर अपनी कई नियोजित परियोजनाएँ छोड़नी पड़ीं। चिनाब नदी से लगभग 6 मिलियन एकड़ फीट पानी मोड़ने की संभावना समाप्त कर दी गई। मराला क्षेत्र में भारतीय उपयोग की संभावना खत्म हुई। कच्छ क्षेत्र में नदी प्रणाली के विकास पर भी रोक लगा दी गई।

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इन सभी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने तत्काल सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। इसका कारण था—स्थिरता और दीर्घकालिक शांति की इच्छा। लेकिन पाकिस्तान ने लगभग पाँच वर्षों तक औपचारिक स्वीकृति ही नहीं दी। 1958 तक उसने वार्ताओं को लंबा खींचकर भारत को रणनीतिक रूप से सीमित बनाए रखा।

इस प्रक्रिया ने पाकिस्तान को एक स्पष्ट संदेश दिया—अवरोध पैदा करने से अधिक रियायतें मिलती हैं, जबकि सहयोग करने की कीमत चुकानी पड़ती है।

पानी का असमान बँटवारा

संधि का सबसे विवादास्पद पक्ष पानी का वास्तविक बँटवारा था। भारत को पूर्वी नदियाँ—रावी, ब्यास और सतलुज—दी गईं, जिनका वार्षिक प्रवाह लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट था। पाकिस्तान को पश्चिमी नदियाँ—सिंधु, झेलम और चिनाब—मिलीं, जिनका वार्षिक प्रवाह लगभग 135 मिलियन एकड़ फीट था।

अर्थात पूरी नदी प्रणाली का लगभग 80 प्रतिशत पानी पाकिस्तान को मिला, जबकि भारत को केवल 20 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया।

यह और भी महत्वपूर्ण तब हो जाता है जब याद रखा जाए कि भारत ऊपरी तटीय राष्ट्र था। अंतरराष्ट्रीय नदी कानूनों में सामान्यतः ऊपरी राष्ट्रों को अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं। लेकिन सिंधु जल संधि में भारत ने अपने भौगोलिक लाभ का त्याग करते हुए पाकिस्तान को दीर्घकालिक जल सुरक्षा की गारंटी दी।

भारत को बदले में क्या मिला? केवल उन नदियों पर औपचारिक मान्यता, जिनका उपयोग वह पहले से कर रहा था।

संधि का सबसे असामान्य पक्ष आर्थिक प्रावधान था। भारत ने पाकिस्तान को लगभग 62 मिलियन पाउंड मुआवज़े के रूप में देने पर सहमति जताई, जिसकी वर्तमान कीमत लगभग 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर बैठती है।

यह राशि पाकिस्तान में जल अवसंरचना निर्माण के लिए इस्तेमाल की गई, ताकि भारत से अलग हुई नदियों के विकल्प विकसित किए जा सकें।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं, जहाँ ऊपरी तटीय राष्ट्र अपने जल अधिकार त्यागने के साथ-साथ उस “विशेषाधिकार” के लिए निचले राष्ट्र को अतिरिक्त भुगतान भी करे।

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संधि ने भारत पर विस्तृत तकनीकी और संचालन संबंधी प्रतिबंध लगाए। पश्चिमी नदियों पर भारत को सीमित सिंचाई की अनुमति दी गई। जलाशय निर्माण पर कठोर सीमाएँ तय की गईं। यहाँ तक कि जलविद्युत परियोजनाओं की डिज़ाइन भी पाकिस्तान की आपत्तियों के दायरे में रखी गई।

भारत यदि अपने ही भूभाग में कोई परियोजना बनाना चाहता, तब भी जलाशय की गहराई, पानी रोकने की क्षमता, टर्बाइन संरचना जैसे विषयों पर पाकिस्तान आपत्ति उठा सकता था।

लेकिन पाकिस्तान पर ऐसे कोई समान प्रतिबंध नहीं लगाए गए।

इस प्रकार संधि समान साझेदारी की बजाय एकतरफा नियंत्रण की संरचना बन गई।

### पाकिस्तान की रणनीति : संधि को विकास अवरोध का हथियार बनाना

संधि के बाद पाकिस्तान ने इसका उपयोग सहयोग की बजाय भारत के विकास को रोकने के साधन के रूप में किया। पश्चिमी नदियों पर भारत द्वारा शुरू की गई लगभग हर प्रमुख जलविद्युत परियोजना पाकिस्तान की आपत्तियों में घिर गई।

बगलिहार, किशनगंगा, पाकल दुल और तुलबुल जैसी परियोजनाएँ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, तकनीकी विवादों और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझती रहीं। इन विवादों के कारण परियोजनाएँ वर्षों तक अटकी रहीं, लागत बढ़ी और ऊर्जा उत्पादन में देरी हुई।

कई मामलों में पाकिस्तान ने स्वयं स्वीकार किया कि इन परियोजनाओं से उसे बाढ़ नियंत्रण या नियमित जल प्रवाह का लाभ मिलेगा, फिर भी उसने विरोध जारी रखा। इससे स्पष्ट होता है कि वास्तविक उद्देश्य संधि की रक्षा नहीं, बल्कि भारत के विकास को धीमा करना था।

विशेषकर जम्मू-कश्मीर में जलविद्युत विकास को बाधित करना पाकिस्तान की दीर्घकालिक रणनीतिक नीति जैसा बन गया।

भारत ने कभी संधि का उल्लंघन नहीं किया, फिर भी पाकिस्तान लगातार भारत को “पानी को हथियार बनाने वाला राष्ट्र” साबित करने का प्रयास करता रहा।

पाकिस्तानी अधिकारी, शिक्षाविद और कूटनीतिज्ञ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार यह दावा करते रहे कि भारत पाकिस्तान का पानी रोक सकता है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत थी—भारत ने 1965, 1971 और 1999 के युद्धों के दौरान भी पानी नहीं रोका।

यहाँ तक कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के लगातार आरोपों के बावजूद भारत ने संधि का पूर्ण पालन जारी रखा।

विडंबना यह रही कि संधि का सबसे ईमानदार पक्ष भारत रहा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रचार में वही “खतरा” बनाकर प्रस्तुत किया गया।

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जम्मू-कश्मीर की दबाई गई संभावनाएँ

संधि का सबसे गंभीर प्रभाव जम्मू-कश्मीर पर पड़ा। विशाल जलविद्युत क्षमता होने के बावजूद कठोर डिज़ाइन प्रतिबंधों, पाकिस्तानी आपत्तियों और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के कारण क्षेत्र का ऊर्जा विकास सीमित रहा।

स्थानीय जनता के बीच यह भावना मजबूत हुई कि संधि साझा समृद्धि का माध्यम नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर रोक लगाने वाली व्यवस्था है।

ऊर्जा की कमी, सीमित उद्योग और कमजोर अवसंरचना ने जम्मू-कश्मीर की आर्थिक संभावनाओं को दशकों पीछे धकेल दिया।
सिंधु जल संधि की मूल भावना “सद्भावना और मित्रता” पर आधारित थी। लेकिन प्रश्न उठता है—क्या वह वातावरण आज भी मौजूद है?
2001 के भारतीय संसद हमले, 2008 के मुंबई हमले, कारगिल संघर्ष से लेकर 2025 के पहलगाम हमले तक पाकिस्तान पर राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में केवल भारत पर ही सद्भावना बनाए रखने का दायित्व होना स्वाभाविक प्रश्न बन जाता है।
द्विपक्षीय संधियाँ एकतरफा नैतिकता पर नहीं टिकतीं। यदि एक पक्ष लगातार अंतरराष्ट्रीय आचरण का उल्लंघन करे, तो दूसरे पक्ष द्वारा अपने रणनीतिक हितों का पुनर्मूल्यांकन करना अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता।
भारत आज यही प्रश्न उठा रहा है—क्या आतंकवाद को संरक्षण देने वाले राष्ट्र को स्वतः जल सुरक्षा की पूर्ण गारंटी मिलती रहनी चाहिए?
सिंधु जल संधि को दशकों तक शांति का प्रतीक कहा गया। लेकिन गहराई से देखने पर यह भारत की उदारता और पाकिस्तान के रणनीतिक लाभ के बीच एक असंतुलित समझौता दिखाई देता है।
भारत ने 80 प्रतिशत पानी छोड़ा। पाकिस्तान को आर्थिक सहायता दी। अपने ही भूभाग में प्रतिबंध स्वीकार किए। युद्ध और आतंकवाद के बीच भी संधि का पालन जारी रखा।
बदले में उसे क्या मिला? विकास अवरोध, अंतरराष्ट्रीय प्रचार युद्ध और अपने सीमावर्ती क्षेत्रों का अविकास।
इसीलिए आज भारत द्वारा सिंधु जल संधि के पुनर्मूल्यांकन की बात करना आक्रामकता नहीं, बल्कि दशकों पुराने असंतुलन की समीक्षा है।
अंततः कोई भी संधि तभी स्थायी रह सकती है, जब दोनों पक्ष उसे न्यायपूर्ण महसूस करें। जब एक पक्ष दूसरे की सद्भावना को कमजोरी समझने लगे, तब सुधार केवल विकल्प नहीं, आवश्यकता बन जाता है।

**लेखक भारत के पूर्व सिंधु जल आयुक्त हैं।**

 

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