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मधेस, पहाड़, हिमाल सबका देश नेपाल : अजयकुमार झा

 

अजयकुमार झा, जलेश्वर । नेपाल केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण है। हिमाल, पहाड़ और मधेस—ये तीनों क्षेत्र अपनी-अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा, रहन-सहन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखते हुए भी सदियों से एक साझा राष्ट्रीय पहचान के सूत्र में बंधे हुए हैं। समय-समय पर राजनीतिक, सामाजिक तथा क्षेत्रीय असन्तोष के कारण इन क्षेत्रों के बीच दूरी और अविश्वास की स्थिति भी बनी, किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में नेपाल की जनता तथा बुद्धिजीवी वर्ग के बीच जिस प्रकार राष्ट्रीय एकता और पारस्परिक हार्दिकता की भावना विकसित हो रही है, वह देश के लिए अत्यन्त सकारात्मक संकेत है।

हाल के वर्षों में नेपाल अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ावों, वैचारिक संघर्षों और आर्थिक चुनौतियों से गुजरा है। इन परिस्थितियों में जनता का ध्यान केवल क्षेत्रीय हितों तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय हितों की ओर अधिक केन्द्रित हुआ है। वर्तमान सरकार के प्रति हिमाली, पहाड़ी और मधेसी समुदायों में जो सकारात्मक दृष्टिकोण और सहयोगात्मक भावना देखी जा रही है, वह इस बात का प्रमाण है कि नेपाली समाज अब संकीर्ण क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर साझा राष्ट्रीय भविष्य की खोज में है।

विशेष रूप से मधेस और पहाड़ के सम्बन्धों को लेकर अतीत में अनेक प्रकार की बहसें और विवाद होते रहे हैं। मधेसी समुदाय ने प्रतिनिधित्व, पहचान तथा विकास सम्बन्धी प्रश्न उठाए, जबकि पहाड़ी समाज ने भी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के दृष्टिकोण से अपनी चिन्ताएँ व्यक्त कीं। इन मतभेदों के कारण कभी-कभी यह आभास होने लगा था कि नेपाल की सामाजिक एकता कमजोर पड़ रही है। किन्तु वर्तमान समय में यह देखा जा रहा है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद, समझ और सम्मान की भावना बढ़ रही है। जनता यह समझने लगी है कि किसी भी क्षेत्र की समृद्धि दूसरे क्षेत्र की कमजोरी में नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रों के समान विकास में निहित है।

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हिमाली क्षेत्र के नागरिक भी आज स्वयं को राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण भाग महसूस कर रहे हैं। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद उनकी समस्याओं और आवश्यकताओं पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है। इससे उनमें भी राज्य के प्रति अपनत्व और विश्वास की भावना मजबूत हुई है। यही कारण है कि हिमाल, पहाड़ और मधेस के नागरिक अब एक-दूसरे की समस्याओं को केवल क्षेत्रीय प्रश्न न मानकर राष्ट्रीय प्रश्न के रूप में देखने लगे हैं।

विद्वान वर्ग की भूमिका इस परिवर्तन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, मीडिया तथा सामाजिक संगठनों से जुड़े बुद्धिजीवियों ने लंबे समय से यह तर्क प्रस्तुत किया है कि नेपाल की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय पहचान परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं। क्षुद्र मानसिकता और क्षणिक राजनीतिक लाभ के कारण कुछ नेताओं के द्वारा देश में प्रांतीय वैमनस्य, खास वर्ग को केंद्रित कर संविधान निर्माण और अधिकार प्रत्ययोजन कर आंतरिक उपनिवेश जैसा राजनैतिक वातावरण बनाया जा रहा था। आज कुछ सपोले इस विचार से संक्रमित है। परन्तु अब सर्वजन हिताय विचार धीरे-धीरे समाज में स्वीकार्यता प्राप्त कर रहा है। विद्वानों का एक बड़ा वर्ग इस बात पर बल दे रहा है कि नेपाली राष्ट्रवाद किसी एक भाषा, संस्कृति या क्षेत्र का पर्याय नहीं है, बल्कि यह सभी जाति, भाषा, संस्कृति और भूगोल को समेटने वाली व्यापक अवधारणा है।

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वर्तमान सरकार के प्रति विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देने वाली हार्दिकता का एक कारण यह भी है कि जनता अब राजनीतिक नारों से अधिक परिणामों की अपेक्षा कर रही है। लोग विकास, सुशासन, पारदर्शिता और राष्ट्रीय सम्मान को प्राथमिकता देने लगे हैं। जब सरकार राष्ट्रीय हितों, आर्थिक विकास और सामाजिक समरसता की दिशा में पहल करती दिखाई देती है, तब विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास का वातावरण भी मजबूत होता है। यही विश्वास राष्ट्रीय एकता का आधार बनता है।

इतिहास साक्षी है कि जब-जब नेपाल के विभिन्न समुदायों ने एकजुट होकर कार्य किया है, तब-तब देश ने बड़ी चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। चाहे प्राकृतिक आपदाएँ हों, राजनीतिक संकट हों या बाहरी दबाव, नेपाली जनता ने अपनी एकता और साहस का परिचय दिया है। वर्तमान समय में भी यही भावना पुनः सशक्त होती दिखाई दे रही है। हालाँकि यह भी आवश्यक है कि इस सकारात्मक वातावरण को केवल भावनात्मक स्तर तक सीमित न रखा जाए। सरकार, राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और बुद्धिजीवी वर्ग को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी क्षेत्रों और समुदायों को समान अवसर, सम्मान और न्याय मिले। यदि विकास और प्रतिनिधित्व में संतुलन बना रहे, तो यह बढ़ती हार्दिकता स्थायी राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित हो सकती है।

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अन्ततः कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में हिमाली, पहाड़ी और मधेसी जनता तथा विद्वान वर्ग के बीच जो पारस्परिक सम्मान और आत्मीयता विकसित हो रही है, वह नेपाली राष्ट्रीयता के लिए अत्यन्त शुभ संकेत है। यह भावना केवल राजनीतिक समर्थन का विषय नहीं, बल्कि एक ऐसे समावेशी राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है जहाँ विविधता विभाजन का कारण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव का स्रोत बने। जब हिमाल, पहाड़ और मधेस एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयोगी के रूप में देखेंगे, तभी नेपाल वास्तव में समृद्ध, सशक्त और एकताबद्ध राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ सकेगा।

अजयकुमार झा, जलेश्वर

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