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क्यों ये टोपीधारी सिहंदरवार की सत्ता को अजगर की तरह लपेटे हुए हैं : बिम्मीशर्मा

 

धोतीऔर टोपी ?, बिम्मीशर्मा ( व्यग्ंय) २१भाद्र |

पहले हमारा देश पहाड़ और तराई था । अब लोकतन्त्र आने के बाद देश ‘धोती’ और ‘टोपी’ में विभाजित हो गया है । जो टोपी पहने हुए है वह बिना धोती के बदन से नंगे हैं और जो सिर्फ धोती पहने हुए है उनका सर बिना टोपी के है । टोपी वाला धोती को उस का सर खाली देख कर सेम सेम कर रहा है । पर वह खुद अपनी और नहीं देखता कि उसका तो पूरा बदन ही नंगा है । धोतीवाला टोपी की इस लज्जाजनक बात पर क्रुद्ध है । अब धोती उड़ते हुए दूसरे के खेत, खलिहान पर पहुंच गया है ।

topiधोती इस देश का पेट और ‘अन्न का भंडार’ है तो टोपी ‘ताज’ । पर टोपी खाली पेट ही सर की शोभा बढ़ाना चाहता है । जब तक पेट नही भरेगा, देश का अगं अगं अन्न से नही ढकेगा तब तक सर की टोपी कब तक मान बढ़ाएगी अपना और दुसरे का ? पर सिंह दरवार मे कैद टोपी और धोती उसका सम्मान मधेश को सरे आम नंगा कर रही है । टोपी को लगता है कि धोती इस देश की संस्कृति नहीं है । पर उसे क्या मालूम कि इस देश के स्वाभिमानी और राष्ट्र प्रेमी बुनकरों ने ‘धोती’ को बुना है ।

हमारे सभी पर्व और संस्कृति से अविछिन्न रुप से जुडा हुआ है धोती । धोती पहने बिना कोइ भी पूजा या त्यौहार शुद्ध नहीं माना जाता । मधेशी ही नहीं पहाडी समुदाय के लोग भी पूजापाठ और पर्व मे धोती ही पहनते हैं । तो फिर कैसे मधेश के अधिकांश धोती पहनने वाले मधेशी बिहारी और भारतीय हुए ? जर्मनी के तानाशाह हिटलर के झण्डे में हिन्दुओं का पवित्र स्वस्तिक चिन्ह अंकित था । तो क्या हिटलर को हिन्दु ( भारतीय या नेपाली ) मान लिया जाए ?

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नेपाल और भारत दोनो देशों मे समान संस्कृति और धर्म के कारण धोती वस्त्र का प्रयोग किया जाता है । इसका मतलब सभी धोती पहनने वाले भारतीय हो गए क्या ? सारे काले वर्ण के धोती पहनने वाले यदि बिहारी या भारतीय हैं तो भारत के शिमला, कुमाउं, गढवाल, सिक्किम, दार्जिलिग और काशमीर के गोरे, चिट्टे लोग नेपाली होने चाहिए थे ? जैसे वह नेपाली नहीं है, उसी तरह यह भी बिहारी नहीं हैं ।

नेपाल के पहाडी जिलो और राजधानी काठमाण्डुं मे सालो पहले काशमीर से भाग कर आए हुए मुसलमान वसोवास करते हैं । पुश्त दर पुश्त यहाँ रहते हुए यह मुस्लिम समुदाय जैसे यहां के हो कर रह गया उसी तरह मधेशी भी है । क्यों कोइ कभी यहां रहने वाले मुस्लिमों को यहां से खदेड़ने की बात नहीं करता पर मधेशीयों के राष्ट्रियता के उपर हमेशा से सवालिया निशान दागे जाते हैं । जैसे मुस्लिम यहां के वासिन्दा हैं उसी तरह मधेशी भी इस देश के रक्त मे भीगे हुए यहां के वासी हैं ।

हमलोगों की एक कमजोरी है । वह यह है कि हमलोग हमेशा इतिहास मे हीं खोए रहना चाहते है । हमें अपने से ज्यादा दूसरों के इतिहास और भूगोल में हद से ज्यादा रुचि है । और यह रुचि कभी कभार हस्तक्षेप जैसा बन जाता है । २५ सौ साल से भी पहले पैदा हुए गौतम बुद्ध के राष्ट्रियता और नागरिकता पर हमलोग घण्टाें बहस करते हैं । जब कि उस समय देश और सीमाहीन थे । उस समय आज की तरह राष्ट्र और राज्य का सीमाकंन नहीं हुआ था । चलते चलते बुद्ध लुम्बिनी से वोध गया पहुंच गए । उन्हें वह जगह तपस्या के लिए ठीक लगी और वहीं बैठ गए ।

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dhotiसालो साल बाद आज के समय में आष्ट्रिया में पैदा हुआ हिटलर अपनी बुद्धि और चतुराइ के कारण जर्मनी का तानाशाह बन कर सालों राज किया । किसी ने हिटलर की राष्ट्रियता और नागरिकता पर उंगली नहीं उठाई । और अफ्रिकी राष्ट्र केन्या के मूल निवासी वाराक ओबामा अमरिका जैसे विश्व के सब से शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति बनते हैं । कोइ इन की राष्ट्रियता और नागरिकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाता है । क्योंकि वे शिक्षित और दिमाग से समृद्ध है इसलिए ।

क्या पहाड़ में रहने वाले और टोपी पहनने वाले सभी पहाड़ी जन मन से नेपाली है ? क्या नेपाल में पैदा होते ही और वंशज के कारण से नागरिकता मिलते ही वे नेपाली हो गए ? तो फिर नेपाल की सत्ता में हमेशा पहाड़ियों का ही हुकुमत रहा है, तो फिर देश क्यों नहीं बन रहा । क्यों इतना भ्रष्टाचार और दण्डविहीनता है इस देश में ? इन पहाड़ियों के मन में क्यों देश के प्रति कोई चिन्ता या मोह नहीं है । क्यों यह टोपीधारी जीव सिहंदरवार की सत्ता को अजगर की तरह अपने में लपेटे हुए हैं ।

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यह मधेशवासी अपनी मेहनत की कमाई खाते हैं। क्यों काठमाण्डु की सड़क और गली में सब्जी बेचने वाले और जूता सिलने वाले किसी मधेशी को हिकारत से देखते हैं और धोती और बिहारी सम्बोधन करते हैं ? क्या वे इन्सान नहीं हैं । क्या उन के दिल पर चोट नहीं लगता होगा ? मधेश या तराई तो अन्न का भण्डार है । यहां के खेतखलिहान में प्रकृति अपनी ही आंचल बिखरा कर मुस्कुरा रही हैं । मधेश अन्न उत्पादन करना छोड़ दे या कह दे हम पहाड़ियाें को अपना उपजाया हुआ अन्न नहीं खिलाएगें । तब पहाड़ी क्या करेंगे ? कभी सोचा है ?

मधेश प्रकृति का शरीर है तो पहाड़ उसका मस्तक और हिमाल उस मस्तक में जड़ा हुआ मुकुट । बिना शरीर के क्या कोई मस्तक या सर कभी खड़ा रह सकता है कभी ? धोती नेपाल का वस्त्र और आबरु है तो टोपी उसका मान । यदि दोनों ही आपस में उलझे और झगड़ा करने लगे तो देश का सम्मान कितने दिन कायम रहेगा ? जिस देश मे शान्ति ही नहीं रहेगी उस देश मे समृद्धि और सुमति कहां से आएगी ? धोती और टोपी दोनों इस देश की धरोहर और आवश्यकता है ।

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