देवानगंज से उठी चेतावनी: संवाद या ध्रुवीकरण ? : सन्तोष मेहता
संतोष मेहता, काठमांडू, 30 जुलाई। किसी भी राष्ट्र का वास्तविक संकट तब शुरू नहीं होता जब उसकी सड़कों पर हिंसा होती है, बल्कि तब शुरू होता है जब समाज संवाद की क्षमता खोने लगता है। नेपाल के सुनसरी जिले के देवानगंज की हालिया घटना इसी गहरे संकट की चेतावनी है। यह केवल हिन्दू–मुस्लिम टकराव नहीं, बल्कि नेपाल की सह-अस्तित्व की सभ्यता के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है। वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि देवानगंज में झड़प क्यों हुई; बल्कि यह है कि सदियों तक एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी रहने वाले पड़ोसी आज धर्म और पहचान के नाम पर आमने-सामने क्यों खड़े हो रहे हैं?
मधेश: सह-अस्तित्व की जीवित सभ्यता
यदि मधेश के इतिहास पर दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होता है कि उसकी पहचान किसी एक धर्म, जाति या भाषा ने नहीं बनाई। मधेश सदियों से सह-अस्तित्व, साझी संस्कृति और पारस्परिक सहयोग की भूमि रहा है। यहाँ हिन्दू, मुस्लिम, थारू, दलित, आदिवासी, जनजाति और पहाड़ से आए समुदायों ने मिलकर एक ऐसी सामाजिक संस्कृति विकसित की, जहाँ धर्म से पहले पड़ोसी का रिश्ता महत्वपूर्ण था।
छठ पर्व पर मुस्लिम समुदाय घाट निर्माण में सहयोग देता रहा, दशहरा के अवसर पर हिन्दू परिवार अपने मुस्लिम पड़ोसियों को शुभकामनाएँ देते रहे, ईद पर हिन्दू परिवार सहभागी बनते रहे। विवाह, शोक, बाढ़, बीमारी अथवा अन्य संकटों में लोगों ने पहले इंसान और पड़ोसी बनकर साथ दिया, बाद में अपने-अपने धार्मिक परिचय को महत्व दिया। यही साझा जीवन-पद्धति मधेश की वास्तविक पहचान थी।
विडंबना यह है कि जिस सामाजिक आधार ने साझा पहचान का निर्माण किया था, वही आधार आज धीरे-धीरे धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर धकेला जा रहा है। यदि इस परिवर्तन को गंभीरता से नहीं समझा गया, तो देवानगंज जैसी घटनाएँ भविष्य में और भी व्यापक रूप ले सकती हैं।
सांप्रदायिकता और संवाद, समन्वय
इतिहास गवाह है कि सांप्रदायिक दंगे कभी भी केवल किसी छोटी घटना से उत्पन्न नहीं होते। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट, किसी व्यक्ति का विवाद, अफवाह या उकसाने वाला भाषण केवल चिंगारी का कार्य करता है। यदि समाज के भीतर पहले से अविश्वास, भय और विभाजन का बारूद जमा न हो, तो ऐसी चिंगारी कभी भी व्यापक हिंसा का रूप नहीं ले सकती।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो विश्व के अनेक देशों में सत्ता-केंद्रित राजनीति ने सामाजिक एकता को कमजोर करने के लिए पहचान की राजनीति का सहारा लिया है। औपनिवेशिक शासन की प्रसिद्ध नीति “फूट डालो और राज करो” केवल ब्रिटिश साम्राज्य तक सीमित नहीं रही; आधुनिक लोकतंत्रों में भी अनेक बार सत्ता प्राप्ति के लिए धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक विभाजनों का उपयोग किया गया है। जब नागरिक अपने साझा अधिकारों के लिए संगठित होने लगते हैं, तब उन्हें धर्म या जाति के आधार पर बाँटना सत्ता के लिए अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। भय और असुरक्षा की राजनीति समाज को वास्तविक मुद्दों से हटाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर ले जाती है।
देवानगंज कोई अकेली घटना नहीं है। आज विश्व के अनेक देशों में पहचान की राजनीति लोकतांत्रिक संवाद पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है।
भारत में समय-समय पर धार्मिक तनावों ने सामाजिक समरसता को चुनौती दी है। फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और इटली जैसे देशों में पहचान, धर्म और राष्ट्रवाद को लेकर बहस लगातार तीखी होती जा रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी राजनीतिक ध्रुवीकरण इस स्तर तक पहुँच चुका है कि वैचारिक मतभेद सामाजिक संबंधों को प्रभावित करने लगे हैं। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म लोगों को प्रायः उन्हीं विचारों के बीच सीमित कर देते हैं, जिनसे उनकी पूर्वधारणाएँ और मजबूत होती हैं। परिणामस्वरूप संवाद कम और टकराव अधिक होता है।
दक्षिण एशिया में श्रीलंका, म्यांमार और पाकिस्तान जैसे देशों ने भी धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण की भारी सामाजिक कीमत चुकाई है। इन अनुभवों से स्पष्ट होता है कि जब समाज संवाद छोड़ता है, तब लोकतंत्र कमजोर और सामाजिक विश्वास खंडित होने लगता है। इसी कारण देवानगंज की घटना को केवल नेपाल का स्थानीय विवाद मानना उचित नहीं होगा। यह उस वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें समाज धीरे-धीरे संवाद की संस्कृति से हटकर ध्रुवीकरण की राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं।
पूर्वीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने सत्य को कभी किसी एक ग्रंथ, एक पैगम्बर, एक दार्शनिक या एक विचारधारा तक सीमित नहीं किया। यहाँ सत्य को एक निरंतर खोज, अनुभव, संवाद और आत्मचिंतन की प्रक्रिया माना गया है।
ऋग्वेद का प्रसिद्ध वाक्य “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” इस बात की उद्घोषणा करता है कि सत्य एक हो सकता है, परंतु उसकी अभिव्यक्तियाँ अनेक हो सकती हैं। उपनिषद प्रश्न और प्रतिप्रश्न की परंपरा पर विकसित हुए। गौतम बुद्ध ने अंधविश्वास के स्थान पर विवेक और परीक्षण को महत्व दिया। भगवान महावीर के अनेकांतवाद ने बताया कि कोई भी दृष्टिकोण सम्पूर्ण सत्य का अकेला प्रतिनिधि नहीं हो सकता। किरात मुन्धुम ने मनुष्य, प्रकृति और आध्यात्मिक जगत को परस्पर जुड़े हुए जीवन-तंत्र के रूप में देखा। सूफी परंपरा ने प्रेम, करुणा और आत्मिक संवाद को धर्म का आधार बनाया, जबकि भक्ति आंदोलन ने जाति, भाषा और संप्रदाय की दीवारों से ऊपर उठकर मानवता को सर्वोच्च मूल्य माना। पूर्वीय सभ्यता की शक्ति कभी एकरूपता नहीं रही; उसकी वास्तविक शक्ति विविधता में निहित एकता रही है।
धर्म नहीं, कट्टर निरपेक्षता समस्या है: आवश्यकता संवादात्मक सापेक्षतावाद की
आज विश्व दो अतियों के बीच झूल रहा है। एक ओर धार्मिक, वैचारिक और सांस्कृतिक कट्टरता है, जो स्वयं को ही अंतिम सत्य घोषित करती है; दूसरी ओर ऐसा चरम सापेक्षतावाद है, जो सभी मूल्यों और नैतिक मानकों को अर्थहीन मान लेता है। पहला संवाद को समाप्त करता है, जबकि दूसरा साझा नैतिक आधार को कमजोर करता है।
इन दोनों अतियों के बीच एक तीसरे मार्ग की आवश्यकता है, जिसे “संवादात्मक सापेक्षतावाद” कहा जा सकता है।
इस दृष्टिकोण का मूल सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति, धर्म, समुदाय या विचारधारा सम्पूर्ण सत्य पर एकाधिकार नहीं रखती। प्रत्येक दृष्टिकोण में कुछ सत्य, कुछ सीमाएँ और कुछ अपूर्णताएँ होती हैं। इसलिए सत्य किसी बंद तिजोरी में रखा हुआ स्थिर तत्व नहीं, बल्कि संवाद, अनुभव, आत्मालोचना और सहयोग से विकसित होने वाली एक जीवंत प्रक्रिया है। यह दर्शन विविधता को संकट नहीं, बल्कि ज्ञान का स्रोत मानता है। इसका उद्देश्य सबको एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि अलग-अलग रहते हुए भी साझा भविष्य का निर्माण करना है।
सांप्रदायिक हिंसा का कारण स्वयं धर्म नहीं होता। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कोई भी धार्मिक या वैचारिक समूह स्वयं को ही अंतिम सत्य का एकमात्र प्रतिनिधि घोषित कर देता है। जब संवाद समाप्त होता है, तब संदेह जन्म लेता है; संदेह से भय पैदा होता है; भय से घृणा उत्पन्न होती है और अंततः घृणा हिंसा में बदल जाती है।
इसीलिए किसी भी धर्म की सफलता उसके अनुयायियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि उसने समाज में कितना विश्वास, संवाद और सह-अस्तित्व स्थापित किया। इतिहास बताता है कि जो समाज स्थानीय संस्कृति के साथ संवाद स्थापित करते हैं, वे अधिक स्थिर और शांतिपूर्ण रहते हैं।
इंडोनेशिया इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला यह देश इस्लाम को स्थानीय जावानी, बाली और अन्य सांस्कृतिक परंपराओं के साथ जोड़कर विकसित करता रहा है। वहाँ की राष्ट्रीय विचारधारा “पंचशील” धार्मिक विविधता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।
मलेशिया में भी स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन बनाए रखने की निरंतर कोशिश की गई है।
भारत में सूफी परंपरा ने इस्लाम को स्थानीय लोक-संस्कृति, संगीत और आध्यात्मिक परंपराओं से जोड़कर सामाजिक सद्भाव को मजबूत किया। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन औलिया और शाह जलाल जैसे सूफी संतों ने प्रेम और करुणा को धर्म का सबसे बड़ा संदेश बताया।
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद समाप्त होने के बाद बदले की राजनीति के बजाय “सत्य एवं मेल-मिलाप आयोग” का गठन किया गया। इस आयोग ने यह स्वीकार किया कि स्थायी शांति केवल दंड से नहीं, बल्कि सत्य, स्वीकारोक्ति और संवाद से स्थापित होती है। इसी प्रकार 1994 के भीषण नरसंहार के बाद रवांडा ने प्रतिशोध के बजाय राष्ट्रीय पुनर्मिलन की प्रक्रिया अपनाई। स्थानीय न्याय व्यवस्था, सामुदायिक संवाद और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के माध्यम से वहाँ सामाजिक विश्वास को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया।
ये उदाहरण बताते हैं कि समाज केवल सुरक्षा बलों या कठोर कानूनों से नहीं जुड़ते; वे न्याय, संवाद और पारस्परिक विश्वास से पुनर्निर्मित होते हैं।
नेपाल के मुस्लिम समुदाय की पहचान केवल धार्मिक नहीं है। वे इसी मिट्टी की भाषा बोलते हैं, इसी भूमि पर खेती करते हैं, इसी समाज के साथ सुख-दुःख बाँटते हैं। उसी प्रकार नेपाल का हिन्दू समाज भी केवल एक धार्मिक इकाई नहीं, बल्कि अनेक स्थानीय परंपराओं, जनजातीय संस्कृतियों, लोकदेवताओं और क्षेत्रीय आस्थाओं का विशाल सांस्कृतिक परिवार है।
यदि मुस्लिम समाज अपनी स्वदेशी सांस्कृतिक जड़ों से कटता है, तो वह अपनी ऐतिहासिक लचीलापन खो देता है। यदि हिन्दू समाज अपनी बहुलतावादी परंपरा को भूलकर एकरूपता की ओर बढ़ता है, तो वह भी अपनी सबसे बड़ी शक्ति खो देता है।
दोनों समुदायों का भविष्य एक-दूसरे को पराजित करने में नहीं, बल्कि अपनी साझा सभ्यता को पुनर्जीवित करने में है।
ग्राम स्वराज और सामुदायिक शासन की प्रासंगिकता
नेपाल की दीर्घकालीन सामाजिक शांति केवल कानून, पुलिस और न्यायालयों के भरोसे स्थापित नहीं हो सकती। समाज को जीवित रखने का कार्य स्थानीय समुदाय, सामाजिक उत्तरदायित्व और निरंतर संवाद करते हैं।
थारू समुदाय की भलमंसा प्रणाली, मधेश की पारंपरिक सामुदायिक पंचायतें, नेवार समुदाय की गुठी व्यवस्था, किरात समुदाय की सामूहिक निर्णय प्रणाली तथा हिमालयी क्षेत्रों की ग्राम सभाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि नेपाल की सभ्यता में संवाद आधारित सामाजिक शासन की समृद्ध परंपरा रही है।
इन संस्थाओं की विशेषता यह थी कि वे दंड से पहले संवाद, अधिकार से पहले उत्तरदायित्व और मुकदमे से पहले मेल-मिलाप को महत्व देती थीं। आधुनिक लोकतंत्र इन परंपराओं का स्थान नहीं ले सकता; बल्कि इन्हें संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप पुनर्जीवित कर सकता है।
देवानगंज की घटना नेपाल के सामने दो रास्ते खोलती है। पहला रास्ता यह है कि इसे सामान्य सांप्रदायिक झड़प मानकर कुछ दिनों की चर्चा के बाद भुला दिया जाए। यदि ऐसा हुआ, तो भविष्य में ऐसी घटनाएँ और अधिक गंभीर रूप में सामने आ सकती हैं।
दूसरा रास्ता यह है कि इसे राष्ट्रीय आत्ममंथन का अवसर बनाया जाए। यह पूछा जाए कि समाज में विश्वास क्यों घट रहा है? युवा घृणा की राजनीति की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं? सोशल मीडिया संवाद का माध्यम बनने के बजाय विभाजन का उपकरण क्यों बनता जा रहा है? और हम अपनी साझा सभ्यता की रक्षा कैसे कर सकते हैं?
यदि नेपाल इन प्रश्नों का ईमानदारी से उत्तर खोजता है, तो देवानगंज केवल एक दुखद घटना नहीं रहेगा; वह राष्ट्रीय पुनर्जागरण का प्रारंभ भी बन सकता है।
आज नेपाल को केवल नई सरकार, नया गठबंधन या नया कानून पर्याप्त नहीं होगा। उसे एक नए सामाजिक अनुबंध की आवश्यकता है, जिसका आधार धर्म नहीं, नागरिकता हो; पहचान नहीं, सम्मान हो; प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग हो; और संघर्ष नहीं, संवाद हो।
देवानगंज नेपाल के लिए केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक विकल्प भी है। यदि हम संवाद चुनते हैं तो यह घटना राष्ट्रीय पुनर्जागरण का प्रारंभ बन सकती है; यदि ध्रुवीकरण चुनते हैं तो यह भविष्य के गहरे सामाजिक संकटों की भूमिका भी सिद्ध हो सकती है।

नेता लोसपा


