Tue. Oct 27th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

मधेश में भाषा चर्चा, थोपी गई भाषा सम्मान नहीं विवाद को जन्म देती है : सुदर्शनलाल कर्ण

 
सुदर्शन लाल कर्ण
भाषा कार्यकर्ता

सुदर्शन लाल कर्ण, जनकपुरधाम, 30 जुलाई। भाषा हमारी पहचान है, लेकिन किसी पर थोपी गई भाषा कभी सम्मान नहीं, बल्कि विवाद को जन्म देती है।

जनकपुर के विद्यालयों में मैथिली भाषा को अनिवार्य करने की चर्चा हो रही है। यदि कोई विद्यालय, अभिभावक या विद्यार्थी अपनी इच्छा से मैथिली पढ़ना या पढ़ाना चाहते हैं, तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन किसी भाषा को सरकारी आदेश से सब पर लागू करना न लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप है और न ही मधेश की भाषाई वास्तविकता के।

यह भी पढें   चितवन में तीन महीने में 3,062 लोगों को वंशज के आधार पर मिली नागरिकता

यदि यह वास्तव में प्रदेश सरकार का निर्णय है, तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि यह व्यवस्था केवल सरकारी विद्यालयों तक सीमित रहेगी या निजी विद्यालयों पर भी लागू होगी। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मगही, बज्जिका, भोजपुरी, उर्दु, थारू, हिन्दी और मधेश की अन्य मातृभाषाओं का स्थान क्या होगा? क्या उनकी उपेक्षा कर केवल एक भाषा को प्राथमिकता देना न्यायसंगत होगा?

यदि मैथिली पूरे मधेश प्रदेश की प्रादेशिक भाषा होगी, तो क्या यही नीति सप्तरी से पर्सा तक समान रूप से लागू होगी? जहाँ भोजपुरी भाषी बहुसंख्यक हैं, वहाँ उनकी भाषाई पहचान और अधिकारों की रक्षा कैसे होगी? इन प्रश्नों का उत्तर प्रदेश सरकार को देना ही होगा।

यह भी पढें   एनपीएल के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री बालेन का ‘फ्लाइंग किस’, तस्वीरें चर्चा

सच्चाई यह है कि मधेश की शक्ति उसकी भाषाई विविधता में है, किसी एक भाषा के वर्चस्व में नहीं। भाषा प्रेम से फलती-फूलती है, आदेश से नहीं। जिस भाषा को सम्मान चाहिए, उसे पहले लोगों के दिलों में स्थान बनाना होगा, कानून की धाराओं में नहीं।

आज आवश्यकता किसी एक भाषा को विजेता और दूसरी को पराजित घोषित करने की नहीं, बल्कि ऐसी समावेशी भाषा नीति की है जिसमें मैथिली, भोजपुरी, मगही, बज्जिका, थारू, हिन्दी, उर्दु तथा मधेश की सभी मातृभाषाओं को समान सम्मान और समान अवसर मिले।

यह भी पढें   नेपाल में भारत-विरोधी राष्ट्रवाद की सतही समझ: इतिहास, पहचान और राजनीति के अनसुलझे सवाल

भाषाएँ प्रतिस्पर्धी नहीं, एक ही सांस्कृतिक परिवार की बहनें हैं। यदि हम एक भाषा के सम्मान के नाम पर दूसरी भाषा का अधिकार छीनेंगे, तो अंततः हार किसी एक भाषा की नहीं, पूरे मधेश की होगी।

सुदर्शन लाल कर्ण
भाषा संवर्धक

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com