एक मासूम का सवाल (लघुकथा) : विनोदकुमार विमल

विनोदकुमार विमल,अगस्त 24, काठमांडू । दोपहर के 4:30 बजे थे । दलित समुदाय की 12 साल की लड़की रेणुका, गाँव से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित अपने स्कूल से अकेले घर लौट रही थी । भारी बारिश के कारण रास्ता सुनसान और अंधेरा था । यह रास्ता बाँस के झुरमुट और आम के बाग से होकर गुज़रता था । डर कर उसने बाँस के झुरमुट में शरण ली । रेणुका रात 9:00 बजे तक घर नहीं लौटी; नतीजतन, उसके परिवार, रिश्तेदारों और गाँव वालों – पुरुषों, महिलाओं और युवाओं ने उसे खोजना शुरू कर दिया ।
अगली सुबह, बांस के झुरमुट में उसकी बेजान और बिना कपड़ों वाली लाश मिली । आम के पेड़ के नीचे उसकी शर्ट, पतलून, जूते और स्कूल बैग बिखरे पड़े थे । गांव के एक सम्मानित व्यक्ति के बेटे ने उस मासूम और नाज़ुक लड़की के साथ बलात्कार किया और फिर अपने अपराध को छिपाने के लिए उसकी हत्या कर दी । उसके परिवार और रिश्तेदारों के रोने-बिलखने की आवाज़ें गूंज उठीं । गांव वाले जमा हो गए और सभी ने अपराधी के लिए सख़्त सज़ा और न्याय की मांग की । कुछ दिनों तक विरोध-प्रदर्शन और कैंडल मार्च हुए, और यह घटना मीडिया की सुर्खियों में भी छाई रही ।
लेकिन कुछ दिनों बाद सब कुछ शांत हो गया; अपराधी की पहचान नहीं हो पाई । परिवार, रिश्तेदार और समाज अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लौट आए ।
जिस बेडरूम में रेणुका सोती थी, वहाँ दीवार पर टंगी उसकी तस्वीर खामोशी से इस समाज से बस एक ही सवाल पूछती रही: “मेरा गुनाह क्या था ? क्या इस देश में एक मासूम लड़की का सुरक्षित रहना कोई अपराध है ? ऐसी क्रूरता कब तक चलती रहेगी ?”
इस घटना ने न केवल एक मासूम लड़की की जान ले ली, बल्कि समाज की सुरक्षा और जागरूकता के प्रति हमारी संवेदनशीलता को भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया ।


