सत्य के साथ खड़े व कहने का साहस ही अच्छे समाज व इंसान की पहचान है : बिमल सरार्फ
बिमल सरार्फ, रक्सौल, 24 अगस्त 2026 । आज का समय हमसे केवल चुप रहने की नहीं, बल्कि सही के साथ खड़े होने की मांग करता है। समाज तभी मजबूत और स्वस्थ बन सकता है, जब हम सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखें।
आज कई बार लोग गलत को गलत कहने से इसलिए बचते हैं, क्योंकि उन्हें किसी के नाराज होने का डर रहता है। कभी रिश्तों का दबाव होता है, कभी स्वार्थ बीच में आ जाता है और कभी समाज क्या कहेगा, इसकी चिंता हमें सच बोलने से रोक देती है। लेकिन जब हम गलत देखकर भी चुप रहते हैं, तो कहीं न कहीं उस गलत को बढ़ावा देने में हमारी भी भूमिका बन जाती है।
सही बात कहना हमेशा आसान नहीं होता। कई बार सच बोलने वाले व्यक्ति को विरोध, आलोचना और अकेलेपन का सामना करना पड़ता है। फिर भी हमें यह समझना होगा कि सच का साथ देना ही चरित्र की असली पहचान है। जो व्यक्ति परिस्थिति और लाभ के अनुसार अपना पक्ष बदलता रहता है, वह शायद कुछ समय के लिए सफल दिखाई दे, लेकिन लंबे समय में उसका विश्वास और सम्मान कम हो जाता है।
एक अच्छे समाज की नींव केवल कानून से नहीं, बल्कि लोगों की सोच और चरित्र से बनती है। यदि माता-पिता बच्चों को सत्य, ईमानदारी और न्याय का महत्व सिखाएं, शिक्षक सही मूल्यों का मार्ग दिखाएं और समाज के लोग गलत के सामने चुप न रहें, तो निश्चित रूप से एक बेहतर समाज का निर्माण हो सकता है।
हमें यह भी समझना होगा कि गलत का विरोध करना किसी व्यक्ति का विरोध करना नहीं है। गलत विचार, गलत व्यवहार और गलत कार्य का विरोध करना ही सच्चे अर्थों में समाज के प्रति जिम्मेदारी है। व्यक्ति से घृणा नहीं, लेकिन गलत कार्य के प्रति स्पष्ट असहमति जरूर होनी चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर इतना साहस पैदा करें कि जहां सही हो वहां मजबूती से खड़े हों और जहां गलत हो वहां बिना डर के अपनी बात रखें। हमारी चुप्पी किसी गलत व्यक्ति का हौसला न बने और हमारी आवाज किसी निर्दोष के लिए परेशानी का कारण न बने।
अगर समाज में हर व्यक्ति अपने स्तर पर सच, न्याय और ईमानदारी का साथ देने लगे, तो बदलाव निश्चित है। क्योंकि समाज किसी एक व्यक्ति से नहीं बनता, बल्कि हम सबकी सोच, व्यवहार और जिम्मेदारी से बनता है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि सही को सही और गलत को गलत कहने की आदत ही अच्छे इंसान और स्वस्थ समाज की पहचान है। यदि हमने सत्य और न्याय के प्रति अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी, तो केवल व्यक्ति ही नहीं, पूरा समाज नैतिक रूप से कमजोर होता चला जाएगा।
इसलिए आज समय की सबसे बड़ी जरूरत यही है—
डरकर चुप न रहें, स्वार्थ में न झुकें और परिस्थिति देखकर सच न बदलें।
जहां सही हो, वहां साथ दें और जहां गलत हो, वहां आवाज उठाएं।
क्योंकि मजबूत समाज की शुरुआत एक जागरूक और साहसी इंसान से होती है।

