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लालु के बड़बोलेपन का महत्व भारत में वही है जो ओली का नेपाल में है : श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति, काठमांडू,१ दिसम्बर ०१५ \

नेपाल की नीति समझ में नहीं आती है खासकर एक समुदाय विशेष की जो खुलकर न तो भारत का विरोध ही कर पा रहे हैं और ना ही उसे अस्वीकार कर पा रहे हैं । भारत के प्रधानमंत्री की आलोचना और बिहार के सबसे बड़े भ्रष्टाचारी, मखौली भाषा का प्रयोग करने वाले और अपने अनपढ़ बेटे को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाने वाले की तारीफ । और करेंगे भी क्यों नहीं क्योंकि ऐसे नेताओं की एक पूरी जमात यहाँ भी तैनात है ।

 

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खैर यहाँ सवाल लालु के बड़बोलेपन की है । क्योंकि दो तीन दिन पहले की ही बात है जब उनकी ही पार्टी ने खुलकर कहा कि राजद मधेश आन्दोलन का समर्थन करेगा । अगर भारतीय प्रधानमंत्री पर लालू यह आरोप लगा रहे हैं कि मोदी ने नेपाल से ‘रोटी और बेटी’ के सम्बन्ध को बिगाड़ा है, तो उनकी पार्टी जो खुलेआम मधेश आन्दोलन के समर्थन की घोषणा कर रही है, वह क्या है ? उन्हें यह समझना होगा कि इससे नेपाल के साथ उनके सम्बन्ध सुधरने वाले नहीं हैं क्योंकि इस घोषणा से दूसरा पक्ष नाराज ही होगा । अंततः बात तो वही हुई कि लालू भी वही करने की सोच रहे हैं जो भारतीय सरकार कर रही है यानि मधेश को अधिकार दिलाने की बात संविधान में सुनिश्चित करना । फिर वो पहाड़ के चहेते कैसे हो गए ? पर लालु की बोली का महत्व भारत में भी वही है जो ओली की बोली का महत्व नेपाल में है । मसखरेपन से लोगों का मनोरंजन तो हो सकता है परन्तु पेट की भूख शांत नहीं हो सकती और न ही किसी विकट समस्या का समाधान । भारतीय राग को अलापने से अधिक अगर जनता की ओर सरकार ध्यान दे तो बेहतर होगा । नेपाल सरकार नेपाली जनता के लिए क्या कर रही है इस ओर यहाँ की मीडिया का ध्यान न होकर भारत में भारतीय प्रधानमंत्री के खिलाफ कौन कौन क्या बोल रहा है उस ओर ज्यादा है । काश इन बातों से या भारतीय चैनलों के बन्द करने से हमारी समस्याओं का समाधान हो जाता तो हमेशा के लिए यह कार्यवाही की जानी चाहिए न कि कुछ समय के लिए । किन्तु आलम तो यह है कि यह महज खोखली धमकी है जिसका कोई दूरगामी प्रभाव पड़ने वाला नहीं है ।kp oli -1

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कल की वार्ता भी अनिश्चितता के साए में समाप्त हो गई । कोई तत्परता नहीं, कोई बैचेनी नहीं, महज बात को टालने की साजिश और इसी बीच बार–बार मधेश में सेना परिचालन की भीतरी कोशिश । फिलहाल सेना की ओर से इनकार किया जा रहा है यह एक अच्छी सोच । क्योंकि हिटलरशाही कुछ समय के लिए ही अपना असर छोड़ती है अंत उसका भी होता है और एक नई शुरुआत भी होती है । कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर उपनिवेशवाद के खिलाफ राष्ट्रीय आन्दोलन के समर्थक थे । परन्तु वे कट्टर राष्ट्रवाद के खिलाफ थे । उनका मानना था कि देशभक्ति सही है पर कट्टर राष्ट्रवाद से ही हिंसा का जन्म होता है और यही साम्राज्यवाद की भावना को बलवती करता है । इटहरी की घटना एक सुनियोजित तरीके से सामने आई और बहुत अधिक सम्भावना थी कि इससे जातीय हिंसा फैलती । किन्तु सराहना के पात्र हैं मधेश की समस्त जनता, जिन्होंने अपने धैर्य को बनाए रखा है । एक दूसरी आग फैलाकर सत्ताधारी पक्ष जनता के दिमाग को मोड़ना चाह रही है । राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाकर जातीय सद्भाव को बिगाड़ा जा रहा है । कुछ अराजक तत्व का सहारा लेकर राजनीति करना एक पुरानी चाल है जिसका सहारा हमेशा से शासक वर्ग लेते आए हैं । उनकी इस चाल से आम जनता को सतर्क रहना होगा । समस्या राजनैतिक है, इसे इसी रूप में सुलझाना होगा ना कि दंगा करवा कर । मधेश की बातों को दरकिनार करते हुए सरकार सिर्फ और सिर्फ नाकाबन्दी पर सीमित होकर रह गई है । जनता को कभी चीन का आश्वासन तो कभी बंगलादेश और पाकिस्तान के आश्वासन में उलझाकर रखा हुआ है । किन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात । न तो किनारा नजर आ रहा है और न ही तैरने का सहारा बस भँवर में कश्ती हिचकोले खा रही है ।

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