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शर्म की बात है, नेपाल की युवा जनशक्ति देश की राजनीति से पूरी तरह से कटी हुई है

 

गंगेश मिश्र, कपिलबस्तु , ७ जनवरी |

” श्रद्धान्जली….अछैबर दादा परलोक सिधार गए। ”
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गाँव की परधानी का सपना लिए, अछैबर दादा परलोक सिधार गए, मोलहू काका तब
जवान थे; अब बुढ़ा गए।
धनपाती बूआ की कमर झुक गई, लाठी लेकर चलती हैं।
” कबले यी परधानी होई “, हमसे पूछा करती हैं।
परधानी की ललसा में, कुछ दुनियाँ छोड़ गए, कुछ जवान से बूढ़े हो गए और जो
उस वक्त पैदा हुए; वो परधानी के लायक हो गए। उन्नीस साल होने को है, कब होगा; स्थानीय निकाय निर्वाचन ??
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★स्थानीय विकास मन्त्रालय, अपनी उन्नीसवीं बरसी मना रहा है।
★अपने ही जनता को बेवकूफ समझ कर, चिढ़ा रहा है।
★जिला विकास अधिकारी, विकास के पैसों से गुलछर्रे उड़ा रहा है।
★अदना सा गाँव विकास का कर्मचारी, अपने बच्चों को विदेश में पढ़ा रह है।
★स्थानीय नेता निर्माण फैक्टरी, स्थानीय निकाय; अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहा है।
अंधेर नगरी चौपट राजा। देश की माली हालत बद से बदतर होती जा रही है, विकास कार्य ठप पड़ा है; सब कमाने के चक्कर में पड़े हैं। स्थानीय विकास कार्य  का सारा बजट नौकरशाहों के हाथो में है;  देश को आजकल वही चला रहे हैं। स्थानीय निकाय चुनाव हुए अट्ठारह वर्ष हो चले हैं, गाँव विकास का कार्य सचिव देख रहा है।  राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों के बीच, आए दिन खीचा-तानी होती रहती है; जिसका पूरा लाभ वही उठा रहा है। दो वर्ष पहले राजनैतिक दलों के बीच  ग्यारह बूँदों पर सहमति बनी थी,
जिसमें स्थानीय निकाय निर्वाचन पर भी जोड़ दिया गया था। ढाक के तीन पात, स्थिति नहीं बन पाई निर्वाचन की। नेपाल के प्रायः सभी नेता ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं, पर स्थानीय नेता बनाने वाली फैक्टरी बन्द पड़ी है। कबतक बूढ़े बैलों से खेती होती रहेगी, युवा शक्ति का राजनीति में सर्वथा अभाव हो गया है। जिनके हाथों में देश का भविष्य था, आज वही युवा चंद पैसों के लिए;  सचिव के पीछे-पीछे भागते नज़र आते हैं। शर्म की बात है, नेपाल की युवा जनशक्ति देश की राजनीति से पूरी तरह से कटी हुई है।किसी भी देश के लिए युवाओं का पलायन, सबसे घातक होता है; नेपाल ही एक ऐसा देश है, जहाँ के  युवा अपने भविष्य को विदेशोंमें तलाश रहे हैं।
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