ये वही संविधान है, जिसने मसौदे से लेकर सुझाव संकलन और पारित होने तक मधेशियों का रक्तपान किया और जिसे विश्व का उत्कृष्ट संविधान का तमगा भी दिया गया ।
डा. श्वेता दीप्ति :रक्ताम्भ संविधान अपने सौ दिनों के पूरे होने से पहले ही संशोधन की चर्चा में आ गया था । ये वही संविधान है, जिसने मसौदे से लेकर सुझाव संकलन और पारित होने तक मधेशियों का रक्तपान किया और जिसे विश्व का उत्कृष्ट संविधान का तमगा भी दिया गया । विश्व पटल पर कुछ ने स्वागत किया तो कुछ ने नाराजगी जताई और कुछ खामोश रह गए । आज जब संशोधन की औपचारिकता का निर्वाह भी सत्तापक्ष ने किया तो उसमें वह समुदाय गायब था जिसे संविधान को अपना मानने से भी एतराज है । फिर इस नाटक का अर्थ क्या रह जाता है ? क्या सिर्फ नाटक से ही देश को चलाने की नीति सरकार ने तय की हुई है ? कभी मसौदे का नाटक, कभी सुझाव संकलन का नाटक, कभी वार्ता का नाटक, तो अब ताजातरीन संशोधन का नाटक । जनता मूक दर्शक बन कर तमाशा देख रही है आखिर बलि का बकरा उसे ही तो बनना है, हर हाल में । एक ओर राष्ट्रवाद का खोखला नारा देकर जनता को तामाशाई बना
दियागया है दूसरी ओर दिखावे के लिए वो प्रयास किए जा रहे हैं कि पड़ोसी खुश हो जाय और कथित अघोषित नाकाबन्दी खुल जाय ताकि काठमान्डू सहज हो जाय । वैसे काठमान्डौ असहज है भी नहीं, क्योंकि सरकार द्वारा प्रश्रय मिले हुए कालाबाजारी ने जीना आसान किया हुआ है और जनता तो राष्ट्रवाद की घुट्टी को पीकर इतनी मस्त है कि उन्हें कहीं कोई फर्क नहीं पड़ रहा है । डीजल पेट्रोल रखने के लिए सरकार के पास जगह नहीं है किन्तु, सड़कों पर गाडि़यों की लम्बी लाइनें पूर्ववत हैं । खैर, ये दृश्य तो काठमान्डौ की सड़कों पर पुराना हो चुका है ।
संशोधन और सम्बोधन
शहीद दिवस के अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री ने एकबार फिर मोर्चा को संवाद में आने का आह्वान किया है । उनका विश्वास है कि इस संबोधन से सभी समस्या का हल समाधान होगा । जनता के सामने उनका मंतव्य आया कि संविधान जारी होने से पहले देश में जो समस्या का वातावरण था वह क्रमशः सम्बोधन होता आ रहा है । परन्तु यह सम्बोधन कहाँ और किस रूप में हो रहा है इसका कोई उदाहरण जनता की निगाह में तो नहीं आ रहा । जनता अगर कुछ देख रही है तो अभाव और असमंजस की स्थिति । सरकार ने जब जब वार्ता का माहोल तैयार किया, जनता में उम्मीद जगी कि अब सब ठीक होगा । वातावरण सकारात्मक होने का पैगाम भी आया किन्तु तत्काल ही सत्ता ऐसे दमन को अपनाती है जो सहज होने की सम्भावना को पूर्णतः समाप्त कर देती है । रंगेली की घटना इसका ताजा तरीन उदाहरण है । मोर्चा से सरकार की वार्ता अपनी शिथिल अवस्था में है, ऐसे में प्रधानमंत्री का आह्वान कहाँ और कैसा असर छोड़ता है पता नहीं । देश की जनता प्रधानमंत्री के आश्वासन का स्वाद चख चुकी है । भ्रष्टाचार और कालाबाजारी में रिकार्ड बनाता देश जहाँ कुछ वर्ग को सभी सुविधा मुहैया करा रहा है वहीं देश का अधिकांश हिस्सा गरीबी, बदहाली और अभाव की चरम पीड़ा को भोगने के लिए बाध्य है । किन्तु हमारी सरकार धृतराष्ट्र की सरकार है, जो अपनी स्वार्थ और अहं के अन्धत्व में देश को विनाश के कगार पर पहुँचाने में व्यस्त है ।
संविधान संशोधन का सच
सवाल संविधान संशोधन का है । वह संशोधन जिसमें मधेशी दलों की कोई भूमिका नहीं है । जाहिर सी बात है जब उसका प्रतिनिधित्व ही नहीं है तो मधेश की जनता को निःसन्देह यह संशोधन न तो सम्बोधित ही कर पाएगा और न ही संतुष्ट । जिन बातों पर मधेश की जनता आज तक उद्वेलित है, उसे फिर से एक बार नकारा ही गया है । मिनेन्द्र रिजाल ने जिस संशोधन के प्रस्ताव को पंजीकृत किया है, उसमें अन्तरिम संविधान की भावना और मधेशियों की उम्मीदों को नजरअंदाज किया गया है । वर्तमान संविधान में ऐसे कई बिन्दु हैं जो पूर्णरूप से व्याख्यायित नहीं हो पाए हंै जिसमें पारदर्शिता नहीं है । फिलहाल जो संशोधन की बात है, उसमें जनसंख्या को मुख्य आधार और भूगोल को सहायक आधार माना गया है, जो स्वयं में अस्पष्ट है और जिससे बाद में फिर से विवाद होने की पूरी सम्भावना बनती है । इस संविधान के मुख्य धारा ८४ के उपधारा१(क) जिसमें सरकारी प्रस्ताव ही है, केवल धारा २८६ के उपधारा (५) में मीनेन्द्र रिजाल ने संशोधन पास किया है जिसमें कहा गया है कि निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण आयोग के द्वारा किया जाएगा जिसमें जनसंख्या को प्रतिनिधित्व का मुख्य आधार और भूगोल को प्रतिनिधित्व का सहायक आधार माना जाएगा और प्रत्येक प्रदेश में निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण किया जाएगा । प्रदेश के भीतर प्रत्येक जिला में कम से कम एक निर्वाचन क्षेत्र रहेगा । जिससे समझा जा रहा है कि मधेश के हिस्से में ८० क्षेत्र आ जाएँगे । किन्तु ये कहाँ से और किस तरह आएँगें इस पर कोई चर्चा नहीं है । संशोधन में विमलेन्द्र जी के प्रस्ताव को भी अनसुना कर दिया गया, वैसे वो इस बात से संतुष्ट नजर आ रहे हैं कि मधेश को ८० क्षेत्र प्राप्त होने की सम्भावना है ।इस संतुष्टि में शायद सत्तापक्ष से संलग्नता ही काम कर रही है । कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि इसमें कई बिन्दु ऐसे हैं जो सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से सही नहीं है । दूसरा संशोधन समावेशी के आगे समानुपातिक शब्द जोड़ना है किन्तु यह भी अन्तरिम संविधान की भावना को समेटने में असक्षम ही है । संशोधन में इन दो मुद्दों के अलावा जो सबसे अहम और विवादित मुद्दा है सीमांकन और नागरिकता, उसे दरकिनार ही किए हुए है । जबकि भारत भी नेपाल सरकार से इन दोनों मुद्दों को सम्बोधित कर के समस्या का निदान खोजने की बात कई बार कह चुका है । वैसे सत्ताधारी नेतागण का मानना है कि इस संशोधन से मधेशी जनता और मोर्चा दोनों को मूल धार में लाना सहज हो जाएगा । किन्तु इसकी सम्भावना दूर–दूर तक नजर नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि मधेश और मधेशी जनता आज भी सड़कों पर ही है । सिर्फ कुछ घन्टों के लिए बीरगंज नाका खुला किन्तु युवा मोर्चा ने उसे फिर से बन्द करा दिया है । इसी बीच मोर्चा में महागठबन्धन की सम्भावना प्रबल होती दिखाई दे रही है । यह शंक्ति संचय मधेश आन्दोलन को एक नई दिशा देने की क्षमता जरुर रखेगा क्योंकि मधेशी जनता भी अब मिल कर इस राह को तय करना चाह रहे हैं ।
संशोधन की आड़ में नाकाबन्दी पर नजर
आज भी सरकार मधेश समस्या के प्रति गम्भीर नहीं है । जहाँ की जनता कराह रही है, रोज मर रही है किन्तु उनकी अधिकार की लड़ाई जारी है । सरकार की कोई पहल इस ओर नहीं हो रही है । जिस संशोधन की बात पर सरकार खुद अपनी पीठ थपथपा रही है उसकी भी कोई विशेष उपलब्धि सामने नहीं है । संशोधन की आड़ में सरकार की एकमात्र कोशिश रही है कि नेपाल का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बीरगंज नाका का अवरोध समाप्त हो जाय क्योंकि सरकार अपनी पूर्व धारणा के तहत ही आज तक चल रही है जिसमें नाका अवरोध का पूरा श्रेय भारत को दिया जा रहा है । सरकार आश्वस्त है कि इस संशोधन के नाटक के पश्चात् नाकाबन्दी का पटाक्षेप तय है और इसलिए हमारे प्रधानमंत्री ने तत्काल घोषणा भी कर दी कि एक दो दिनों में नाका खुल रहा है। किन्तु, इस एक दो दिन को गुजरे भी कई दिन हो गए किन्तु अब तक सामने कोई परिणाम नहीं आया है । शायद यह भी प्रधानमंत्री के अन्य घोषणाओं की तरह हवाई किला ही साबित हो रहा है । मधेश आन्दोलन और नाकाबन्दी के कारण, साथ ही प्रधानमंत्री ओली की बिना सर पैर की बोली, आरोप तथा कटाक्ष के कारण पिछले दिनों में नेपाल और भारत के रिश्ते में जो दरार आई है उसका असर देश के हर क्षेत्र में दिख रहा है । परन्तु एक और बात जो कभी कभार सत्ते की गलियारों से या प्रधानमंत्री निवास की दीवारों से छन–छन कर आती है कि नेपाली जनता के सामने खुद को स्वाभिमानी, राष्ट्रवादी और भारत विरोधी साबित करने वाले ओली, समय समय पर भारत में यह संदेश भी प्रसारित करने पर लगे हुए हैं कि वो भारत विरोधी नहीं हैं और उनकी कुर्सी बचाने के लिए पड़ोस का सहयोग अपेक्षित है । काश उन्हें कोई यह समझाए कि इससे तो बेहतर होता कि वो मधेश और मधेशी जनता को यह विश्वास दिलाते कि नेपाल में मधेश सुरक्षित है । किन्तु इस जगह स्पष्ट रूप से एक निरंकुश शासक के रूप में वो सामने आते हैं जहाँ उनके आदेश पर निहत्थी जनता बेमौत मारी जा रही है और जिसकी कमान सत्ता के हाथों में है ।
प्रबुद्ध समूह गठन एक सकारात्मक पहल
खैर, संशोधन के नाटक के साथ ही सरकार एक और प्रयास करने जा रही है, वह है नेपाल–भारत पुनरावलोकन पहल । प्रबुद्ध समूह का गठन किया गया है । किन्तु मजे की बात तो यह है कि इसमें भी मधेशी प्रतिनिधित्व से सरकार ने अपना दामन बचा लिया है । वैसे यह कोई नई बात नहीं है । हर निकाय की तरह यहाँ भी मधेश उपेक्षित ही है । शायद पूरे नेपाल में इस समूह में शामिल होने के लिए कोई मधेशी बुद्धिजीवी सरकार की नजरों में नहीं आया हो । खैर, प्रबुद्ध समूह में पूर्व राजदूत डा. भेषबहादुर थापा, अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग के पूर्व प्रमुख आयुक्त सूर्यनाथ उपाध्याय, पूर्व कानून मंत्री नीलाम्बर आचार्य और सांसद तथा परराष्ट्र मामलों के जानकार डा.राजन भट्राई शामिल हैं । दो देशों के बीच ऐसे समूह गठन करने की सहमति पहले ही हुई थी । माना जा रहा है कि नाकाबन्दी और सहमति और समझौता को भारत द्वारा अवहेलना किए जाने की स्थिति में सरकार ने इस समूह की आवश्यकता महसूस की और इसीलिए इस समूह का गठन किया गया है । इस समूह का कार्यकाल दो वर्षों का होने वाला है । यह समूह १९५० की नेपाल भारत शान्ति तथा मैत्री संधि के साथ ही आज तक हुए सभी सहमति और समझौतों का अध्ययन करेगी और सरकार के सामने निष्कर्ष पेश करेगी । प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी ने २०५१ में भारत भ्रमण किया था । उसी समय १९५० की संधि के पुनरावलोकन की बात उठी थी । पर आज तक कोई ठोस पहल नहीं हो पाई थी । सुशील कोईराला नेतृत्व सरकार में परराष्ट्रमंत्री महेन्द्र पाण्डेय के भारत भ्रमण के समय में प्रबुद्ध समूह बनाने की सैद्धान्तिक सहमति हुई थी । गत वर्ष भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेपाल भ्रमण के समय प्रबुद्ध समूह के विषय में औपचारिक सहमति हुई थी । उसी सहमति के अनुसार दोनों देशों ने संयुक्त रूप से काम करने के लिए एक–एक लाख डालर रुपए का बजट भी अलग किया था । नेपाल की ओर से समूह गठित होने के बाद अब संवाद की सम्भावना तीव्र हो चुकी है । नेपाल और भारत के बीच सीमा, व्यापार तथा पारवहन सम्बन्धी सहमति और समझौता के विषय में सदैव बहस और विवाद होता रहा है । इस समूह के गठन के साथ यह उम्मीद की जा रही है कि इन विवादों का अंत होगा और दोनों देशों के बीच रिश्ते की प्रगाढता बढ़ेगी और विकास के समान अवसर प्राप्त होंगे । संशोधन का असर तो दिख गया । जो सोचकर सरकार ने संशोधन का पहल किया फिलहाल वो नाकाम दिख रहा है । किन्तु, उम्मीद है कि प्रबुद्ध समूह के गठन से वर्षों से उलझे और विवादित रिश्ते को एक नई दिशा प्राप्त होगी ।
Dr.Shweta Dipti is Editor of Himalini Hindi magazine from Nepal . Dr. Dipti is also former Head of Department of Hindi in Tribhban University at Kirtipur campus, Kathmandu.