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राजा महेन्द्र से लेकर ओली सरकार तक भारत विरूद्ध चाइना-कार्ड का प्रयोग : श्वेता दीप्ति

 

 इस नीति के तहत यह कोशिश की जा रही है कि राष्ट्रवादी विचारधारा वाले लोगों को विश्वास में लिया जाय और उनके निर्वाचन क्षेत्र में अपनी पकड़ कायम की जाय । दूसरी जो राजनीति को भँजाने की सबसे अहम और महत्वपूर्ण नीति रही है नेपाल की कि जब झोली खाली हो तो यह दिखाया जाय कि हम भारत के मुहताज नहीं हैं, हमें भारत की जरुरत नहीं है


 

इनमें जिन पर सबसे अधिक फोकस किया जा रहा है वह है काठमान्डू केरुंग रेल मार्ग तथा अन्य नाकाओं को खोलने की बात । परन्तु स्थलगत तौर पर अगर इस पर गौर किया जाय तो यह महज मृगतृष्णा ही साबित होगी । तातोपानी नाका को खुलवाने में असफल सरकार इन समझौतों पर कब कार्य करवा पाएगी यह इनकी नीति तय करेगी ।

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , ३० मार्च |

किला फतह करने के अंदाज में प्रधानमंत्री ओली का अवतरण चीन भ्रमण के पश्चात् नेपाल की धरती पर हुआ है । बड़ी–बड़ी बातें और बड़े–बड़े सपने, लुभावने तो हो सकते हैं किन्तु सच तो यह है कि यथार्थ से यह काफी दूर होता है । अपनी तथाकथित उपलब्धियों पर इतराना वैसे भी हमारे प्रधानमंत्री जी की आदतों में शुमार है । फिलहाल तो नेपाली मीडिया भी उनके चीन भ्रमण से अत्यधिक उत्साहित नजर आ रहा है । वैसे उत्साहित होने का हक भी है, क्योंकि उत्साह ही उर्जा प्रदान करती है और नकारात्मकता में भी सकारात्मक सोच सामने आती है । जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है । यह दीगर है कि इन उपलब्धियों से भविष्य हमें क्या देने वाला है यह फिलहाल धुन्ध में है । परन्तु इस धुंध को हटाने की कोशिश तो की ही जानी चाहिए ।mahendra+oli

 

ओली की चीन यात्रा को फिलहाल नेपाल की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है और इसी तरह इसका पूरे जोर शोर से प्रचार प्रसार किया जा रहा है । मीडिया तो इस भ्रमण का ऐसे प्रचार कर रही है मानो उन्हें विशेष तौर पर राजनीतिक रूप से इसकी ट्रेनिंग दी गई हो । वैसे गौर किया जाय तो यह स्पष्ट तौर पर दो उद्देशयों से प्रेरित नजर आ रही है । पहली, इस नीति के तहत यह कोशिश की जा रही है कि राष्ट्रवादी विचारधारा वाले लोगों को विश्वास में लिया जाय और उनके निर्वाचन क्षेत्र में अपनी पकड़ कायम की जाय । दूसरी जो राजनीति को भँजाने की सबसे अहम और महत्वपूर्ण नीति रही है नेपाल की कि जब झोली खाली हो तो यह दिखाया जाय कि हम भारत के मुहताज नहीं हैं, हमें भारत की जरुरत नहीं है । या यूँ कहा जाय तो भारत को सीधे तौर पर धमकाया जाय । यह नीति हमेशा से उस समय लागू की जाती है जब नेपाल किसी आन्तरिक समस्या से जूझ रहा होता है । उस समय चाइना कार्ड नेपाल के लिए तुरुप का पत्ता होता है जिसे सत्ता उपयोग करती है । शाही शासन में भी यह होता आया है और लोकतंत्र में भी यह दिख ही रहा है । राजा महेन्द्र से लेकर राजा वीरेन्द्र और ज्ञानेन्द्र तक की शाही सत्ता इस कार्ड को आजमाने की कोशिश कर चुके हैं । राजा महेन्द्र ने प्रजातांत्रिक शक्ति को दबाने के लिए १९६० में भारत से सहयोग की अपेक्षा की थी और जब वहाँ से

इन सबके बावजूद यह माना जा सकता है कि चीन नेपाल में जी खोलकर खर्च करने को तैयार हो सकता है क्योंकि वह नेपाल की धरती को भारत के लिए प्रयोग करना चाहता है । अपनी प्रसारवादी नीति के तहत चीन नेपाल के लिए खर्च करने से गुरेज नहीं कर सकता है ।
निराशा हाथ लगी तो हतोत्साहित होकर काठमान्डू और कोदारी के बीच सड़क का निर्माण करवा डाला जो १९५० की भारत नेपाल संधि का सीधा उल्लंघन था । उसके बाद राजा बीरेन्द्र और राजा ज्ञानेन्द्र ने भी १९८८–८९ और २००५–०६ के दौरान सत्तावादी शासन के खिलाफ जब उन्हें संघर्ष करना पड़ा तो उन्होंने भी इसी नीति को आजमाया । इन सभी चालों में जो भावना निहित थी वो भारत विरोधी राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए काफी थी । उसी इतिहास की पुनरावृत्ति कमोवेश आज भी हो रही है जिसे कार्यान्वयन यूएमएल शाही संरक्षण और राजनीतिक भावना के तहत फलफूल रहे लोकतांत्रिक शासन के प्रमुख कर रहे हैं । इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है क्योंकि जब भी देश आन्तरिक समस्याओं में उलझा है तो कम्यूनिष्ट की शक्ति बढ़ी है । खैर ध्यान देने वाली बात चीन के साथ हुए समझौतों पर है ।

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चीन के साथ जिन दस मुद्दों पर समझौते हुए हैं उससे एक राष्ट्रवादी भौतिक जमात ऐसी है जो इस समझौते से अति उत्साहित हैं और यह दावा कर रहे हैं कि नेपाल भारतवेष्टित से अब भूपरिवेष्टित हो रहा है । उन्हें लग रहा है कि ओली की निष्कर्षविहीन हुई भारत की यात्रा की क्षतिपूर्ति चीन यात्रा ने कर दी है । परन्तु देखा जाय तो चीन के साथ हुए समझौते में एक भी समझौता ऐसा नहीं है जो वर्तमान नेपाल की समस्याओं का तत्काल निदान कर सके । जो समझौते हुए हैं उनके कार्यान्वयन में और उसके परिणाम को आने में वर्षों लगेंगे किन्तु आज जिस दौर से आम जनता गुजर रही है या देश जिन समस्याओं से जूझ रहा है उसका क्या ? यह यक्ष प्रश्न ज्यों का त्यों है ।

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चीन की इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने पारगमन और व्यापार, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचा, उजाृ अन्वेषण और भंडारण, बैंकिंग, छात्रवृत्ति और प्रशिक्षण के क्षेत्र से जुड़े हुए समझौते किए हैं । इनमें जिन पर सबसे अधिक फोकस किया जा रहा है वह है काठमान्डू केरुंग रेल मार्ग तथा अन्य नाकाओं को खोलने की बात । परन्तु स्थलगत तौर पर अगर इस पर गौर किया जाय तो यह महज मृगतृष्णा ही साबित होगी । तातोपानी नाका को खुलवाने में असफल सरकार इन समझौतों पर कब कार्य करवा पाएगी यह इनकी नीति तय करेगी । फिलहाल इसका कोई सुखद परिणाम नेपाल के लिए सामने नहीं दिख रहा है । जब तक इस समझौते पर कार्य नहीं होगा तब तक पारवहन संधि के कार्यान्वयन होने का तो सवाल ही नहीं उठता । चीन अपना बंदरगाह तिआनजिन नेपाल को तीसरे देशों से आयातित करने के लिए उपयोग हेतु देने पर सहमति दे चुका है । यह एक अच्छी कोशिश है किन्तु जब वास्तविकता की ओर हम दृष्टिगत होते हैं तो यह बात भी सामने आती है कि समुद्री बन्दरगाह तियानजिन नेपाल से ३५ सौ किलोमीटर दूर है जबकि उससे आधी दूरी पर अवस्थित विशाखापत्तनम बन्दरगाह के प्रयोग में ही कठिनाई आ रही है । वर्तमान में नेपाल भारत का हल्दिया बंदरगाह जो नेपाल से महज १००० किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है ।

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इन सबके बावजूद यह माना जा सकता है कि चीन नेपाल में जी खोलकर खर्च करने को तैयार हो सकता है क्योंकि वह नेपाल की धरती को भारत के लिए प्रयोग करना चाहता है । अपनी प्रसारवादी नीति के तहत चीन नेपाल के लिए खर्च करने से गुरेज नहीं कर सकता है । क्योंकि पूरे दक्षिण और दक्षिणपूर्वी एशिया को अपने प्रभाव में लाना चाहता है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है । यह अवस्था भारत के लिए चिंतनीय है किन्तु एक यह भी सवाल सामने आता है कि क्या चीन नेपाल पर आर्थिक आधिपत्य जमाकर भारत के विरुद्ध खुलकर सामने आना चाहेगा ? क्योंकि चीन भारत जैसे शक्तिशाली पड़ोसी को अपने विश्वास में ना लेकर क्या चीन विश्व के सबसे बड़े अर्थतन्त्र की दौड़ में शामिल हो पाएगा ? पिछले दिनों में चीन ने भारत के साथ जितने निवेश आर्थिक पूर्वाधार और प्रविधि में किया है क्या उसे वो दाँव पर लगाना चाहेगा ? खैर, भारत और चीन की विदेश नीति को अगर छोड़ दें तो भी यह तो स्पष्ट है कि नेपाल अपनी विदेश नीति में असक्षम साबित हो रहा है । चीन भ्रमण से पहले कई अहम विषयों का सूची से हटना, बिना किसी निश्चित ऐजेन्डे के भ्रमण करना और जो मिल जाय उसका ढिंढोरा पीटना हमारे राजनीतिज्ञो. की आदत सी हो गई है । फिलहाल तो यह तय है कि चीन से हुए समझौतों को लेकर चाहे कितनी भी दलीलें दे दी जायँ लेकिन एक को चिढ़ाकर दूसरे की ओर झुकना या फिर एक को धमका कर दूसरे से मदद की अपेक्षा करना एक कमजोर विदेश नीति ही साबित होगी और और हो रही है जिसका खामियाजा देश बखूबी झेल रहा है ।

 

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