विनाशकारी आपदा : ईश्वरीय प्रहार या प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम? : राघवेन्द्र साह
राघवेन्द्र साह, जनकपुरधाम, २९ अगस्त। नेपाल में हाल के वर्षों में दिखाई दे रही विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं ने प्रत्येक नेपाली के मन में एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या यह केवल प्रकृति का स्वाभाविक प्रकोप है या फिर प्रकृति के साथ मनुष्य द्वारा किए जा रहे निरंतर खिलवाड़ का परिणाम? बाढ़, भूस्खलन, भूक्षय, जलभराव, अतिवृष्टि और असामान्य मौसम की घटनाएँ लगातार जनधन की भारी क्षति कर रही हैं। ऐसी घटनाओं को केवल दैवी प्रकोप कहकर टाल देना पर्याप्त नहीं है। इनके पीछे छिपे प्राकृतिक तथा मानवीय कारणों को गंभीरता से समझना आज की आवश्यकता है।
प्रकृति स्वयं संतुलन का प्रतीक है। हिमालय, नदियाँ, वन, जंगल, झीलें, तालाब और धरती पृथ्वी के जीवनचक्र को निरंतर आगे बढ़ाते हैं। लेकिन जब मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए वनों की कटाई करता है, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोकता है, अव्यवस्थित तरीके से सड़क निर्माण करता है, पहाड़ों को काटता है, नदी एवं जलधाराओं के क्षेत्रों पर अतिक्रमण करता है और पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी करता है, तब प्रकृति की प्रतिक्रिया भी विनाशकारी हो सकती है। इसलिए आज नेपाल में दिखाई देने वाली अनेक आपदाओं को केवल भाग्य या ईश्वर की इच्छा मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा।
हमारी सभ्यता ने प्रकृति को देवत्व प्रदान किया है। हिमालय को देवभूमि, नदियों को माता और जंगलों को जीवन का आधार मानने की परंपरा नेपाल में हजारों वर्षों से चली आ रही है। लेकिन आधुनिक विकास के नाम पर इसी प्रकृति पर लगातार प्रहार किया जा रहा है। हम नदियों को नालों की तरह, जंगलों को केवल लकड़ी के स्रोत की तरह और पहाड़ों को सड़क बनाने के लिए पत्थरों के भंडार की तरह देखने लगे हैं। प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु मानने वाली यह सोच अंततः स्वयं मानव जीवन के लिए संकट पैदा कर सकती है।
इसी संदर्भ में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—“क्या यह ईश्वरीय प्रहार है या पृथ्वी के विनाश का संकेत?” धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो आपदा मनुष्य को अपने कर्म और आचरण पर विचार करने के लिए प्रेरित करने वाली चेतावनी भी हो सकती है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित शहरीकरण, वनों की कटाई, कमजोर भू-उपयोग नीति और अव्यवस्थित निर्माण आपदा के जोखिम को बढ़ा रहे हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय चेतना जगाने वाले दो अलग-अलग आयामों के रूप में समझा जा सकता है।
विशेष रूप से हिमालय क्षेत्र आज गंभीर पर्यावरणीय परिवर्तन का साक्षी बन रहा है। हिमनदों में हो रहे परिवर्तन, हिमतालों का बढ़ता जोखिम, अनियमित वर्षा तथा तापमान में बदलाव हिमालयी और पर्वतीय क्षेत्रों के सामने नई चुनौतियाँ पैदा कर रहे हैं। हिमालय में होने वाले परिवर्तन का प्रभाव पहाड़ों से होते हुए तराई तक पहुँचता है। इसलिए हिमालय का संरक्षण केवल हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का विषय नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
इसी भावभूमि में मानसरोवर से गंगोत्री तक का शिव से मिलन एक गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। कैलाश–मानसरोवर भगवान शिव से जुड़ी पवित्र भूमि है, जबकि गंगोत्री से प्रवाहित होने वाली गंगा भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख जीवनदायिनी नदियों में से एक है। हिमालय की गोद से जन्म लेने वाली नदियाँ नेपाल, भारत और पूरे दक्षिण एशिया के जीवन को आपस में जोड़ती हैं। भगवान शिव की जटाओं से गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की धार्मिक कथा भी हिमालय, नदी और मानव सभ्यता के गहरे संबंध को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत करती है।
मानसरोवर से गंगोत्री तक फैले हिमालयी क्षेत्र को केवल धार्मिक तीर्थस्थल के रूप में नहीं, बल्कि पृथ्वी के पर्यावरणीय सुरक्षा कवच के रूप में भी देखना चाहिए। यहाँ की बर्फ, नदियाँ, वन और जैव विविधता सुरक्षित रहे तो लाखों-करोड़ों लोगों का भविष्य सुरक्षित रह सकता है। लेकिन यदि हिमालय पर निरंतर मानवीय दबाव बढ़ता रहा, तो उसका प्रभाव सीमाओं और राष्ट्रों से कहीं आगे तक पहुँच सकता है।
नेपाल के लिए यह विषय और भी गंभीर है। हमारा देश हिमालय की गोद में स्थित है। यहाँ की अनेक नदियाँ हिमालय से जन्म लेती हैं, पहाड़ों से होकर बहती हैं और तराई के जीवन को पानी तथा सिंचाई प्रदान करती हैं। इसलिए हिमालय से लेकर तराई तक के पर्यावरणीय संबंध को समझते हुए विकास नीति तैयार करना आवश्यक है।
आज की आपदाएँ हमें एक स्पष्ट संदेश दे रही हैं—प्रकृति के साथ युद्ध करके मानव सभ्यता सुरक्षित नहीं रह सकती। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास प्रकृति के विनाश की कीमत पर नहीं होना चाहिए। सड़कें आवश्यक हैं, लेकिन पहाड़ों की स्थिरता नष्ट करके नहीं। शहर आवश्यक हैं, लेकिन नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोककर नहीं। उद्योग आवश्यक हैं, लेकिन पर्यावरण को प्रदूषित और विषाक्त बनाकर नहीं।
अब हमें विकास की परिभाषा में ही परिवर्तन करने का समय आ गया है। पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन किए बिना किए जाने वाले निर्माण, जोखिम वाले क्षेत्रों में बस्तियों का विस्तार, नदी एवं जलधाराओं पर अतिक्रमण और वनों की कटाई को सामान्य विकास का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। स्थानीय समुदायों की सहभागिता, वैज्ञानिक अध्ययन, भू-उपयोग योजना और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण विकास के मूल आधार होने चाहिए।
आपदा आने के बाद केवल राहत बाँटना समाधान नहीं है। आपदा के जोखिम को कम करने के लिए जोखिम की पहचान, पूर्व चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित बस्तियों का विकास, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक एवं सुरक्षित बुनियादी ढाँचे में निवेश करना आवश्यक है। राज्य, स्थानीय सरकार, नागरिक समाज और आम नागरिक—सभी की भूमिका इसमें समान रूप से महत्वपूर्ण है।
आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि “आपदा क्यों आई?” प्रश्न यह भी है—“हमने प्रकृति को कितनी चोट पहुँचाई है?”



