अयोध्या के राम और जनकपुर की सीता अब गोलियों के निशाने पर : कैलाश महतो,
कैलाश महतो,पराशी,३१ मार्च |
कुछ वर्ष पहले डा.सि.के.राउत ने कहा था कि अब न अयोध्या से कोई राम किसी सीता को लेने जनकपुर जायेगा और न कोई सीता अब किसी राम के घर अयोध्या जा पायेगी ।
तकरीबन दो सौ वर्ष पूर्व बने नेपाल और वर्तमान के भारत और उसके शासन से हजारों लाखों वर्ष पूर्व के अयोध्या और जनकपुर बीच रहे पारिवारिक, वैवाहिक, संस्कृतीय, पारम्परिक आदि सम्बन्धों का चीरहरण हो रहा है एक तरफ तो दूसरी तरफ वर्तमान के नेपाली और भारतीय शासक लोग नेपाल और भारत के बीच सदियों से सम्बन्ध रहने का भाषण ठोकते रहते हैं । यहाँ तक कि भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी तक ने इन बातों का जिक्र करते हुए जनक जननी सीता को सीता मैया का नाम दे डाला, मगर वही सीता माता अब अपने मायके जनकपुर नहीं आ सकती अपने राम के साथ भी, न राम सम्मानित ढंङ्ग से जनकपुर और अयोध्या ओहर दोहर कर सकते ।
बडे विचित्र और दुभार्ग्यपूर्ण ही किस्मत भी उन सारे स्थलों का भी है जहाँ से सम्बन्ध राजा दशरथ, जनक, सीता और राम के रहे हैं । राम और सीता तथा दशरथ और जनक से सम्बन्ध रखने बाले तत्कालिन समय के अयोध्या हो या जनकपुर हो, या फिर सीता प्राकट्य स्थल बिहार के सीतामढ़ी हो, सबों का दयनीय एवं भ्रमपूर्ण बना हुआ है ।
दशरथ की राजधानी तथा राम का जन्मस्थल अयोध्या, जो कभी राम राज्य के नाम से प्रख्यात रहा, आज भारतीय कुछ पार्टीयाँ तथा नेताओं के लिए राजनीति का केन्द्र बना हुआ है तो सीता की प्राकट्य स्थल सीतामढ़ी का कोई प्रचार प्रसार या उसका कोई विकास नहीं है । वैसे ही विदेह राजा शिरध्वज जनक के मिथिला राज्य की राजधानी एवं सीता की परवरिश स्थल जनकपुर भी उसपर औपनिवेशिक शासन कर रहे खस नेपाली शासकों के हेय दृष्टि की शिकार बनी हुई है ।
ज्ञात हो कि आज का नेपाल कहलाने बाले देश के औपनिवेशिक शासन में फँसे मध्यदेश और अयोध्या, काशी, कौशल, मिथिला, विराट आदि सम्पूर्ण भू-भाग एक ही देश मध्यदेश की राज्य शाखायें थी । उसी मध्यदेश (आज का मधेश) के विभाजित सम्राट मनु के वंशों में बँटे राज्यों में से सु-सम्पन्न रहे मिथिला और अयोध्या नरेशों और युवराज युवराज्ञी बीच सम्धिय और पति पत्नी के रुप में सम्बन्ध कायम की गयी थी ।
मनुस्मृति के अध्याय दो और श्लोक संख्या २१, २२ और २३ अनुसार उत्तर के हिमालय से दक्षिण के विन्ध्याचल पर्वत तक और पूरव के प्रयागनाथ से पश्चिम के सतलज एवं सरस्वती नदी तक के मध्यदेशिय देशों तथा भू-भागों में आवत जावत करने के लिए समान्य लोगों को कभी कोई परेशानी नहीं हुई थी । वह परम्परा आज से लगभग २५ वर्ष पहले तक कायम ही थी । भारत और नेपाल कहे जाने बाले मधेश के घर, परिवार, समुदाय और व्यक्तियों के बीच कोई बञदेज नहीं थी । समान रहन सहन, रीति रिवाज, खान पान एवं मनोवैज्ञानिक चिन्तन रहे वर्तमान के भारतीय बिहार तथा यू पी एवम नेपाल के औपनिवेशिक शासन अधिनस्त मधेश के बासियों बीच सारे सम्बन्ध रहे हैं जो न आज के कोई भारतीय या नेपाली शासन, प्रशासन, राजनीतिक पार्टीयाँ या नेताओं ने बनाया है बल्कि ये कालाान्तर से प्राक्रितिक और पूर्ण स्वाभाविक रुप में कायम रहा है । परन्तु हमारे इन पाक और नेक सम्बन्धों को भारतीय और नेपाली दोनों शासकों ने मिलकर तिरष्कार और हत्या करने के प्रयास में लिप्त रहे हैं, जिसका उदाहरण हम बिहार चुनाव और उसके उपरान्त बाले समयों में बखुबी देख चुके हैं ।
जब बिहार और यू पी में चुनावें थीं तो भारत के केन्द्र तथा राज्य दोनों की दलील यह थी कि मधेश की समस्या जायज है और नेपाली सरकार को उसे सम्बोधन करना होगा । उन भाषणों का एक ही उद्देश्य था मधेशी जनता तथा मधेश में बसे उनके रिस्तेदारों को अपने अपने पार्टियों के तरफ आकर्षित कर भोट लेना । बडे नाटकीय ढंङ्ग से भारत ने अपना व्यापार भी चलाया । उनके पेट्रोल पम्प व्यवसायी लगायत के व्यापारीयों ने समान्य रुप से ५ साल में कमाये जाने बाले कमाई ५,६ महीनों में कमायी । मधेश के रिस्तेदार बाले भोटरों से भोट भी कमाये, नाकाबन्दी के नाम पर मधेशी दल तथा नेताओं को उल्लू बनाकर उनके समथर्न भी पाए, अपने व्यापारियों को मधेशी पार्टी के नेता, युवा तथा तस्करों को तेल व खाद्दय पद्दार्थ उपलब्ध करवाकर नेपाली शासक तथा उनके लोगों को खुश रखने के काम भी किया । और चुनाव खत्म होते ही अपने वास्तविक रुप में आकर नाकाबन्दी को निरस्त कर दिया । ओली को निमन्त्रण दे डाले और फिर मधेश भारत बीच का नहीं, नेपाल भारत बीच के शदियों पूरानी रिस्ते कायम हो गये ।
गौर करने बाली बात यह बन जाती है कि भारतीय और नेपाली पार्टियाँ तथा उनके नेतृत्व के बीच मधेश और मधेशी तो शिकार नहीं हो रहे हैं ? दिन प्रति दिन मधेश के लोग भारत मधेश सीमाओं पर दोनों तरफ के सुरक्षाकर्मियों द्वारा इस कदर बेइज्जत एवं प्रताड़ित होते हैं( मानो वे बहुत बडे गुनाहगार हैं । नेपाली राज्य के नजर में मधेशी तो इस लिए गुनाहगार हैं, क्यूँकि वे चेतन और अचेतन दोनों रुपों में खीजकर दुर्व्यवहार करते हैं कि मधेशी भारतीय बेटियों से शादियाँ क्यूँ करते हैं । अपनी बेटी(बहनों को भारत में शादियाँ क्यूँ रचाते है ? और नेपाली इस मानसिकताओं को मजबूत करने में समस्त भारतीय शासन और प्रशासन भी लगे हुए हैं । उसी वर्तमान नेपाल और भारत के सीमाओं से उन्हीं दोनों सुरक्षाकर्मियों के सहयोगों से भारतीय और नेपाली तस्करों की सुरक्षा, हिफाजत, सहयोग और सम्मान इस कदर होता है( मानो वे हर रात के नये दुलहे हों और उन्हीं रास्तों से दैनिक हजारों राम और सीता बेइज्जत और दुर्व्यवहार बिना आरपार नहीं हो पाते हैं । लाखों समान्य रोजमर्रा के दैनिक जीवन यापन करने बाले मधेशी लोग नेपाली सरकार द्वारा रणनीतिपूर्ण उधेश्य से उन्हें उपलब्ध नहीं किये जाने बाले दैनिक उपभोगिय सामान जैसे रु(५००( से रु( १५००( तक के विद्धुत्तीय सामान, ५(१० किलो दाल(चिनी, दो चार दश हजार के घरायसी लत्ते कपडेÞ नहीं ले जा सकते । उन्हें हरेक डेढ दो कि( मी पर चेक जाँच करबाने पडते हैं, अपमान सहना उनके समान्य अनिवार्यता बन गयी है( जबकि उन्हीं सीमा रास्तों से चोर, तस्कर और काला बजारिये दैनिक लाखों, करोडों और अरबों की तस्करी उन्हीं सीमा सुरक्षाकर्मियों के मिलिभगत से आरपार करते करबाते हैं । जिसकस् वजह से सीधे साधे लोग पीडित होते है. और गलत लोग फायदे में ही रहते हैं क्योंकि उन्हें तो कोई रोकने वाला नहीं होता । उनकी तो दोनों ओर की सुरक्षाकर्मियों से बात जो तय होती है ।


