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मधेश आन्दोलन: गा“व में थम नहीं रहा हु“कार

 

विनय दीक्षित :नाकाबन्दी के बाद सरकार, और जनता को यह महसूस होना स्वभाविक है कि आन्दोलन रुक गया । क्योंकि आम जनजीवन में नाकाबन्दी के कारण जो प्रभाव था उस में कुछ सरलता आई । मधेश आन्दोलन का स्वरूप भले ही बदला हो, लेकिन नेपालगन्ज और आसपास के गाँवों में पुतला दहन, सभा, विरोध जुलुस जैसे कार्यक्रम आज भी हो रहे हैं । गैर मधेशी समुदाय अभी पूर्ण रूप से सदमें से बाहर निकल नहीं पाया है । जिले में गाँव केन्द्रित आन्दोलन निरन्तर आगामी कठिनाइयों को हवा दे रही है ।
लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा के नेता, कार्यकर्ता निरन्तर सभा और कार्यक्रम को संचालन करते रहे हैं । खासकर बाँके इन्द्रपुर, खजुरा, जयसपुर, हिरमिनिया, फत्तेपुर, बेतहनी, कम्दी, पुरैना, बसुदेवपुर, गंगापुर, मटेहिया, लक्ष्मणपुर जैसे स्थानो पर मोर्चा ने अपनी पकड़ नाकाबन्दी के बाद भी मजबूत बनाई । अधिकार के आन्दोलन में सहभागियों की संख्या में भी सुधार पाया गया है ।
विरोध सभा सहभागी होने वाले आम लोगों की तादाद अब यह तय कर चुकी है कि आन्दोलन निर्णायक दिशा में आगे बढ़ रहा है । सरकार जिस उम्मीद के संविधान संशोधन प्रस्ताव के बहाने आन्दोलन को समाप्त करना चाह रही थी, उससे बेहतर आन्दोलन के असार दिखाई पड़ रहे हैं ।
आन्दोलन को लेकर अन्य समुदाय भी सदमें से भरे हुये हैं । स्थानीय स्तर में फिर नाकाबन्दी जैसी भयावह स्थिति सृजना न हो यही सब की जुबान पर है । लेकिन राज्य की गम्भीरता को देखकर ऐसा नहीं लगता कि सामान्य आन्दोलन से वह झुक सकती है । मधेशी नेता अब भी जोश से भरे नजर आतें हैं, कार्यकर्ता भी उसी तुलना में प्रचार प्रसार और अभियान में लगे हैं ।
फत्तेपुर गाबिस में आयोजित सभा में बोलते हुये मोर्चा नेता कामता प्रसाद सोनखर ने कहा, अभी तक जो आन्दोलन हुआ वह सरकार की ओर से शक्ति परिक्षण था । अब मधेशवादी जनता बताएगी कि आन्दोलन का अर्थ क्या होता है ।
आन्दोलन का रुख मधेशवादी बिगाड़ना नहीं चाहते नेता राजेश वर्मा ने कहा, प्रशासन के द्वारा होने वाले घुसपैठ से आन्दोलन को बदनाम किया जाता, आन्दोलन को उग्र बनाकर दमन करने का प्रयास किया जाता है । नेपालगन्ज जमुनहा नाका पर पुलिस कारवाही में घायल हुये वर्मा ने कहा, अब आन्दोलन आरपार का होगा ।
सरकार की सहुलियत और जनता की चित्कार के सामने हमे आन्दोलन के स्वरूप को बदलना पड़ा । लेकिन आन्दोलन रुका नहीं जिले में रोजाना कहीं न कहीं सभा और विरोध होता ही रहा है । स्थानीय युवाओं के जोश और जाँगर में भी गिरावट नजर नहीं आती ।
अब कैसा हो आन्दोलन ?
पिछले दिनों नाकाबन्दी की समस्या को झेल चुके लोग अब शान्तिपूर्ण विना परेशानी वाले आन्दोलन की दुआ करते हैं । आन्दोलन जैसा भी हो लेकिन आम जनता के खाने और जीने में समस्या न हो ।
आन्दोलन के कारण बहुतों ने समय पर उपचार नहीं पाया, पाँच दर्जन लोग शहीद हुये । अभी हजारों की संख्या में लोग घायल हैं । पुलिस के आक्रमण में बहुतों का घर उजड़ गया ।, अब विकल्प क्या है ?
स्थानीय व्यवसायी हरि खत्री ने कहा, व्यापार व्यवसाय सब चौपट हो गया । नाकाबन्दी के विकल्प में अब आन्दोलन काठमाण्डौ केन्द्रित होना चहिए । जनता को बिना परेशान किए, सिर्फ सरकार और नेता प्रभावित हों इस प्रकार के आन्दोलन का डिजाइन होना चाहिए कि आन्दोलन जातीय न लगे ।
मधेशी समुदाय हो या पहाड़ी, खाना सभी को खाना पड़ता है, गैस सभी की जरुरत है स्थानीय व्यवसायी श्रीराम काफ्ले ने कहा, खाना पानी बन्द होने के हिसाब से आन्दोलन को रूप नहीं देना चहिए । सरकार के विपक्ष में जनता हमेशा रहती है लेकिन देश की दुर्दशा करने के हिसाब से न सरकार को काम करना चहिए न जनता को । अधिकार का जो सवाल है वह सरकार को पूरा कर देना चहिए क्योंकि मधेशी विदेशी नहीं है, वह भी नेपाली नागरिक हैं ।
नाकाबन्दी के बाद अब मुश्किल से देश की स्थिति सम्हल रही है व्यवसायी नीरज पोखरेल ने कहा, मधेशी जनता को भी वास्तविकता ध्यान में रखते हुए आन्दोलन करना चहिए । जितना भी अधिकार सम्पन्न हों लेकिन रहना इसी देश में है, समाज यही है तो दुश्मनी करके नहीं, हमारा साथ माँगिए आन्दोलन साथ साथ करेंगे । बस भारत के स्वार्थ के हिसाब से काम न हो यही डर बना रहता है ।
पीड़ा आन्दोलन का
सरकार के विभेदकारी व्यवहार से आजिज जनता अब भी आन्दोलन करने के लिए तैयार है, वजह बिना आन्दोलन मधेश को सरकार कुछ देना नहीं चाहती । संविधान संसोधन प्रस्ताव को दर्ता करने के बहाने सरकार सोचती थी कि आन्दोलन थम जाएगा लेकिन ऐसा दिखाई नहीं देता ।,
जिस प्रकार सरकार का वादा है, उसी प्रकार मधेशवादी दलो की तीब्र तैयारी है । आन्दोलन न किया जाए तो करें क्या ? सद््भावना पार्टी बाँके के अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण वर्मा ने कहा शक्ति प्रदर्शन किए बिना सरल स्वभाव को देखकर सरकार गिनती भी तो नहीं है मधेशियों को ।
आन्दोलन करने वाले लोग जनता से ज्यादा पीड़ित हैं, मोर्चा के नेता डिठ्ठा प्रसाद मौर्य ने बताया, हर्जा नुकसान और समस्या सब कुछ आन्दोलनकारियों के हाथ आता है । आन्दोलन अपने आप में ही एक संघर्ष है, जो आन्दोलन में गया शाम को वापस आए या नहीं इसकी भी ग्यारेन्टी नहीं होती । लोग इसके बावजूद भी साथ दे रहे हैं जनता के जज्बे को मानना पडेÞगा ।
जब देश में लोग होली मना रहे थे, उस समय मौर्य फत्तेपुर गाबिस क्षेत्र में प्रधामन्त्री का पुतला दहन करने में लगे हुए थे । त्योहारों में भी आन्दोलन का तेवर ठण्डा नहीं हुआ । लोग होली की जगह पुतला जलाए ।
अधिकार की लड़ाई है यह
यह अधिकार की लड़ाई है, किसी को जिताने या हराने की लड़ाई नहीं स्थानीय युवा सौरभ सिंह ने कहा, यहाँ अपनी आन बान और शान रक्षा के संघर्ष के लिए लोग आगे उतरे हैं । आन्दोलन कहीं कमजोर कहीं सशक्त जरुर रहा, लेकिन जो शिक्षा १० वर्ष में भी जनता को नहीं दी जा सकती थी वह कुछ महीनों के आन्दोलन ने सिखा दिया ।
लोग अपना वजूद और आत्म सम्मान खोजने लगे हैं, बराबर की हिस्सेदारी की बात करते हैं, व्यवहार में भी काफी परिवर्तन नजर आया । लोग खुद को मधेशी कहने में अब हिचकना छोड़ चुके हैं ।
युवा नेता राजेन्द्र विश्वकर्मा ने कहा, यहाँ लोग खुद को मधेशी नहीं कहना चाहते थे । आन्दोलन का असर और पाठ है कि आज सभी लोग गर्व के साथ मधेशी कहते है । पहाड़ी मूल के लोग जो मधेश में रहते हैं वह भी कुछ पल के लिए ही सही खुद को मधेशी कहने लगे हैं, आन्दोलन की यही उपलब्धि है ।
यह प्रण और व्यवहार जरुर एक दिन मन्जिल पाएगी । लेकिन उसके लिए कद आगे बढ़ाने की जरुरत है । सरकार को यह महसूस हो जाए की सिर्फ समुदाय विशेष से देश नहीं चलता । जनता को समान दृष्टि से देखनी शिक्षा अब जनता स्वयं सरकार को दे ।

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