उषा लेकर स्वर्णिम किरणें, कर रही तुम्हें वो शुभ प्रभात
मालिनी मिश्र , काठमांडू, ३ जुलाई, ।

शुभ प्रभात ! !
उषा लेकर स्वर्णिम किरणें,
कर रही तुम्हें वो शुभ प्रभात ।
देखो अधीर अध्खिले कोपिले,
खगकुल को भरते उन्मुक्त श्वास ।
ओसों की चमकीली बूंदे,
पत्तों पर करती हैं विलास ।
धुल गयी है सारी धरती,
खुल गया है सारा आकाश ।
अब समय नहीं कुछ खोने का,
निशा हो गयी है उदास ।
जीवन के स्वर्णिम मेले में,
नव नवीन इस बेले में ।
उषा लेकर स्वर्णिम किरणें,
कर रही तुम्हें वह शुभ प्रभात । ।


