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क्यूँ घोलते मन में ज़हर

 

क्यूँ घोलते मन में ज़हर

गंगेश कुमार मिश्रjawala
है बात ये सम्मान की,
पहचान की,
अधिकार की,
संघर्ष जो है चल रहा,
रुक रुक के आगे बढ़ रहा,
थमता हुआ लगता भले,
पर है सुषुप्त ज्वालामुखी ।।।
विस्फोट होगा एक दिन,
हो जायगा सब छिन्न भिन्न।
होगी धरा व्याकुल बहुत,
फ़िर देखते रह जाओगे,
सोचो ज़रा इक पल ठहर,
क्यूँ घोलते मन में ज़हर ?
हक़ है सभी का देश पर,
माँगा तो क्यूँ ढाया क़हर ?
संभलो है वक़्त बचा हुआ,
है रात्री का प्रथम प्रहर ।
है बात ये सम्मान की,
पहचान की,
अधिकार की,
संघर्ष जो है चल रहा,
रुक रुक के आगे बढ़ रहा,
थमता हुआ लगता भले,
पर है सुषुप्त ज्वालामुखी ।।।
विस्फोट होगा एक दिन,
हो जायगा सब छिन्न भिन्न।
होगी धरा व्याकुल बहुत,
फ़िर देखते रह जाओगे,
सोचो ज़रा इक पल ठहर,
क्यूँ घोलते मन में ज़हर ?
हक़ है सभी का देश पर,
माँगा तो क्यूँ ढाया क़हर ?
संभलो है वक़्त बचा हुआ,
है रात्री का प्रथम प्रहर ।

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