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हाय हाय पड़ोसी

 

व्यग्ंय बिम्मी शर्माnepal-china-india_20110807091317
हम अपने दोस्त या रिश्तेदार बदल सकते हैं पर पड़ोसी नहीं । इसीलिए पड़ोसी रिश्तेदार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है । रात बेरात घर में मेहमान आ जाए और चाय बनाने के लिए चीनी या दूध खतम हो जाए तो माँगने के लिए पड़ोसी ही चाहिए रिश्तेदार नहीं । हर इंसान अपनी औकात के हिसाब से पड़ोसी से चीनी, चाय या कुछ और मांगता रहता है । अब किसी के पास कार होगी तो वह पेट्रोल या डिजेल ही मागेंगा न ? सौ बात की एक बात यह है कि पड़ोस औेर पड़ोसी हर हाल में जरुरी है ।
चाहे प्रेम या दोस्ती करने के लिए हो या झगडा या ईष्र्या करने के लिए ही क्यों न हों एक अदद पडोसी सबको चाहिए ही । पड़ोसी न हो तो आपका घर पेंट करना बेकार है । न गाड़ी या कोई महँगा सामान खरीदना भी बेकार है । आप के सामान खरीदने पर पड़ोसी के मरोड़ उठे और आप के छींकने पर पड़ोसी खुश हो तब न मजा है जीने का । नहीं तो वही रुखी, सुखी बेस्वाद सी जिंदगी मे थोड़ा ही सही पड़ोसी ही रगं भरने का काम करता है । पड़ोसी ही हमें हमारी बुराईयों के बारे में बतला कर हमें गुस्सा दिलाता रहता है और हम चिड़चिड़े बन जाते हैं ।
पड़ोसी और पड़ोसन, पड़ोसन और पड़ोसी दोनों एक दूजे के लिए बने होते है । आप के पड़ोस में कोई सुंदर महिला पड़ोसन बन कर आ जाए । तब तो माशाअल्लाह आप के पौ बारह हो जाते हैं । दिन या हप्ता नहीं आप की जिदंगी ही मजे से कट जाती है उस सुदंर पड़ोसन देख और ताकझांक कर के । उस पर सोने में सुगधं यह हो जाता है कि वह सुदंर पड़ोसन आप के घर कुछ मांगने आ जाए । वह जो मांगती है वह तो आप देगें ही और जो नही मागंती है वह भी देने के लिए आप उतावले हो जाते हैं । क्योंकि उस पड़ोसन को देख कर आपका दिल बल्लियों उछलने लगता है ।
पड़ोसन का बच्चा आप के लिए आप के अपने बच्चे से भी ज्यादा प्यारा हो जाता है । आप गाहे, बगाहे उस को दुलारते रहते है और छुपा कर उस के लिए टांफिया लाना आपका परम कर्तव्य हो जाता है । जाड़े में ठंड ज्यादा बढ़ने पर आंगन या छत में धूप सेंकने के बहाने पड़ोसन की सुंदरता को अपने आंख से सेंकना कम रोमाटिंक बात नहीं है । अब सूर्य भगवान की तरफ आंख कर के उन के ताप को तो आप सेंक नहीं सकते । तो जाहिर सी बात है पड़ ोसन हीआप के लिए सूरजमूखी बन जाती है । पड़ोसन के घर की तरफ ताकाझांकी करते समय यह डर भी रहता है और यह ख्याल भी रखना पड़ता है कि कहीं उसका पिता या पति आपका पत्ता ही साफ न कर दे ।
हम या हमारा देश भी पडोसियों से घिरे हुए है । यह पड़ोसी जितना हमारा बुरा नहीं सोचते हम खुद ही इन के बारे में बुरा सोच सोच कर कुठिंत बन जाते हैं । हमारे उत्तर और दक्षिण में दो अदद महान पड़ोसी विराजते हैं । जिन्हे हम हर सुबह और शाम कोसते रहते है । सुबह उत्तर की तरफ मुंह कर के थूकते हैं तो शाम को शराब का जाम हलक में उतार कर दक्षिण के पड़ोसी को खूब खरीखोटी सुनाते और कोसते है । यही हमारा धरम और भरम है कि हम दोनों को ही अपना दुश्मन समझते हैं ।
दोनो पड़ोसी अपन ाऔर अपने देश का विकास करने में तल्लीन है । पर हम तो न अपना विकास करते है न दूसरों का विकास ही सह सकते है । इसी लिए गढ्ढा खोद कर इन पड़ोसियों की हालत खराब करना चाहते हैं । पर अन्त में हमारी खुद की हालात खस्ता हो जाती है । क्योंकि हमें पडोसियों से चिढ़ने की बिमारी है । अपने घर या देश में कुछ भी बिगड़ता है तो हम आनन्, फानन् में इस का इल्जाम अपने पड़ोसी पर लगा कर गंगा नहा लेते है । अपना बिगड़ा हुआ खुदनहीं बना सकते और पड़ोसी से उम्मीद करते हैं कि वह आ कर बिगड़ा हुआ काम बना दे । जब वह नहीं बनाता तो हम उसी के मत्थे अपने सारे बिगडेÞ हुए काम को मढ़ कर खुश हो जाते हैं ।
हम दक्षिण के पड़ोसी भारत को धोती कहते हैं तो उत्तर के पड़ोसी चीन को चोली या ब्लाउज क्यों नहीं कहते ? और खुद को पेटिकोट मान कर क्यों नहीं चलते ? पेटिकोट की गंदगी को तो आखिर उपर से पहना गया धोती ही छुपाता है न ? चोली भी अगर कहीं से थोड़ी सी फट गई हो तो उस को भी धोती या उस का आँचल ही अपने मे छुपा लेता है । हम सिर्फ भारतियों को ही नहीं अपनी ही जमीन पर पैदा हुए मधेशी या काले वर्ण के लोगों को भी धोती या बिहारी कह कर तिरस्कार करते हैं । हमारा राष्ट्रवाद का काम्बिनेशन क्या गजब का है कि उत्तर की ओर से चलने वाली हवा सुहानी और स्फूर्ति दायक और दक्षिण की हवा विषैली । यह भारतीय धोती, चीनीं या ब्लाउज और नेपाली पेटिकोट के गजब के त्रिकोणीय राष्ट्रवाद में यह देश धंसता जा रहा है । पर किसी र्को स की फिक्र नहीं है ।
हम पड़ोसी तो अच्छा और अपने दुख, सुख में काम आने वाला चाहते तो है पर खुद अच्छा पड़ोसी बनने की काविलियत नहीं रखते । हां अच्छा बनने का स्वागं जरुर रचते हैं । हम चाहते हैं पडोसी हमारे लिए त्याग करें, सहयोग भी करें पर खुद स्वार्थी और असहयोगी बन कर पल्ला झाड़ने लगते हैं । रोटी एक हाथ से नहीं बनती न ताली ही एक हाथ से बजती है । हां एक हाथ से दीवार पर जोर से मारा जा सकता है । और हम सालों से वही कर रहे हैं । अपने पड़ोसी के प्रगति और सुख को देख कर जल भुन रहे हैं । बौखलाया हुआ आदमी सिर्फ दीवार पर सिर पीट सकता है या हाथ मार सकता है । हम पड़ोसियों के अच्छे गुण को नहीं स्वीकारते या अपनाते । बल्कि उन के अच्छे गुणों को दबा कर अवगुणों को बढ़ा, चढ़ा कर पेश करते हैं । हमारी मीडिया भी सालों सें यही कर रही है । उन के अवगुणों की बखिया उधेड़ कर हम खुदही स्वघोषित महान बन कर एक “अच्छे पड़ोसी” का परिचय दे रहे हैं । क्योंकि हमें विरासत में अपने पुर्खों से दूसरों की बखिया उधेड़ने का काम ही मिला है

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