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बाढ़ से बदहाल जिन्दगी आखिर कब तक ?

 

विनय दीक्षित
पिछले हपm्ते पहाड़ों पर भारी बारिश के कारण तराई एक बार फिर बाढ़ की त्रासदी से दहल उठा । चारों तरफ सिर्फ अपरातफरी का माहौल था । जिले में राप्ती नदी ने बाढ़ के पिछले पाँच वर्षो के रिकार्ड को तोड़ दिया है । वर्षा के कारण जिले में हड़कम्प मच गया है । राप्ती नदी ८.२४ मीटर अर्थात खतरे के निशान से करीब साढेÞ ३ मीटर उपर बह रही थी । जिला प्रशासन ने बाढ़ की पूर्व सूचना के लिए जल मापन केन्द्र की स्थापना कर रखी है ।
नेपाल रेडक्रॉस सोसाइटी गंगापुर शाखा के कोषाध्यक्ष बिक्रम प्रसाद बर्मा ने बताया । सामान्य रूप में बाढ़ को राप्ती आसपास क्षेत्र के लिए जोखिमयुक्त माना जाता है । बरसात के मौसम में तटीय क्षेत्र के लोग कभी भी अनुचित अवस्था उत्पन्न होने के अन्देशे में रहते हैं ।
बर्मा ने बताया पानी ५.४० से जब भी उपर बढ़ता है तो पूर्व सूचना प्रणाली स्वतः सभी सेन्टरों में सूचना प्रवाह कर देता है । वह सूचना प्रशासन के अधिकारी, पुलिस और जिला दैवी प्रकोप उद्धार समिति के पास पहुँचते ही अधिकारी हरकत में आते हैं । इस सूचना प्रणाली के कारण राहत और बचाव का काम तीब्र गति से सम्भव होता है । लेकिन, अब लोग यह सवाल उठाने लगे हैं कि पिछले २० वर्षों से सरकार सिर्फ बचाव, उद्धार और राहत वितरण पर क्योें केन्द्रित है ? इस विषय पर जब बाढ़ प्रभावित इलाकों में सवाल खडेÞ होने शुरु हुए तो तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के केन्द्रीय सदस्य पशुपति दयाल मिश्र होलिया, फत्तेपुर, गंगापुर, बेतहनी, मटेहिया जैसे क्षेत्रों में पहुँच कर लोगों से बातचीत की और जाना कि लोगों की वास्तविक माँग क्या है ।
जिला अधिकारी, पुलिस और अन्य राजनीतिक पार्टीयों के दस्ते और नेता भी बाढ प्रभावित क्षेत्रों में लगातार बचाव और उद्धार पर केन्द्रित रहे । वहीं सेना ने करीब ६ सौ लोगों का हवाई साधनों से उद्धार किया । पुलिस और सशस्त्र पुलिस का थल दस्ता भी नदियों में निरन्तर तैनात रही, भारी सतर्कता के कारण मानवीय क्षति जिले में नहीं हुई । बाढ़ में आए रेत के कारण करीब २०० हेक्टर उपजाउ जमीन मरुभूमि में परिणत हो गई ।
हर बार जब बरसात में बाढ़ के कहर से लोगों का आशियाना उजड़ जाता है, तब सरकार पीड़ितों की संख्या अनुमान करनें में लगी रहती है । इसके बाद राहत के नाम पर कुछ चावल दाल और बिस्कुट, अधिक क्षति होने वालों को करीब ५ हजार रुपये । बस इसी हकीकत से सामना पीड़ितों का हर बार होता है । लेकिन अब बस । सरकार हमें राहत न दे । यह जबाब जब प्रभावित क्षेत्रों से उठे तो प्रशासन और राजनीतिक दल नेता सभी सदमें में आ गए ,। नेता पशुपति दयाल मिश्र ने हिमालिनी से बातचीत में बताया कि बाढ़ से वर्षों का नाता है हमारा । उन्होंने कहा कि, हम हर बार देखते हैं सरकार चन्द रुपये और खाद्यान्न बाँटकर मुख्य और गम्भीर समस्या से पलड़ा झाड़ लेती है ।
प्रशासन ने २०६३ साल में बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होलिया के ५०० घर परिवार को स्थानीय झोरा सामुदायिक वन में स्थानान्तरण तो किया, लेकिन पीड़ितों को वहाँ भी सुकुन नहीं बदहाली ही मिली । जिस जमीन में लोग अस्थायी रूप से रहते हैं, उस जमीन की कोई आधिकारिक कागजात पीड़ितों के पास नहीं ।
होलिया के पीड़ित हरबक्स यादव ने कहा, इस सामुदायिक वन में स्थापित होने के बाद लगा था अब समस्याएँ समाधान की ओर हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ । खेत रहा नहीं, वह नदी में समा गया, यादव ने हिमालिनी से कहा, अब सरकार ने जमीन दी है लेकिन वह जनता को मिली नहीं । हवा में ही सरकारी स्थानान्तरण स्थापित है । प्रति वर्ष प्रभावित क्षेत्र और पीड़ितों की संख्या में इजाफा ही होता है । सरकार समय पर न तो तटबन्ध करती है, और न ही इस समस्या पर बरसात के अलावा किसी समय चर्चा होती है । राहत और उद्धार के बाद सरकारी अधिकारी भी अपने दायित्व से मुकर जाते हैं । नेताओं से सिर्फ आश्वासन मिलता है, सरकार सिर्फ भाषण करती है ।
जब जिला अधिकारी चारों तरफ से घिरे तो उन्होंने आपातकालीन बैठक बुलाई और सर्वपक्षीय रूप से बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के समस्याओं को समाधान करने का प्रयास किया । लोकिन बात सिर्फ प्रशासन से ही हल नहीं हो सकती । बाढ़ पीड़ितों ने सवाल उठाया, क्या स्थानान्तरण समस्या का समाधान है ? जबाव किसी के पास नहीं । राप्ती नदी बरसात के समय में ही अपना असली रूप धारण करती है, बाँकी समय में सरकार चाहे तो गाँव की सुरक्षा के लिए तटबन्ध कर सकती है लेकिन समस्या पिछले २० वर्षों से बरकरार है । जिला अधिकारी रविलाल पन्थ ने कहा, हम जनता की एक एक समस्या सरकार को बताते हैं, सरकार समस्या समाधान के लिए प्रयासरत भी है ।
कैसे सम्भव होगा समाधन ?
तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के केन्द्रीय सदस्य पशुपति दयाल मिश्र ने कहा, सरकार यदि चाह ले मन से तो समस्या एक वर्ष में ही समाधान हो सकती है । उन्होंने कहा, काम न करना या करने से मुकर जाना ही राप्ती समस्या की जड़ है ।
विश्व में बड़ी बड़ी नदियों को सामान्य दायरे में समाहित कर दिया गया है, मिश्र ने कहा राप्ती जैसी छोटी नदियों के विषय में सरकार को इतना समय खर्च नहीं करना चाहिए कि बरबाद होने को कुछ बाकी न बचे ।
पक्का तटबन्ध ही समस्या समाधान का मुख्य उपाय है । बाकी विषय सिर्फ समस्या को टालना मात्र है नेपाली काँग्रेस के जिला सदस्य राम कुमार बर्मा ने कहा, बाँध के विषय पर सरकार विचार ही नहीं बनाती ।
बर्मा ने कहा, फत्तेपुर वार्ड नं.२ फरेँदा स्थिति राप्ती कटान तीब्र है । प्रशासन में कारवाही के लिए निवेदन भी दर्ता किया गया, लेकिन फायदा कुछ नहीं । उन्होंने आगे कहा, यहाँ तो सरकार अदालत का आदेश भी नहीं मानती ।
स्थानीय लोगों ने ठोस समाधान के लिए १५ दिन का समय दिया है । बाँध, कटान नियन्त्रण और कृषि भूमि संरक्षण के लिए प्रभावित क्षेत्र के लोगों ने प्रशासन घेरकर सरकार पर दबाव बनाया । लेकिन अब देखना यह बाकी है कि सरकार कितना जागती है इस दबाव से । राप्ती की बाढ़ के कारण जिले में करीब एक लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते रहे हैं ।

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