तन्हाईयाँ :मनीषा गुप्ता
जिंदगी एक ऐसा सफर जिसमें राह में अनेक लोगो से मुलाकात होती है । कुछ अपने से मिलते हैं कुछ पराए पर फिर भी दिल को एक ऐसे साथ की तलाश होती है जिसके साथ वो अपने एहसासों को जी सके कुछ ख़ास हो वो जिसके लिए ।
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” रात का सफ़र और यह तन्हाइयां
क्यों इतनी दूर निकल आए हम
तन्हा तन्हा से हम तन्हा तन्हा सा सफ़र
यह उदासी का आलम यह खौफ़नाक मंजर
जुगनुओं का जगमगाना एक भयावाह सी सरसराहट
रात के अँधेरे को चीरती दो चमकीली आँखें…….
जैसे पीछा कर रही हों मेरी तन्हाई का
सीने में उठता एक तूफ़ान क्यों हैँ आज हम
इतने तन्हा …………………………
कोई तो होता जो दो कदम का साथ तो देता
तो यह सफ़र आज यूँ इतना तन्हा न होता
यूँ तो राहे सफ़र में हमराह भी थे फिर क्यों
यह सफ़र तन्हा गुज़रा …………………….
क्यों शबनमी रात में तन्हा सा सफ़र है
क्यों सहेज़ कर रखे मुहब्बत के वो पल हैं
क्यों तन्हा यह रात है ?
क्यों तन्हा हर बात है ?
क्यों तन्हा हर साज़ है ?
क्यों चाँदनी आज उदास है ? “


