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पितरों की मुक्ति काशी के बिना अधूरी

 

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ये वक्त है पूर्वजों का ऋण यानी कर्ज उतारने का। इसीलिए पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध पक्ष में तर्पण जरूर करना चाहिए। इस दौरान पूर्वजों की मृत्युतिथि पर ही तर्पण करें। इन दिनों यानी भाद्रपद महीने के कृष्णपक्ष के पंद्रह दिन पितृपक्ष में दान की महिमा को भी श्रेष्ठ बताया गया है।

कहते हैं त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ के मरने के बाद यहीं पिंडदान किया था। यहां सीताकुंड नाम से एक मंदिर भी है।

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पितरों के मुक्ति काशी के बिना अधूरी है। काशी के प्राचीन पिशाच मोचन कुंड के नजदीक त्रिपिंडी श्राद्ध होता है। त्रिपिंडी श्राद्ध पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद होने वाली व्याधियों से मुक्ति दिलाता है। श्राद्ध की इस विधि और पिशाच मोचन तीर्थस्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी मिलता है।

मध्यप्रदेश के जबलपुर के ग्वारीघाट में नर्मदा के तट पर लोग पितरों के लिए पिंडदान करते हैं, जो श्राद्ध के लिए तय 55 स्थानों में शामिल है। उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के सोरो में पिंडदान के लिए भारी भीड़ जुटती है।

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ऐसा माना जाता है कि सृष्टि की रचना करने वाले भगवान विष्णु के अवतार वारह ने यहीं अवतार लिया था। यहीं असुर हिरण्याक्ष का भगवान वराह ने वध किया था। इसके बाद भगवान ने एकादशी के दिन यहीं पर अपना पिंडदान किया था।

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