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मधेश की सभ्यता-संस्कृति पर कटाक्ष क्यों ? मुरलीमनोहर तिबारी

 

मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु), बीरगंज, १७ अक्टूबर |

मधेश का कोई देहाती अगर किसी कार्यालय में जाता है, तो उसे बोली, भाषा, पहनावा, शिक्षा, हैसियत और औक़ात दिखाकर, हर प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है, उसे हर प्रकार से अपमानित किया जाता है। उसे इतना अपहेलित किया जाता है कि हीनता बोध ख़ुद उसके ज़ेहन में घर कर जाता है। कमोबेश यही हालत मधेश के शिक्षित-सभ्य लोगों के साथ भी होता है, उसमें हमारी सभ्यता-संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान पर कटाक्ष होता है।

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अगर आप कभी हरियाणवी जाट से मिले और उनकी बातें सुनें तो लगेगा वे लाठी लेकर आपको मारने वाले है। लेकिन उनकी लठमार बोली-भाषा, रहन-सहन, खान-पान को लेकर कोई इनका तिरस्कार नही कर पाता। इसका पहला कारण है, वे इनसब पर ख़ुद को देहाती नहीं मानते, बल्कि इस पर गर्व करते है। दूसरा कारण है कि भले वे खेती करते है, लेकिन उसमें नुकसान नही उठाते, मुनाफा कमाते है, उनके घर की औरतें चूल्हा-चौका-पशु पालन के साथ सामाजिक कार्य में बेधड़क जाती है। तीसरा कारण है, भारत की आजादी के बाद नई दिल्ली का निर्माण कार्य के चलते ज़मीन के भाव बेतहासा बढे जिसका लाभ इन्हें मिला और विकास हुआ।

मधेश में ठीक इसका उल्टा होता है, हम ख़ुद किसी कार्यालय में भोजपुरी, मैथली, हिन्दी में बोलने में शर्मिन्दगी महसूस करते है, हमें लगता है अपने भाषा में बोलने पर हमारा कार्य नही होगा। हम हिम्मत करे तो सीडीओ, एस पी भी हमारे जुबान में बात करेंगे। हमलोग अपना पारम्परिक कार्य स्वेच्छा से नही मज़बूरी से करते है, खेतो में काम करते, गोबर उठाने में  देखते है, कोई देख तो नही रहा है। ख़ुद के काम में शर्म महसूस करते है।

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नेपाल के यही कर्मचारी अगर भारत के समकक्षी से मिलते है, तो पहाड़ियों के बोली, भाषा, पहनावा, शिक्षा, हैसियत और औक़ात पर सवाल उठता है। भारत में नेपाली का मतलब चौकीदार भी माना जाता है, वहा हमारी हैसियत इतनी ही होती है, वही नेपाल में आते ही हम भूल जाते है, की दुनिया की नज़र में हम कुछ नही है, और अपने देश में अपनों के ऊपर रौब झाड़ते है। एक ही पद वाला भारतीय एस पी और नेपाली एस पी में ज़मीन आसमान का फ़र्क दिखता है, जबकि दोनों का कार्य एक ही है। हाँ दोनों में अंतर है तो इनके तनख़ाह का। यही अंतर दोनों के रुआब में भी दिखता है। किसी दलित को सवर्ण के सामने ऐसे ही व्यवहार का सामना करना पड़ता है। ऐसा ही किसी भी व्यक्ति को अपने से कामयाब और धनी व्यक्ति के सामने, ऐसे ही अपमान, तिरस्कार का भय रहता है।

अगर आप कभी किसी दूसरे देश के दूतावास में जाएं तो नेपाल के लोगो से उसी प्रकार का व्यवहार करते देखेंगे, जैसा व्यवहार पहाड़ी तंत्र मधेश से करता है। नेपाल के नेता भारत जाए तो इसी व्यवहार का सामना करना पड़ता है, और जब भारत के नेता अमेरिका जाए तो उनके साथ भी यही व्यवहार होता है, भारत के केंद्रीय मंत्री के पुरे कपड़े उतरवा कर जांच किया गया, सर्वविदित है। यही हालात हरेक विकासशील देशों के साथ विकसित देशों का होता है। इन बातों का क्या अर्थ हो सकता है, क्या बड़े, शक्तिशाली, सत्ताधारी होने का यही अर्थ होता है, या यो समझें बड़ी मछली को छोटी मछली खाने का हक़ है, या यों कहें जिसकी लाठी उसकी भैस।

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अगर यही दुनियादारी के नियम है तो, इसे तो जंगल राज कहना होगा, क्योकि जंगल में जो ताकतवर होता है, उसी की चलती है, जबकि इसके उलट होना ये चाहिए, की जो पिछड़ा है, जो असभ्य है, जो कमजोर है, उसे ऐसा व्यवहार करना चाहिए। उस पर सभ्य देशों के एनजीओ ग़रीब देशों को सभ्य बनाने का दावा करते है। इन दावो के अंदर वे अपने देश का कचरा मदद के नाम पर गरीब देश को देते है और उस देश का दोहन करते है। इसका अर्थ ये है की शक्तिशाली देश जो करे सब ठीक है, “सुमिरथ को ना दोष गोसाइँ”। इसी सिद्धान्त को आधार माना जाए तो जरुरी सिर्फ शक्तिशाली होना है, लेकिन कौन सा मार्ग ये महत्वपूर्ण नहीं है।

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इतिहास की कोई भी घटना ले लीजिए, उसमे विजेता की बिरगाथा ही होती है, बिजेता अपने अनुसार इतिहास लिखाते है, जिसमें सत्यता नही होती। फिर “सत्य”, “इंसाफ” जैसे शब्द काग़जी कल्पना मात्र प्रतीत होते है। मधेश को भी अधिकार तब ही मिल सकते है, जब वो खुद मुख़्तार होने की शक्ति अर्जित कर पाएगा। पहाड़ी सरकार के आगें गिड़गिड़ाने और एम्बेसी के अंगुलियो पर नाचने से कुछ हासिल होने वाला नही है। मधेश के सभी जाती को जोड़ने वाला दल हो, जो मधेश की मुक्ति के लिए घर-घर जाकर मधेशी आवाम को जागरूक और संगठित कर सके।

 

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