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विप्लव की बन्दी और राज्य की मन्दी मधेश के खिलाप कहीं छल तो नहीं ? कैलाश महतो

 

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कैलाश महतो,परासी, २९ कार्तिक |
विप्लव के नेपाल बन्द के क्रम में मधेश भी बन्द रहा । छठ पर्व में महोत्तरी के सोनमा अपने घर होने के कारण करीब दो सप्ताह तक संसार के सारे संचार एवं समाचारों से दूर रहने के बाद परासी आने के कल्ह होकर विप्लव का नेपाल बन्द । एक स्यालून में बाल कटाते समय एक मधेशी यूवा का आवाज निकला, “का हाल बा ? देखल जाय, बन्द आव्हानकर्ता के एक भी मनई नाहीं होएला के बाद भी पूरे बाजार बन्द बा । कहा ब्ँँ मधेशी दल के नेता लोगन ?” साथ में उन्होंने दो बातें और जोडी, “एही बाजार के जब कौनो मधेशी दल बन्द करैहें, तब मधेशिये लोग बन्द करेके नाही मानिहें । मगर पहाडी पार्टी के एको मनै के बिना भी बाजार में सन्नाटा छा जाला ।”
उस यूवा के बातों पर गौर करें तो उसमें उनका प्रश्न, कौतुहलता, जिज्ञासा, चिन्ता, विद्रोह और समाधान के रास्ते भी मौजुद हैं । आखिर कारण क्या है कि मधेशी पार्टिया“ जब मधेश बन्द करती है तो नेपालियों के पकड में रहे मधेश तो बन्द होने से रहता है, मधेशी बाहुल्य के क्षेत्रों तथा इलाकों में समेत मधेश बन्द फिका पड जाता है ? और हम और हमारे दल के नेता तथा नेतृत्वों ने इन कारणों पर कभी ध्यान ही देना उचित नहीं समझा ।
एक समान्य सी बात है कि व्यतिm, समाज या समुदाय उस शक्ति या संगठन से ज्यादा भयभित रहता है जो भूतप्रेत जैसे अज्ञात हों या फिर किसीके बारे में कम जानते हों या वो सर्व कालिन ईश्वर जैसे सर्व शक्तिशाली हों ।
तीनों बातों में से एक बात पक्का है कि नेपाली शासन सर्वकालिक और सर्वकालिन नहीं है । हा, एक बात निश्चित है कि आम मधेशी लोग इनके बारे में कम जानते हैं या उन्हें पिशाच मानकर त्रसित रहते हैं । किसी किसी पिशाच के पास भी कुबेर सा दौलत का खजाना होने के कारण भी लोग उसके आशतिm में बन्ध जाते हैं । मगर किसी को करोडों की जायदाद की मालिक बना देने के बाद भी वह पिशाचीय सम्पति लक्ष्मी के आशिर्वादों से प्राप्त सम्पतियों सा टिकाउ और सुखदायी नहीं हो सकता । और जो लोग यह जान लेते हंैं, वे कभी पिशाच के सामने न हाथ फैलाते हैं, न डरते हैं । दूसरी बात, आम मधेशी नेपालियों के बारे में बहुत कम जानते हैं जिसके कारण वे डर के भ्रम में जिने को बाध्य हैं । और इन दोनों भ्रमों का इलाज है कि मधेशी लोग यह जान लें कि पिशाच चाहे जितना भी शतिmशाली हों, उसे हिम्मत रखने बाला एक आम आदमी ही खदेडकर भगा देता है । उनके बारे में अच्छे से जान लें कि वे आखिर डर क्य“ू पैदा करते हैं तो उनकी सारी समस्याओं का हल निकल जायेंगे । क्य“ूकि शासन कभी साहसी और हिम्मत बालों पर नहीं होता, कमजोर और डर पर ही होता है ।
नेपाली शासक मधेशियों के बन्दी को नहीं मानने और उनके राजनीति से नहीं डरने का सबसे अहम कारण यही है कि सदियों से उनके साथ रहकर उनका हर चीज जान चुका है । जिस रोज मधेशी अपने रुप को बदल लें, अपने चरित्र को बदल लें, साहस कर लें और डर को शर से फेंक दें, मधेश का आजादी तत्क्षण और उसी क्षण उभरकर खडा हो जायेगा और वे स्वतन्त्र हो जायेंगे । मधेशियों का लालपूर्जा मिल गई है । उन्हें बस्, शान्तिपूर्ण रुप में लडना होगा और अपने देश की भूमि को वापस लेने के लिए आगे बढना होगा ।
मधेशी जनता, नागरिक समाज, राजनीतिक पार्टिया“, बुद्धिजिवी एवं पत्रकार, शिक्षक एवं प्राध्यापक, यूवा एवं विद्यार्थी तथा समाज के हरेक तह और तप्कों को इन बातों पर ध्यान देना होगा कि नेपाल बन्द के नाम पर मधेश समेत को बन्द करने बाले विप्लव ही नहीं, शान्तिपूर्ण तथा सशस्त्र युद्ध की धम्की देने बाले हर नेपाली राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा शैक्षिक आन्दोलनों का वर्तमान में एक ही उद्देश्य है मधेश में होने बाले हर आन्दोलन को मत्थर करना – वो आन्दोलन चाहे संघीयता से सम्बन्धित हो या फिर स्वतन्त्रता से । और उन सारे आन्दोलन का खर्च उन्हें नेपाल सरकार ही उपलबध कराती है जिसकी खुलासा नेपाल सरकार के एक पूर्व अधिकारी ने कर चुका है ।
नेपाली पार्टी या किसी संगठन द्वारा नेपाल बन्द के नाम पर नेपाली शासन यह परीक्षण करता है कि मधेश उसके अन्दर है या नहीं । मधेश किधर जा रहा है ः संघीयता के ओर या स्वतन्त्रता के तरफ ? नेपाली शासक सरकार चलाता है और उसके सहयोगी सरकारों को सुरक्षा मुहैया कराती है । वे मधेश को जा“च करता है कि मधेश का तापमान क्या है ? उसके लिए नेपाल सरकार चित्र बहादर के.सी, बाबुराम भट्टराई, इसान, वैद्य, विप्लव आदि को अपने राज्यकोष से भरण पोषण और कथित आन्दोलन का नाटक मञ्चन कराया जाता है ।
संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का प्रयोग कर झापा, मोरङ्ग, सुनसरी, कंचनपुर और कैलाली को मधेश प्रदेश में ले जाने के लिए वहा“ के जनता के बीच जनमत संग्रह की बात करने बाले नेपाली शासकों के अनुसार ही मधेशी जनता नेपाली या मधेशी बनकर रहना चाहता है के मुद्दे पर जनमत संग्रह की मा“ग शान्तिपूर्ण एवं लोकतान्त्रिक पद्धति के साथ हो की आग्रह करने बाले स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन के नेता कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करना, मानसिक और शारीरिक कष्ट देना और उनके उपर देशद्रोह के मुद्दे लगाये जाते हंै । वहीं पर बन्दुक के साथ सभा सम्मेलन करने तथा सशस्त्र युद्ध की धम्की देने बाले विप्लव को नेपाल बन्द करने को छुट देने और नेपाली राज्य द्वारा उनके विरोध में प्रशासनिक कार्यवाही में होता मन्दी यही स्पष्ट करता है कि सरकार से लेकर विप्लवतक मधेश के साथ कहीं छल तो नहीं कर रहा हैं ? क्य“ूकि नेपाल सरकार ने मधेशी दलों से यह ग्यारेण्टी की माग कर चुकी है कि उन दलों का मा“ग पूरा हो सकता है जब वे यह ग्यारेण्टी करें कि मधेश में अब दूसरा कोई आन्दोलन नहीं होगा ।

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