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मकर संक्रांति २०१७ शनिवार को जानें शुभ मूहूर्त

 

radhakrishna shastri

१३ , जनवरी | मकर संक्रांति का पर्व वर्ष २०१७ में १४ जनवरी शनिवार को मनाया जाएगा। संक्रांति के दिन पुण्य काल में स्नान , दान देना, एवं सूर्योपासना करना शुभ माना जाता है। इस साल यह शुभ मुहूर्त १४ जनवरी शनिवार को सुबह 7 बजकर 50 मिनट से लेकर सायं 05 बजकर 57 मिनट तक का है।

मकर संक्रान्ति २०१७ :-

सूर्य का मकर राशि में प्रवेश मकर संक्रान्ति रुप में जाना जाता है. १४ जनवरी २०१७ शनिवार के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहे  है. इस पर्व को दक्षिण भारत में तमिल वर्ष की शुरूआत इसी दिन से होती है. वहाँ यह पर्व ‘थई पोंगल’ के नाम से जाना जाता है. सिंधी लोग इस पर्व को ‘तिरमौरी’ कहते है. उत्तर भारत में यह पर्व ‘मकर सक्रान्ति के नाम से और गुजरात में ‘उत्तरायण’ नाम से जाना जाता है. मकर संक्रान्ति को पंजाब में लोहडी पर्व, उतराखंड में उतरायणी, गुजरात में उत्तरायण, केरल में पोंगल, गढवाल एवं बिहार में खिचडी या तिला संक्रान्ति के नाम से मनाया जाता है.

मकर संक्रान्ति के शुभ समय पर हरिद्वार, काशी आदि तीर्थों पर स्नानादि का विशेष महत्व माना गया है. इस दिन सूर्य देव की विशेष  पूजा – उपासना भी की जाती है. शास्त्रीय सिद्धांतानुसार सूर्य पूजा करते समय श्वेतार्क तथा रक्त रंग के पुष्पों का विशेष महत्व है इस दिन सूर्य की पूजा करने के साथ साथ सूर्य को अर्ध्य देना चाहिए.

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मकर संक्रान्ति दान महत्व :-

मकर संक्रान्ति के दिन दान करने का महत्व अन्य दिनों की तुलना में बढ जाता है. इस दिन व्यक्ति को यथासंभव किसी गरीब एवं जरुरत मंद को अन्नदान, तिल , ऊनी वस्त्र,  गुड एवं अन्य वस्तुओं का दान करना चाहिए. तिल या फिर तिल से बने लड्डू या फिर तिल के अन्य खाद्ध पदार्थ भी दान करना या खिलाना  शुभ रहता है. धर्म शास्त्रों के अनुसार कोई भी धर्म कार्य तभी फल देता है, जब वह पूर्ण आस्था व विश्वास के साथ किया जाता है. जितना सहजता से दान कर सकते है, उतना दान अवश्य करना चाहिए.

मकर संक्रान्ति पौराणिक तथ्य :-

मकर संक्रान्ति के साथ अनेक पौराणिक तथ्य जुडे हुए हैं जिसमें से कुछ के अनुसार भगवान आशुतोष ने इस दिन भगवान विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था. इसके अतिरिक्त देवताओं के दिनों की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है ,
सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्री व उतरायण के छ: माह को दिन कहा जाता है. महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था,

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कहा जाता है कि आज ही के दिन गंगा जी ने भगीरथ के पीछे- पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी. इसीलिये आज के दिन गंगा स्नान व तीर्थ स्थलों पर स्नान दान का विशेष महत्व माना गया है. मकर संक्रान्ति के दिन से मौसम में बदलाव आना आरम्भ होता है. यही कारण है कि रातें छोटी व दिन बडे होने लगते है. सूर्य के उतरी गोलार्ध की ओर जाने बढने के कारण ग्रीष्म ऋतु का प्रारम्भ होता है. सूर्य के प्रकाश में गर्मी और तपन बढने लगती है. इसके फलस्वरुप प्राणियों में चेतना और कार्यशक्ति का विकास होता है.

सूर्य उत्तरायण पर्व :-

सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना “संक्रान्ति” कहलाता है अत: इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को “मकर संक्रान्ति” के नाम से जाना जाता है. भविष्य पुराण के अनुसार , मकर–संक्रान्ति के दिन देव भी धरती पर अवतरित होते हैं, आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है, अंधकार का नाश व प्रकाश का आगमन होता है. इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व है.  इस दिन गंगा स्नान व सूर्योपासना पश्चात गुड़, चावल ,  तिल,  गौ, धार्मिक पुस्तक,  एवं अन्य उपयोगी वस्तुओं के साथ साथ वस्त्र  का दान श्रेष्ठ माना गया है

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मकर संक्रान्ति के दिन खाई जाने वाली वस्तुओं में जी भर कर तिलों का प्रयोग किया जाता है. तिल से बने व्यंजनों की खुशबू मकर संक्रान्ति के दिन हर घर से आती महसूस की जा सकती है. इस दिन तिल का सेवन और साथ ही दान करना शुभ होता है. तिल का उबटन, तिल के तेल का प्रयोग, तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल मिश्रित जल का पान, तिल- हवन, तिल की वस्तुओं का सेवन व दान करना व्यक्ति के पापों में कमी करता है ।   आचार्य राधाकान्त शास्त्री,बेतिया, पूर्वी चंपारण,बिहार, भारत।

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