टाइटैनिक:मिथक और सच्चाई
जेम्स कैमरन की 1997 मशहूर फिल्म टाइटैनिक का 3 डी संस्करण गुरुवार को रिलीज हुआ है.
ये फिल्म आरएमएस टाइटैनिक नाम के जहाज की कहानी है, जो इंग्लैंड में साउथहैम्पटन से अमरीका में न्यूयॉर्क की अपनी पहली यात्रा के दौरान 14 अप्रैल 1912 को हिमखंड से टकरा कर अटलांटिक महासागर में डूब गया था.

इस हादसे में 1500 से ज्यादा पुरुष, महिलाएं और बच्चों की मौत हुई थी. टाइटैनिक के डूबने से पहले के घंटों के में असल में क्या हुआ, इस बारे में कई मिथक और कहानियां हैं. और ज्यादातर लोगों की जानकारी ऐतिहासिक तथ्यों पर नहीं बल्कि इस घटना पर बनी फिल्मों का नतीजा हैं.
तो चलिए एक नजर डालते हैं टाइटैनिक के बारे में, इन सौ सालों में फिल्मों के जरिए पैदा हुए पांच सबसे आम मिथकोंपर.

‘जो जहाज डूब नहीं सकता था’
जेम्स कैमरन की टाइटैनिक में हिरोइन रोज की मां साउथहैम्पटन बंदरगाह में खड़े जहाज को देखकर कहती है, “तो ये है वो जहाज जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इसका डूबना नामुमकिन है.”
लेकिन लंदन के किंग्स कॉलेज के रिचर्ड हॉवेल्स का कहना है कि टाइटैनिक के बारे में शायद ये सबसे बड़ा मिथक है. वे कहते हैं, “लोग भले ही कुछ भी समझते हों लेकिन जहाज की मालिक कंपनी, व्हाइट स्टार लाइन, ने कभी भी ऐसा दावा नहीं किया था और असल में तो इसके डूबने से पहले तक किसी ने ऐसी कोई बात भी नहीं लिखी थी.”
आखिरी धुन
“लोग भले ही कुछ भी समझते हों लेकिन जहाज़ की मालिक कंपनी, व्हाइट स्टार लाइन, ने कभी भी ऐसा दावा नहीं किया था और असल में तो इसके डूबने से पहले तक किसी ने ऐसी कोई बात भी नहीं लिखी थी.”
रिचर्ड हॉवेल्स, किंग्स कॉलेज, लंदन
विभिन्न टाइटैनिक फिल्मों के यादगार दृश्यों में से एक में जहाज के डूबने के समय यात्रियों का मनोबल बनाए रखने के लिए बैंड को संगीत बजाता दिखाया गया है. बैंड आखिर में ‘नियरर, माई गॉड, टू दी’ प्रार्थना का संगीत बजा रहा है. फिल्म के मुताबिक इनमें से कोई वादक भी नहीं बचा और ये सब हीरो बन गए.
ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट के आर्काइव क्यूरेटर साइमन मैककुलम कहते हैं कि ये एक बहस का मुद्दा है कि बैंड का अंतिम गाना कौन सा था. कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक बैंड उस समय रैगटाइम और लोकप्रिय संगीत धुने बजा रहा था. वो कहते हैं, “असल में आखिरी धुन कौन सी थी, इस बारे में हम कभी भी पता नहीं कर पाएंगे क्योंकि सातों वादक मारे गए. इस प्रार्थना का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि इससे फिल्म की एक रुमानी छवि बनती है.”
जहाज के कप्तान की मौत
इसी तरह टाइटैनिक के कप्तान स्मिथ के आखिरी क्षणों के बारे में भी बहुत कम जानकारी है. हालांकि हिमखंड होने की चेतावनियों को नजरअंदाज़ करने और जहाज की गति कम नहीं करने के बावजूद उन्हें एक हीरो के तौर पर देखा जाता है.
लेकिन ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट के आर्काइव क्यूरेटर साइमन मैकुलम फिल्मों में दर्शाई गई स्मिथ की हीरो की छवि को सही नहीं मानते.
साइमन कहते हैं, “इतिहास में स्मिथ की बहादुरी के किस्से हैं जो असल में हुए ही नहीं. बताया जाता है कि उन्हें पता था कि जहाज में कितने यात्री और लाइफबोट हैं लेकिन फिर भी उन्होंने कई नावों को पूरी तरह भरे न होने के बावजूद जाने दिया. जो कुछ हुआ, उसके लिए वो ही जिम्मेदार थे.”
लंदन के राष्ट्रीय समुद्री संग्रहलाय के जॉन ग्रेव्स भी मानते हैं कि कोई नहीं जानता उस रात स्मिथ आखिर कहां गायब हो गए.
‘खलनायक’ जहाज मालिक


टाइटैनिक के बारे में कई मिथक मशहूर हैं जिनका आधार इस पर बनी फ़िल्में हैं.
टाइटैनिक बनाने वाली कंपनी के मालिक जे ब्रूस इसमे के बारे में कई कहानियां हैं और लगभग सभी में उनकी तथाकथित कायरता के बारे में हैं कि कैसे उन्होंने सहयात्रियों को डूबने के लिए अपनी जान बचाई.
टाइटैनिक ऐताहासिक संस्था के उपाध्यक्ष पॉल लॉडेन-ब्राउन कहते हैं कि इन आरोपों के पीछे इसमे और मशहूर अमरीकी अखबार मालिक विलियम रैंडोल्फ़ हर्स्ट की पुरानी दुश्मनी हो सकती है. हर्स्ट के अखबार में एक सूची मारे गए लोगों के नामों की थी और दूसरी सूची, जो बचे लोगों की थी, उसमें केवल इसमे का नाम ही था. इसके चलते इसमे की अमरीका में बहुत बदनामी हुई थी.
लेकिन लॉडेन-ब्राउन, टाइटैनिक पर आधारित विभिन्न फिल्मों में जे ब्रूस इसमे को खलनायक की तरह दर्शाने, को गलत मानते हैं. 1912 में ब्रिटेन में जहाज के डूबने की वजह की जांच कर रही रिपोर्ट के अनुसार आखिरी लाइफबोट में बैठने से पहले इसमे ने असल में कई यात्रियों की मदद की थी.
गरीब यात्री

जेम्स कैमरन की निर्देशित फिल्म टाइटैनिक का एक भावुक दृश्य है, जिसमें तीसरे दर्जे के यात्रियों को जहाज के निचले हिस्से में जबरदस्ती रोका जाता है और उन्हें लाइफबोट तक पहुंचने से रोका जाता है.
किंग्स कॉलेज के रिचर्ड हॉवेल्स कहते हैं कि इस बात का कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं है.
ये सही है कि जहाज में तीसरे दर्जे के यात्रियों को दूसरे यात्रियों से अलग रखने के लिए दरवाजे थे लेकिन ऐसा अमरीकी आप्रवासन कानूनों के अनुसार और संक्रामक बीमारियों को रोकने के लिए किया गया था ना कि जहाज डूबने के हालात में इन यात्रियों को लाइफबोट तक पहुचने से रोकने के लिए.
असल में टाइटैनिक के तीसरे दर्जे के ज्यादातर यात्री बेहतर जिंदगी की तलाश में अमरीका जा रहे दुनिया भर के यात्री थे और अमरीकी कानून के तहत इन्हें ऐलिस द्वीप पहुंचने पर स्वास्थ्य जांच और आप्रवासन के लिए बाकी यात्रियों से अलग गया था.
ये जरूर था कि जहाज़ के तीसरे दर्जे में लाइफ़बोट नहीं थे लेकिन ब्रिटिश जांच रिपोर्ट में पाया गया कि इन यात्रियों को जहाज के निचले हिस्से में बंद करके रखने के आरोप गलत थे.
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