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न संविधान संशोधन होने देंगे, न चुनाव होगा : गंगेश कुमार मिश्र

 

OLI-PRACHAND
गंगेश कुमार मिश्र, कपिलबस्तु ,२६ जनवरी |
एक कहावत है, मधेश में ……
” काहे नौ मन तेल होई, काहे राधा नचिहैं।”
न संविधान संशोधन होने देंगे, न चुनाव होगा। ऐमाले इसी कहावत की तर्ज़ पर संशोधन का विरोध कर रही है; क्योंकि ये अच्छी तरह से जानते हैं,  कि जबतक संविधान संशोधन नहीं होगा, चुनाव कराना संभव नहीं होगा।
यह एक सोची-समझी साज़िश है, संघीयता के ख़िलाफ़; वास्तव में अब इन्हें संघीयता, किसी भी क़ीमत पर स्वीकार्य नहीं है।
मधेशी मोर्चा से वार्ता का दौर जारी  है, प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दहाल ‘ प्रचण्ड ‘ ने संविधान संशोधन का कार्य यथाशीघ्र कराने तथा चुनाव की तिथि का निर्धारण करने की बात तो कही है। पर यह संभव नहीं लगता क्योंकि झूठी राष्ट्रीयता का दंभ भरने वाले तथाकथित राष्ट्रवादियों ने, देश को विखण्डन का डर दिखाकर; संघीयता को क़ुर्बान करने की ठान ली है। ऐसे में, ” लगता तो नही, हो पाएगा स्थानीय निकाय निर्वाचन।”
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चुनाव चाहते होते,
हालात,
ऐसे तो, न हुए होते;
हर-बार, आश्वासन,
होगा, होने वाला है;
हो कर रहेगा।
किसे मूर्ख, बना रहे हो ?
क्यों, बना रहे हो ?
कभी सोचा न होगा;
इस देश का, क्या होगा ?
पर भूले-बिसरे,
ज़रूरत के हिसाब से,
राष्ट्रीयता का राग,
जरूर अलापते हो;
पर कभी देखा है,
उन ज़ख्मों को ?
जो दिया है तुमने;
मातृभूमि को।
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क्या कहा जाय ? कौन सुनेगा, कौन सुनता है, ” नक्कार खाने में,  तूती की आवाज़।” हाल-बेहाल है, पर आमजन कुछ कह नहीं पा रहा, कुछ कर नहीं पा रहा; बेचारा।

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