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मौजूदा संविधान जन के लिए, जन का संविधान नहीं बन सका : सीमा खान

 

Seema-Khan

सीमा खान, काठमांडू , ४ फरवरी | नेपाल में ऐतिहासिक रुप में संविधान सभा का चुनाव हुआ । हर जनता की आकांक्षा थी कि संविधान सभा के जरिये ‘जन के लिए, जन द्वारा, जन का संविधान’ बने । वह संविधान जो देश की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक विविधता को केन्द्रित करके राष्ट्र को दशा एवं दिशा देने का कार्य करे । मधेशी, आदिवासी जनजाति, मुसलिम, दलित, सीमान्तकृत आदि समुदायों के अधिकारों को परिभाषित एवं कत्र्तव्यों की सीमा निर्धारित करे । कल्याणकारी राज्य को नागरिकों को न्याय, स्वतन्त्रता एवं समता प्रदान करने एवं बंधुता बढ़ाने, व्यक्ति की गरिमा व राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हो । लेकिन दुर्भाग्य है कि दो–दो बार संविधान सभा का चुनाव होने पर भी मधेशी, आदिवासी जनजाति, मुसलिम, दलित, सीमान्तकृत आदि समुदायों की आकांक्षा अनुसार संविधान नहीं बन सका ।
वैसे संविधान में समावेशी समानुपातिक, संघीयता, धर्मनिरपेक्षता आदि जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को शामिल किया गया है । लेकिन समानुपातिक प्रतिनिधित्व कराने की बात आती है, तो बड़ी सियासी पार्टियां अपनी अनुकूलता से नियुक्ति करती हैं । संघीयता के सवाल पर जब सीमांकन की बात आती है, तब वे सीमांकन को नजरअंदाज करके चुनाव करवाने की बात करती हैं । धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर भी कथित देश की चौथी शक्ति इसके विपक्ष में उतरी हुई है ।
जहाँ तक सवाल है चुनाव का, तो मेरे ख्याल से जब तक संविधान संशोधन विधेयक परिमार्जन सहित पारित नहीं हो जाता है, तब तक चुनाव करवाना मधेशी, आदिवासी जनजाति, मुसलिम आदि समुदायों के साथ बेईमानी होगी ।
हां, लोकतन्त्र की सफलता हेतु चुनाव होना जरुरी है । लेकिन सरकार को समझना चाहिए कि कैसा चुनाव और किसके लिए ? बहरहाल, यह जरुरी है कि पहले इन सभी मसलों को जल्द सुलझाया जाए । उसके बाद चुनाव करवाया जाए । वरना फिर देश में विगत के जैसा संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा ।
(सीमा खान नेपाल मुसलिम वेलफेयर सोसाइटी की अध्यक्ष हैं ।

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