एमाले का मेची-महाकाली अभियान मधेशीयों का नरसंहार करने के लिए है : रामेश्वरप्रसाद सिंह
रामेश्वर प्रसाद सिंह (रमेश) , दुर्गापुर-3, सिरहा , ६ मार्च | भाई फुटे गौवार लुटे |
बहुत दुःख की बात हैं जो मधेशी लोग राजनीति के नाम पर अपने में ही लड़ते हैं। आज के दिन जो मधेशी लोग अपने में ही राजविराज और गौर में एक दुसरे पर टुट पड़े हैं, जरा ठंडे दिमाग से सोचे कि उससे मधेश और मधेशीयों का क्या भला हुआ हैं ? हमारे समाज में एक कहावत प्रचलित हैं; “भाई फुटे गौवार लुटे।” अगर मधेशी लोग अपने में ही फुट डालेंगे तो फिरंगी शासक लाभ उठाएगा ही।
सिरहा और राजविराज की घटना ने यह भी सावित कर दिया की फिरंगी लोग अपने बल बुते पर मधेश में राज नहीं करते बल्कि मधेशऔर मधेशियों में एकता नही होने की वजह से करते हैं | मधेशीयों की कमी कमजोरी की वजह से करते हैं, मधेशीयों की नादानी की वजह से करते हैं, संकुचित सोच की वजह से करते हैं ।
सिरहा और राजविराज की घटना ने यह भी सावित कर दिया की फिरंगी लोग अपने बल बुते पर मधेश में राज नहीं करते बल्कि मधेशऔर मधेशियों में एकता नही होने की वजह से करते हैं | मधेशीयों की कमी कमजोरी की वजह से करते हैं, मधेशीयों की नादानी की वजह से करते हैं, संकुचित सोच की वजह से करते हैं ।
जब अंग्रेज लोग भारत पर शासन करते थे तो वे लोग भी भारतीय को आपस में लड़वाते थे और अपने ही भाईयों की हत्या करने हेतु भारतीय लोग अंग्रेज से सहयोग लेते थे जिसके बदले अंग्रेज़ लोग बहुत लगान लेकर अपना भण्डार भरते थे। मानते हैं की उस समय में भारतीय लोग उतना समझदार नहीं थे पर मधेशीयों में तो इस समय में समझ हैं फिर वे लोग ठिक इसी रणनीति में इतनी बुरी तरह से कैसे फस रहे हैं ? क्या यह बात सोचने वाली नहीं हैं ? क्या इस रणनीति को तोड़ने हेतु आपस में सहकार्य नहीं करनी चाहिए ?
मधेशी अपने ही भाईयों को हराने के लिये कभी एमाले की समर्थन करने पर तुलते हैं तो कभी कांग्रेस को, कभी माओवादी तो कभी मधेश केन्द्रित दल पर क्या एक भी पार्टी मधेशी को जोड़कर मधेश समृद्धि के बारे में सोचा हैं ? फिर क्यों अपने भाईयों को ही मारने पर तुलते हैं हमारी कौम, हमारी मधेशी समाज?
फिरङ्गी लोग तो चाहते ही हैं की मधेश में फुट और हिंसा हो क्यों की शुरक्षा व्यवस्था के नाम पर मधेश में सेना परिचालन करके मधेशीयों का नरसंहार करें । इसी उद्देश्य से एमाले मेची महाकाली अभियान प्रेरित है |
इस हालात में मधेशीयों के लिये परिस्थिति को समझना बहुत जरुरी है। फिरंगी लोग भयभीत हो गए हैं क्योंकि मधेश आजादी आन्दोलन गगन चुम रही हैं। इसिलिए वे लोग मधेश में मधेशीयों के बीच लड़वाकर नरसंहार करने की साजिश रच रहें हैं। ऐसी साजिश से सतर्कता अपनाते हुए अपनी मंजिल से नहीं भट्के। मधेश अपना अधिकार लेकर रहेगी ।
चाहे कांग्रेस, एमाले, माओवादी हो या फिर मधेशी मोर्चा हो, मधेश में सभी कार्यकर्ता हैं मधेशी ही और आपस में लड़कर मधेश और मधेशीयों को फायदा नहीं बल्कि नुकसान ही हैं। इसिलिए दुसरो के इसारा पर नहीं अपनी सुझ बुझ से काम करें।
मानते हैं गुलामी की मानसिकता से लोग घिरे हुए हैं पर उसे तोड़ने की कोशिस तो करें। जब भारतीय लोग आजादी ले सकते हैं वह भी उस समय के विश्व सम्राट से तो फिर मधेशी क्यों नहीं ? हमारे सामने तो दान में मिले हथियार बोकने बाले फिरंगी सेना और भीख में मिले पैसों से चलने वाली नेपाली साम्राज्य हैं। फिर भी कितने मधेशी लोग उन्ही से भीख में अधिकार मांगने पर तुला हैं, अरे भैया आप खुद ही सोचे भिखारी भला आपको क्या देगा, वह भी आप अपने ही पुर्खौली सम्पति पर अपना हक उनसे मांग रहे हैं। मधेश तो मधेशीयों को विरासत में मिले हैं जिसमें हमारी पुर्खो का खुन-पसीना मिला हैं, पग पग की जमीन हमारी वीरो कि खुन से सिंचित हैं। तो इसे मांगना नहीं हैं बल्कि भेड़ बकडियो को खदेड़ भगाना हैं और मधेश को अपना अधिकार दिलाना हैं क्योंकि यह हमारी अपनी मातृभूमि हैं और अपनी मात्रिधर्म भी।
अगर संघर्ष करना ही हैं तो क्यों ना करे मधेश , मधेशीयों की आत्मसम्मान के लिए। पराधीन राज में तो सपना देखने से भी सुख नहीं।
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं।
~गोस्वामी तुलसीदास/श्री रामचरित मानस
और बिना स्वराज मधेशीयों के लिए आत्मसम्मान संभव नहीं। जब अपने भाईयों से लड़ने में वीरता देखा सकते हैं तो उपनीवेश के खिलाफ क्यों नहीं ? आजादी के लिए क्यों नहीं ? आत्मसम्मान के लिए क्यों नहीं ? अपनी पहचान के लिए क्यों नहीं ? स्वराज आन्दोलन तो आत्मसम्मान के लिए हैं, उपनीवेश से मुक्ति के लिए हैं, अपनी अस्तित्व कि रक्षा के लिए हैं, अपनी स्वतंत्रता के लिए हैं। (पर याद रहे संघर्ष शान्तिपूर्ण एवं अहिंसात्मक मार्ग पर रहते हुए करना हैं क्योंकि सत्य और शान्ति में दुनिया का सबसे बड़ा ताकत छुपा हैं।)
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।
(माननीय पुरुष के लिए आत्मसम्मान बिना के जीवन मृत्यु से भी बढ़कर हैं।)
~श्रीमद् भगवद् गीता: 2-34
इसिलिए आपस मे सद्भाव रखते हुए मधेश को फिरसे उथिष्ठ एवं उत्कृष्ट बनाने हेतु अग्रसर रहिए। खौलता हुवा खुन को आपस में लड़कर ठंडा ना करें बल्कि मधेश के अधिकार के लिये संघर्ष हेतु इस्तेमाल करें और नेपाली उपनीवेश को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लेते हुए आन्दोलन में झुमिए।
मधेशी अपने ही भाईयों को हराने के लिये कभी एमाले की समर्थन करने पर तुलते हैं तो कभी कांग्रेस को, कभी माओवादी तो कभी मधेश केन्द्रित दल पर क्या एक भी पार्टी मधेशी को जोड़कर मधेश समृद्धि के बारे में सोचा हैं ? फिर क्यों अपने भाईयों को ही मारने पर तुलते हैं हमारी कौम, हमारी मधेशी समाज?
फिरङ्गी लोग तो चाहते ही हैं की मधेश में फुट और हिंसा हो क्यों की शुरक्षा व्यवस्था के नाम पर मधेश में सेना परिचालन करके मधेशीयों का नरसंहार करें । इसी उद्देश्य से एमाले मेची महाकाली अभियान प्रेरित है |
इस हालात में मधेशीयों के लिये परिस्थिति को समझना बहुत जरुरी है। फिरंगी लोग भयभीत हो गए हैं क्योंकि मधेश आजादी आन्दोलन गगन चुम रही हैं। इसिलिए वे लोग मधेश में मधेशीयों के बीच लड़वाकर नरसंहार करने की साजिश रच रहें हैं। ऐसी साजिश से सतर्कता अपनाते हुए अपनी मंजिल से नहीं भट्के। मधेश अपना अधिकार लेकर रहेगी ।
चाहे कांग्रेस, एमाले, माओवादी हो या फिर मधेशी मोर्चा हो, मधेश में सभी कार्यकर्ता हैं मधेशी ही और आपस में लड़कर मधेश और मधेशीयों को फायदा नहीं बल्कि नुकसान ही हैं। इसिलिए दुसरो के इसारा पर नहीं अपनी सुझ बुझ से काम करें।
मानते हैं गुलामी की मानसिकता से लोग घिरे हुए हैं पर उसे तोड़ने की कोशिस तो करें। जब भारतीय लोग आजादी ले सकते हैं वह भी उस समय के विश्व सम्राट से तो फिर मधेशी क्यों नहीं ? हमारे सामने तो दान में मिले हथियार बोकने बाले फिरंगी सेना और भीख में मिले पैसों से चलने वाली नेपाली साम्राज्य हैं। फिर भी कितने मधेशी लोग उन्ही से भीख में अधिकार मांगने पर तुला हैं, अरे भैया आप खुद ही सोचे भिखारी भला आपको क्या देगा, वह भी आप अपने ही पुर्खौली सम्पति पर अपना हक उनसे मांग रहे हैं। मधेश तो मधेशीयों को विरासत में मिले हैं जिसमें हमारी पुर्खो का खुन-पसीना मिला हैं, पग पग की जमीन हमारी वीरो कि खुन से सिंचित हैं। तो इसे मांगना नहीं हैं बल्कि भेड़ बकडियो को खदेड़ भगाना हैं और मधेश को अपना अधिकार दिलाना हैं क्योंकि यह हमारी अपनी मातृभूमि हैं और अपनी मात्रिधर्म भी।
अगर संघर्ष करना ही हैं तो क्यों ना करे मधेश , मधेशीयों की आत्मसम्मान के लिए। पराधीन राज में तो सपना देखने से भी सुख नहीं।
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं।
~गोस्वामी तुलसीदास/श्री रामचरित मानस
और बिना स्वराज मधेशीयों के लिए आत्मसम्मान संभव नहीं। जब अपने भाईयों से लड़ने में वीरता देखा सकते हैं तो उपनीवेश के खिलाफ क्यों नहीं ? आजादी के लिए क्यों नहीं ? आत्मसम्मान के लिए क्यों नहीं ? अपनी पहचान के लिए क्यों नहीं ? स्वराज आन्दोलन तो आत्मसम्मान के लिए हैं, उपनीवेश से मुक्ति के लिए हैं, अपनी अस्तित्व कि रक्षा के लिए हैं, अपनी स्वतंत्रता के लिए हैं। (पर याद रहे संघर्ष शान्तिपूर्ण एवं अहिंसात्मक मार्ग पर रहते हुए करना हैं क्योंकि सत्य और शान्ति में दुनिया का सबसे बड़ा ताकत छुपा हैं।)
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।
(माननीय पुरुष के लिए आत्मसम्मान बिना के जीवन मृत्यु से भी बढ़कर हैं।)
~श्रीमद् भगवद् गीता: 2-34
इसिलिए आपस मे सद्भाव रखते हुए मधेश को फिरसे उथिष्ठ एवं उत्कृष्ट बनाने हेतु अग्रसर रहिए। खौलता हुवा खुन को आपस में लड़कर ठंडा ना करें बल्कि मधेश के अधिकार के लिये संघर्ष हेतु इस्तेमाल करें और नेपाली उपनीवेश को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लेते हुए आन्दोलन में झुमिए।
रामेश्वर प्रसाद सिंह (रमेश)
दुर्गापुर-3, सिरहा(मधेश)
9862973120/9823631852


