एक मौत ऐसी जिसे शहीद घोषित करने में एक दिन भी नहीं लगा : श्वेता दीप्ति
क्या मरने वाले मधेशी सिर्फ मधेशी थे, या वो नेपाली थे ? और अगर नेपाली नागरिक थे तो क्या सत्ता की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है इनके लिए ? जख्म देने वाले हाथ मरहम के लिए क्यों नहीं उठ रहे ?
श्वेता दीप्ति, काठमांडू, १४ मार्च |
गोविन्द, तिमी सदा-सदा अमर रहनेछौ र रहनुपर्दछ । र, तिम्रो अमरत्वको गौरवगाथा हामी जीवित नेपालीले सदासदा गरिरहने छौं ।
ये शब्द हैं, शहीद गोविन्द के लिए । जो विदेशी गोली की शिकार होकर शहीद हो गए । जिनके लिए सभी की आँखें नम हुईं । होनी भी चाहिए थी क्योंकि मृत्यु कभी भी सुख और खुशी की वजह नहीं बनती । मौत किसी की भी हो तकलीफ होती है ।
पर एक सवाल जो जेहन में आता है कि एक मौत ऐसी हुई जिसे सत्ता और देश की सहानुभूति सहज ही मिल गई । जिनको शहीद घोषित करने में संसद को एक दिन भी नहीं लगा । किन्तु कैसी विडम्बना है इस देश की कि, जहाँ इसी देश के एक भूखण्ड के नागरिक जब सत्ता की गोली का शिकार होते हैं तो उन्हें शहीद घोषित करने में लोहे के चने चबाने पड़ जाते हैं । न तो उनके लिए सहानुभूति होती है और न ही उनके परिवारजन के लिए सत्ता की ओर से आश्वासन के दो शब्द । अगर इस तथ्य को सुक्ष्मता से विश्लेषित करें तो क्या ऐसा नहीं लगता कि देश का एक खण्ड अपनी ही मिट्टी में बेगाने हैं ? कौन हमदर्द है इनका ? किनके लिए ये हताहत हुए ? अगर देखा जाय तो एमाले अध्यक्ष ओली ही सही हैं । कम से कम जो उनके दिल में है वही जुबान पर तो है । वो मधेशियों को आदमी नहीं समझते, उनकी पार्टी मधेश की मिट्टी को नेपाल मानते हैं, परन्तु वहाँ के इन काले वर्ण वाले नागरिकों को नहीं । इस मायने में उनकी स्पष्टवादिता तो है । इनकी जुबान से निकली कटुक्तियाँ तकलीफ जरुर देती है किन्तु, इनकी मन की बातें तो सामने आती हैं । इनसे जुदा जो मधेश के हमदर्द बन रहे हैं, उनके लिए क्या कहा जाय ? काँग्रेस, माओवादी और राप्रपा इनकी निगाह में मधेश की क्या अहमियत है ? क्या ये वाकई मधेश के हमदर्द हैं या जो नीति या सोच एमाले की है वही इनकी भी है ? क्या मरने वाले मधेशी सिर्फ मधेशी थे, या वो नेपाली थे ? और अगर नेपाली नागरिक थे तो क्या सत्ता की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है इनके लिए ? जख्म देने वाले हाथ मरहम के लिए क्यों नहीं उठ रहे ? इस संवेदनशील समय में चुनाव की घोषणा हो चुकी है । स्वाभाविक है कि यह चुनाव पूरी तरह सेना के बल पर सम्पन्न कराया जाएगा और उसके बाद की स्थिति कमोवेश सभी समझ रहे होंगे । ये माहोल कुछ ऐसा ही होगा जैसा संविधान निर्माण के समय मसौदा संकलन के वक्त दिखा था । जहाँ नागरिक से अधिक सेना थी और सत्ता पक्ष के नेता तथा कार्यकर्ता, जहाँ मधेश की आम जनता की उपस्थिति नगण्य थी । जिस मसौदे का मधेशियों ने पूर्णतः बहिष्कार किया था । फिर भी गोली और मौत बाँट कर संविधान निर्माण किया गया । निर्वाचन की आवश्यकता इस देश को है, यह अकाट्य सत्य है, पर इसके लिए जिस तरह से सत्तापक्ष और एमाले सामने आ रही है, वह किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है ।
एमाले के व्यवहार में किसी भी तरह का बदलाव नहीं दिख रहा । जिस अभद्रता के साथ उनके कटाक्ष मधेश के लिए हो रहे हैं, निःसन्देह वो जख्म को नासूर बना रहे हैं । घाव को कुरेद–कुरेद कर हरा किया जा रहा है और उन्हीं से सहृदयता भी खोजी जा रही है । एमाले की सद्भावना यात्रा शक्ति प्रदर्शन की यात्रा है यह तो जाहिर हो चुका है । खैर, अगर नियति इस देश की यही है कि जिद, जुनून और शवों के बीच राजनीति का सुख लिया जाय तो इसके आगे सिर्फ खामोशी है । देश में जिस तरह से विद्वेश और विखण्डन को हवा दी जा रही है वो किसी अच्छे आसार का संकेत नहीं कर रही ।
इधर मोर्चा की स्थिति डावाँडोल हो रही है । वो सिर्फ दावे की राजनीति कर रही है । न जाने किस नीति के तहत मोर्चा ने सत्ता पक्ष को सात दिनों की मोहलत दी थी ? देखा जाय तो ऐसा लग रहा है कि मोर्चा ने सत्ता को सम्भलने का मौका दे दिया । इन सात दिनों में सरकार स्वयं को बचाने के लिए राप्रपा और लोकतांत्रिक के सामने चारा फेक चुकी है और उसे जीवनदान भी मिल चुका है । तो मोर्चा को क्या हासिल हुआ ? किस जादूई करिश्में का इंतजार है ? वैसे यह सत्ता है जो बिल्कुल क्रिकेट के खेल की तरह होता है जहाँ आखिरी गेंद तक उम्मीदें टिकी होती हैं पर यह भी सच है कि पहले फेके गए गेंद भी परिणाम के लिए महत्त्व रखते हैं । किन्त’ यहाँ तो फिलहाल पारी शून्य नजर आ रही है । देखें हश्र क्या होता है ?


