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छल-बल का खेल, मधेशियों का कत्लेआम करके भी चुनाव होगा : मुरलीमनोहर तिवारी

 

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मुरलीमनोहर तिवारी ( सिपु ), वीरगंज, २३ मार्च | संविधान संशोधन और स्थानीय चुनाव के बीच रसाकस्सी का खेल चल रहा है। कोई कहता है, संशोधन नही होगा, कोई कहता है चुनाव नहीं होगा। अंतर्राष्ट्रीय जगत का तोतारटंत लोकतंत्र का सिद्धांत है कि कोई भी चुनाव है, वह होना ही चाहिए। ये देश ऊँगली के इशारे पर चलता है, इसलिए लगता है कि चुनाव तो कराया ही जाएगा, भले ही इसके लिए निरीह मधेशियों का कत्लेआम ही क्यों ना किया जाए।

लम्बे आंदोलन से उठे बवंडर को कुछ शांति मिलती सी लग ही रही थी, की एमाले ने मेची महाकाली के नाम पर महाकाल को जगा दिया। वैसे भी एमाले को उग्रता और अराजकता से पहाड़ में लाभ मिलने की उम्मीद है। उसे पता है मधेश से कैसे वोट लिया जाता है। होली के अवसर पर एमाले के लोगो ने होली मिलन के नाम पर बिना झंडा बैनर के व्यक्तिगत रूप से लोगो को बुलाया, बढ़िया नास्ता- खाना खिलाया, दारू-शराब पिलाया, चलते समय लिफ़ाफ़े में हजार- दो हजार के नोट रखकर पॉकेट में डाल दिया, अब इतनी गर्मी तो कुछ काम करेगी ही, क्योकि खनक तो पैसे में होती है।

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मधेश के ख़ास लोग इस ख़ुमारी से निकल पाते, तब तक कामरेड का बंदा, भोटो के ठेकेदारों के घर पर्ची थमा के चला गया, पर्ची में लिखा था, फलाने दुकान से जाकर एक साइकल ले लीजिए, और बहुत जल्द मुख्य लोगों को मोटरसायकल मिलने वाला है। भोटो के ठेकेदारों से कई चरण की बात हो चुकी है, हरेक जात के अगुवा, हरेक टोल, क़स्बा, गांव के रसूखदार लोगो से मोल-भाव किया जा रहा है। जो पैसे से बिकने वाले नही है, उन्हें पद, प्रतिष्ठा, नौकरी का लोभ दिया जा रहा है। जो इससे भी नही मानते उनके पुराने दबे मुकदमे और नए मुक़दमे का भय दिया जा रहा है। इनकी नज़र में हर शख्स बिकाऊ है, सिर्फ उसकी बिक्री की किम्मत का सही अंदाजा होना चाहिए।

कहने का अर्थ ये है कि मधेश से जितने के लिए पैसे का बोरी खुल गया है। ये सब जानते हुए भी मधेशी दल चुप है, क्योकि उन्हें लगता है मधेशी जनता ये सब लेकर भी मधेश का ही साथ देगी। ये मधेशी दलो की गलतफहमी भी हो सकती है, क्योकि भूखा पेट ये नही देखता पत्तल फेका हुआ है, या उसे कोई कुत्ता भी चाट रहा है, उसे तो बस भूख मिटाने से मतलब होता है। चुनाव की तरफदारी करने वाले बिदेशी शक्तियों को भी ये खेल मालूम है क्योंकि इन सब का इंतेजामात उनके ही कई अंग से हो रहा है। ऐसा लगता है इस देश में सच्चाई, इम्मान्दरी के लिए कोई जगह नही है। ये सब किताबी बातें बन कर रह गई है।

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बिदेशी शक्तियो के लिए नेपाल एक प्रयोगशाला है, जैसे प्रयोशाला में कोई भी प्रयोग पहले चूहों पर किया जाता है, चूहें के मरने-जीने से प्रयोगकर्ता को कोई भावनात्मक चोट नही पंहुचती, उसी तरह उनके लिए नेपाली जनता चूहे के समान है, जिनके जीने- मरने से कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है। अपने देश के सारे बेकार, आउटडेटेड कचड़े को मदद के नाम पर हमें देकर तालियां बटोरते है। मधेशियों का सरेआम नरसंहार होता रहा औऱ कूटनीति-मर्यादा के नाम पर इनके मुह से एक शब्द नही फूटा, जब इन्हें कोई काम पड़ जाएं तो सारे मर्यादा ताक पर रख, आधी रात को सारे फ़ाटक खोल दिए जाते है।

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राजनीतिक दल तो राजनीती करेंगे ही, इसीलिए इसे राजनीती कहते है, राज-नीति अर्थात राजा की नीति, जिसमे राजा अपनी गद्दी के लिए कही भी जंग करवा सकता है, किसी को भी बलि चढ़ा सकता है। आश्चर्य तब होता है, की एक दशक के संघर्ष के बाद भी, देश की आधी आबादी ये नहीं समझ पाई की मधेश की मांग, किसी दूसरे देश के नागरिक की नही है, बल्कि इसी देश के शोषित, उपेक्षित, पीड़ित जनता की मांग है, और आज तक वे हमारे दुःख में ख़ुद को शामिल नही कर पाएं। ऐसा लगता है जब ये बात समझ आएगी तब तक नक़्शे बदल चुके होंगे।

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