शासक रावण, लंका देश …
गंगेश मिश्र
क्या देते ? ऋषि- मुनियों पास देने को कुछ था नहीं, रावण को; कर के रूप में। तो रावण ने एक युक्ति निकाली कि, क्यों न इनसे एक- एक बूँद ख़ून; कर के रूप में वसूला जाए और उसने वही किया भी, बूँद-बूँद ख़ून, कर के रूप में वसूल कर; एक घड़े में रखने लगा; घड़ा भरा तो उसे राजा जनक की राजधानी जनकपुर में गड़वा दिया। ये तो सभी जानते हैं, रावण जैसा प्रकांड विद्वान; आजतक न हुआ।
पर अहंकार ने रावण के अस्तित्व को ही, समाप्त कर दिया; रावण की सोने की लंका पल भर में जलकर खाक हो गई।
ऐसा ही कुछ, बुद्ध की भूमि नेपाल में हो रहा है; जनता रो रही है, कर उगाही भरपूर है।” कर ” के रूप में जनता, अपनी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा, रावण रूपी शासक को देती आ रही है।
पिछले उन्नीस वर्षों से, शिथिल पड़े स्थानीय निकाय को जागृत करने में लगी, सरकार; बिलकुल नये ढाचे में स्थानीय निकाय का गठन कर रही है। शिकायत नहीं है, स्थानीय निकाय निर्वाचन अतिआवश्यक है; किंन्तु अचानक से; ऐसे प्रारूप को जनता समझ भी पाएगी संदेह लगता है। इसमें सरकार की मंशा साफ़ नहीं दिखती; विकास की गंगा बहाने के लिए, स्थानीय निकाय को व्यवस्थित करना तो समझ में आता है; परन्तु एकाएक उन्नीस साल बाद, इस नये प्रारूप में स्थानीय निकाय का गठन और चुनाव की तैयारी सरासर बेईमानी नज़र आती है।
पड़ोसी देश भारत में भी पंचायत चुनाव होते आए हैं, किन्तु वहाँ समय-समय पर; गाँव पंचायत के क्षेत्र को छोटा किया गया है, जिससे विकास कार्य में जटिलता न आए और यहाँ गाँवपालिका और नगरपालिका के नाम पर; कर उगाही की तैयारी की गई है। नगरपालिका की संख्या, जिस गति से बढ़ाई गई है उससे सरकार की कमाई में एकाएक इज़ाफ़ा होगा, ” कर ” के रूप में ।
रावण आज भी है, लंका बनाने की तैयारी में जुटा हुआ। बूँद- बूँद ख़ून जनता से वसूलने के लिए; कर के रूप में।

