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थाली का बैगन

 

अस्पताल या स्वास्थ्य चौकी न होने से गांव में लोग बीमार पड़ रहे हैं, अकाल में मर रहे हैं, कोई बात नहीं । अन्न–बाली में कीड़े लगते हैं, खाद्य की कोई व्यवस्था नहीं ।

गांव में औरत शादी में दहेज न लाने से जलाई जाती है, डायन करार देकर गांव की अकेली गरीब वृद्ध औरत को गांव से निकाला जाता है, कोई बात नहीं ।

गांव में शौचालय नहीं, पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता, कोई बात नहीं । पर वाई–फाई जरूरी है ।IMG_3426

थाली का बैगन तो सभी ने देखा ही होगा ! जो थाली में एक जगह टिक कर नहीं बैठता हमेशा लुढ़कता ही रहता है । हमारे देश के नेता और पत्रकार दोनों थाली के बैगन हैं, कहां और कब लुढ़क जाए पता ही नहीं चलता । इसे ही बिन पेंदी का लोटा भी कहता है, जो अपनी जगह पर टिक कर नहीं रहता । जब से इस देश में राजस्थान की बारिश कि तरह चुनाव होने वाला है, तब से विभिन्न दल और नेताओं के नित नए करतूत देखने को मिल रहा है । मतदाता को लुभाने के लिए मुफ्त कि रेवडि़यां बंट रही है और जनता यानी मतदाता निहाल हो रही है की उसके दिन फिर गए ।
कोई वाई–फाई बांट रहा है तो कोई कुछ और । कल्पना कीजिए तो एक पार्टी लैपटॉप फ्री में देगी तो दूसरा मोबाईल और तीसरा ईन्टरनेट और चौथा पेन ड्राइव, पांचवा आइप्याड, छठवां टैव सभी को मुफ्त में बांट कर मालामाल कर रही है । मतदाता के पास इन सभी चीजों को रखने के लिए बैग या घर नहीं है और कोई पार्टी यह भी बांट सकती है । आखिर मतदाता को रिझाना और चुनाव जितना है । इज्जत का सवाल जो है, सब आगे बढ़ कर नए–नए वादें कर रहे हैं । अपनी अंटी से तो किसी का पैसा जाएगा नहीं । पैसा जाएगा तो जनता के ही खून–पसीने की कमाई से ।
कोई पार्टी गांव में वाई–फाई फ्री करने की घोषणा करती है । जनता खुश हो जाती हैं । पलट कर यह नहीं पूछती कि पैसा कहां से आएगा । जनता को लगता है कि जो अपने बेटे को १५ लाख का रिवॉल्वर खिलौने की तरह खेलने के लिए दे सकता है, वह फ्री में वाई–फाई ही क्यों जनता के लिए सेटलाईट ही लगवा देगा । सभी राजनीतिक दलों पर दवाब इतना ज्यादा बढ़ गया है, चुनाव जीतने का कि कौन, कब, क्या, जनता को आश्वासन दे या कोई नया और चौंकाने वाली घोषणा ही कर दे । चौंकिएगा मत, जब कोई राजनीतिक दल वाई–फाई से आगे बढ़ कर सभी अविवाहित मतदाताओं को फ्री की वाईफ देने की घोषणा न कर दे । आखिर में वाईफ के रूप में जनता की बेटी ब्याह कर जनता के ही घर जाएगी । किसी का घर बस जाएगा और कोई जिंदगी भर के लिए रोएगा । और कोई राजनीतिक दल इससे भी एक हाथ आगे बढ़ कर यह घोषणा कर सकती है कि जो पति या पत्नी अपने जोड़ीदार से अघाए हुए हैं या जोड़ी बदलना चाहते हैं, उनके लिए तलाक और पुनर्विवाह की भी व्यवस्था की जाएगी । कोई और पार्टी बच्चे भी कहीं मुफ्त में न बांट दे । आखिर में मतदाता को लुभाना है इसीलिए बिना हड्डी का जीव मुंह के अन्दर फिसलता ही रहता है । एमाले पार्टी ने स्वर्गीय मनमोहन अधिकारी के प्रधानमंत्रित्वकाल में लाए गए वृद्ध भत्ता का ब्याज अभी भी खा रहा है । अब हो सकता है– वह युवा या बेरोजगारी भत्ता का नया शगुफा फेंक कर अपने मतदाताओं को ललचाए । जिस देश में भेड़ जैसी आंख मूंदकर खाई में गिरने वाली जनता होगी, वहां इनको चराने के लिए चरवाहा जैसे हाथ में डंड़ा लिए हुए नेता अपने आप पैदा हो जाते हैं ।
इस देश की मतदाता आइने में अपना शक्ल कितना देखती है, मालूम नहीं । पर अक्ल इनके पास है ही नहीं या है भी तो भेड़ की तरह घास चरने चली गई है । जिस देश के नेता, विभिन्न राजनीतिक दल और सरकार एनसेल के द्वारा पचाए गए ३३ अरब रूपये लाभ कर देश की तिजोरी में जमा नहीं करा सकती है, उस देश में चुनाव के बहाने से वाई–फाई फ्री करने की बात सिरे से ही देश और जनता के साथ बेइमानी है । फिर भी सब कुछ जानते हुए भी मूर्ख जनता वाई–फाई फ्री में मिलने की बात पर खुश हो रही है और ताली पीट रही है । पेट खाली हो, तो कोई बात नहीं । पर आंख और हाथ मोबाईल या लैपटॉप पर बिजी रहनी चाहिए । भूख या प्यास लगे, तो इसी को चाट लो ।
गांव बाढ़ की चपेट में आ जाता है कोई बात नहीं, सूखा या अति वृष्टि से खेत में अन्न नष्ट हो जाता है कोई बात नहीं । गांव में बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल या कॉलेज नहीं, कोई बात नहीं । अस्पताल या स्वास्थ्य चौकी न होने से गांव में लोग बीमार पड़ रहे हैं, अकाल में मर रहे हैं, कोई बात नहीं । अन्न–बाली में कीड़े लगते हैं, खाद्य की कोई व्यवस्था नहीं । गांव में औरत शादी में दहेज न लाने से जलाई जाती है, डायन करार देकर गांव की अकेली गरीब वृद्ध औरत को गांव से निकाला जाता है, कोई बात नहीं । गांव में शौचालय नहीं, पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता, कोई बात नहीं । पर वाई–फाई जरूरी है । वाई–फाई से खाना, पीना सब मुफ्त में मिल जाता है, इस कलियुग में नेताओं के कृपा से । बस, सब समस्या वहीं का वहीं रही, बस वाई–फाई फ्री में दे कर जनता को मॉडर्न बनाओ ।
चीते का दहाड़ना और बकरी का गुम होना एक ही समय पर हो रहा है । इधर एनसेल अपनी बक्यौता ३३ अरब लाभ कर सरकार को दे नहीं रही है । सरकार वसूल करने में लाचार है, उल्टे विभिन्न नेता और देश के तथाकथित बुद्धिजीवी मोटी रकम डकार कर एनसेल के पक्ष में बयान–बाजी कर रही है कि एनसेल को लाभ कर का पैसा सरकारी खजाने में ड़ालना जरूरी नहीं है । उधर सत्ता पक्ष और चुनाव में भागीदारी करने वाला एक मुख्य दल माओवादी गांवों में वाई–फाई फ्री करने की बात कर रहा है । क्यों वह कोई और चीज बांटना नहीं चाहता ? सिर्फ वाई–फाई ही क्यों ?
कल विनोद चौधरी चुनाव में खड़े होंगे और कह देंगे सभी को मुफ्त में वाई–वाई चाउचाउ खाने को मिलेगा । सभी बहती गंगाजी में हाथ धो कर पूण्य कमाना चाहते हैं । दूध की गवाह बिल्ली की तरह एनसेल के घोटाले में सभी दल प्रत्यक्ष अपत्यक्ष बिल्ली बनकर दूध चट कर चुकी है । अब जो इसके विरोध में बोलेगा उसका गला बिल्ली की तरह दबोचा जाएगा । ओ देश के मतदाता ! शक्ल नहीं अपना अक्ल दौड़ाओ । थोड़ी सी भी देश के स्वाथ्य और भविष्य कि चिंता है, तो इन लूभावने वादों और मुफ्त में बंट रहीं रेवड़ी पर मत ध्यान दो । चाहे वह वाईफ हो या वाई–फाई हो या वाई–वाई । इस दल–दल पर मत फंसो और अपनी दिमाग की बत्ती जलाकर योग्य व्यक्ति को वोट दो चाहे वह किसी दल, जाति या वर्ग का ही क्यों न हो । तुम दाता हो और यह भिखारी है, इन पर रहम मत करो ।

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