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बदलते राजनैतिक मूल्य और मधेशमार्गी दल : कुमार सच्चिदानन्द

 

मधेश और उसकी माँगों के विरुद्ध शेष देश में एक नकारात्मक चिन्तन दिनानुदिन हावी होता जा रहा है


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आज देश मधेश के लाख विरोध के बावजूद स्थानीय चुनावों की सम्पन्नता की दहलीज पर खड़ा है । यद्यपि मधेश में चुनाव नहीं हुआ है और आगामी १४ गते आषाढ़ को इसकी तिथि निर्धारित की गई है । यद्यपि इस देश की जो भौगोलिक स्थिति और मौसमचक्र है तथा मधेश में सड़कों का हाल है उसे देखते हुए इस तिथि को चुनाव सम्पन्न हो जाना असंभव नहीं तो संदिग्ध माना जा सकता है क्योंकि यह सक्रिय मौनसून का काल है । लेकिन इन कारणों से चुनाव टलता भी है तो इसका श्रेय मौसम को जाएगा । इस चुनाव के सौहार्दपूर्ण वातावरण के लिए एक मधेश की मात्र माँग थी कि संविधान संशोधन के द्वारा मधेश की कुछ माँगों को स्वीकार किया जाना और फिर सबको साथ लेकर स्थानीय निकायों के चुनाव में जाना । लेकिन कुछ राष्ट्रीय दलों के चरम दुराग्रह के कारण यह संभव नहीं है और सरकार भी इसके लिए पूर्ण प्रतिबद्ध नहीं दिखलाई देती । अब मधेश की राजनीति करने वाले दलों और इसकी माँगों को उचित मानने वाले मधेश की जनता – दोनों ही के सामने यह एक सवाल है कि इन चुनावों को वह महज एक राजनैतिक प्रक्रिया माने या उन्हें नीचा दिखलाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम ?
बातें बिल्कुल साफ है । मधेश और उसकी माँगों के विरुद्ध शेष देश में एक नकारात्मक चिन्तन दिनानुदिन हावी होता जा रहा है । कुछ राजनैतिक दल ऐसे हैं जो मुखर रूप से इसका समर्थन करते हैं और कुछ मौन रहकर इसके प्रति अपना समर्थन जतलाते हैं । ऐसे लोग प्रकट में दिखते तो कुछ और हैं और अन्दर ही अन्दर अपनी चालों से करते कुछ और हैं । अब मधेश और उसकी जनता को तय करना है कि वे चाहते क्या हैं ? विगत में जो राजनैतिक घटनाक्रम यहाँ घटित हुए हैं उससे यह तय हो गया है कि मधेश की कुलबुलाहटों को देश सहज रूप में नहीं ले रहा और उसकी राजनैतिक आकांक्षाओं के प्रति भी उनमें सहानुभूति का भाव नहीं है । इसलिए जो कुछ मिलेगा वह दबाब की राजनीति के तहत ही ।

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यह भी तय हो चुका है कि जो भी आमूल परिवर्तन देश में घटित हुए हैं उनमें सड़क आन्दोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है वर्ना राजनीति तो अपनी गति से चल ही रही थी । लेकिन मधेश सड़क के एकआयामी दबाब से अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त कर सकता । दूसरी संविधान सभा के काल में उसे जो फजीहत उठानी पड़ी उसका मूल कारण संविधान सभा में उसके प्रभावी नेतृत्व का अभाव होना है । इसलिए कहा जा सकता है मधेश अगर इस देश में अपना स्वाभिमान सुरक्षित रखना चाहता है और शताब्दियों के उत्पीड़न से मुक्त होकर एक समतामूलक समाज में अपनी साँसें लेना चाहता है तो उनके लिए आवश्यक है कि अल्पकालीन क्षुद्र स्वार्थों को बलि देकर उन दलों का हाथ मजबूत करें जो सीधे तौर पर उनकी माँगों को आवाज दे रहे हैं । इस दृष्टि से अगर देखा जाए तो मधेश की राजनीति करने वाले दलों ने सँभलने की दिशा में अपने कदम उठाए हैं । अब बारी जनता की है ।

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